फेसबुकिया लाल सलाम बनाम राष्ट्रभक्ति
कम्बख्त कई महीनों से लाल सलाम और राष्ट्रभक्ति स्टेटस में ऐसे फूट रही है जैसे युगों की प्यास बुझाने का ठेका इसी ने ले रखा है. इस साइट में दो गुटों ने अमुक और तमुक की सेना बना रखी है. ये सेना के सेनापति खालीस्तान में अपना मनोरंजन करने के साथ साथ मुद्रा की यारी करते है.जहां ज्यादा मुद्रा मिली सेना का टाइटल और डिस्क्रिप्सन चेंज कर दिया.अमुक को जब तक लाल सलाम करने वालों ने आर्थिक आशीर्वाद दिया तब तक अमुक साहब उसी के गुणगान करने लगे थे, और जैसे ही उन्हे तमुक वालों ने राष्ट्रप्रेम दर्शाने के लिये लालच दिया वो तुरंत पाला बदल लिये. तमुक तो अमुक से दो कदम और आंगे निकले. एक महीने में तीस बार से अधिक एक ग्रुप और एक पेज के कई नामों से नामांकरण कर दिये. अब तो ऐसा लगता है कि बनाम मात्र दिखावा है.दोनों की सेना एक ही थाली के चट्टे बट्टे हैं. यह कबड्डी मात्र पाला बदलो खेल मात्र है।
मजा तो तब आता है जब महाराजा के सिपेहसलार तमुक के स्टेटस में जाकर कमेंट बाजी की फुहारे छोडतेहैं. कभी कभी ये फुहारें चिंगारी बनकर दिल जलाने का काम करते हैं.फिर कुछ ही देर में कमेंटबाजी कबूतर बाजी में बदल जाती है और कई कबूतरियां अपनी कबूतरी नखडे दिखाने के लिये आ जाती हैं. यही हाल अगले दिन अमुक के स्टेटस में तमुक की सेना करती है.और इस तरह लेन देन चलता रहताहै.एक बार मैने इन दोनों की गहराई से गहराई मापी. समझ में आया.कि ये तो वैचारिक रणुए हैं.जिनका कोई ईमान नहीं है.जिसका आशीर्वाद अधिक उसकी बोली बोलने और नखडे दिखाना शुरू हो जाताहै.एक समय था कि इसी नेटवर्किंग साइटस के सहारे गुजरात के घर के मोदी वाराणसी में हर हर कर रहे थे. पर अब तो यह बिजनेश है साहब.पूरी की पूरी टीम. वैचारिक अंधविश्वास का भक्ति दिखाकर कींचड उलीचने का टेंडर ले रखे हैं.
सालीन वुद्धिजीवी अगर इस अमुक तमुक वाक्युद्ध के चक्कर में फंसा और बुद्धिजीविता का प्रमाण देने की कोशिश किया तो.यह कबड्डी पूरी तरह से मल युद्द में बदल जायेगा.और बुद्धिजीवी को अपने बुद्धिजीवी होने पर कई बार विचार करना पडेगा.अतः सभी बुद्धिजीवियों को यह सलाह है कि इन कालगुजारों के जत्थे में शामिल होने से किनारा करें इससे पहले कि वो आपको किनारा पकडा दें.लाल सलाम के अर्थ को अनर्थ बनाकर अर्थ कमाने वाले ये चालबाज और मोदी भक्ति की चूनर ओढे राष्ट्रभक्ति का ढोंग रचाने वाले तो पाखंडियों की नई पीढी तैयार कर रहे हैं.जिन्हे मुफ्त की "इंटरनेट रेवडियां" बांटकर राजनैतिक पुण्य कमा रहे है।अब मै तो चला एक और अमुक तमुक सेना की राजनैतिक कुरुक्षेत्र की नौटंकी देखने।हां आपसे विनती है.इनके सामने बुद्धिजीवी बनने की मत सोचना दोस्तों।
अनिल अयान,सतना
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