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Saturday, 16 April 2016

प्रथम प्रेम की ममी


प्रथम प्रेम की ममी
मेरे वैचारिक ताजमहल के किसी झरोखे से भूतपूर्व प्रेमिका जो वर्तमान में किसी की धर्म पत्नी बनकर जीवन निर्वहन कर विवाह सुख भोग रही है,के फ्लाइंग किस की पट्टियों से लिपटी प्रथम प्रेम की ममी को आज अचानक ही परत दर पर खोलने की जहमत उठानी पडी।दरारों से राख की हड्डियों के दर्शन हो गये। जैसे जैसे प्रथम प्रेम की ममी के मृत शरीर की पट्टियाँ खुल रही थी।ससुरा प्रेम का धतकरम अपने किये कारनामों के भीतर के दर्द को बयां करने के लिये आतुर हो उठा।
      वो बोला -ग्लोबलाइजेशन के युग में अयान क्यों मुझे इस कब्र की म्यान से बाहर निकाल रहा है।क्यों मुझे नंगा करने में लगा हुआ है।क्यों फ्लर्ट के सामने मेरा पोस्टमार्टम कर रहा है। मैने कहा सुना है कि ईमानदारी से जो नंगा हो जाता है वो अपनी समाधि को प्राप्त हो जाता है।दुर्योधन भी अगर गांधारी के सामने अगर नंगा ईमानदारी से हो गया होता तो बेमौत भीम के हाथों ना मारा जाता।मै बातों ही बातों में बोला कि कुछ वस्तुओं को ज्यादा स्टैंड बाई में रखने पर वो स्विच आफ हो जाती हैं और मै तुम्हे स्टैंड बाई में ज्यादा देर तक नहीं रखना चाहता हूं।
      उससे मेरी बातों को सुन कर ना रहा गया। उसने कहा कि ऐ मूर्ख प्रेम तो अंधा होता है।मै तो अंधा,गूंगा और बहरा तीनों दिव्य गुणों से युक्त हूं। मै कभी प्रथम द्वितीय और तृतीय नहीं होता हूं। मै तो जीवन में एक ही बार होता हूं और अलग अलग पडाव तय कर जीवन भर अपना सफर तय करता हूं। अयान तू खुद बता आज के इस जमाने में कहां चिरकुटों के बीच प्रेमालाप तू करने में लग गया।आज तो मेरी जगह इश्कबाजी नाम की तवायफ ने ले ली है।उसकी चलती फिरती दलाल फ्लर्ट अपनी चालबाजियों के सहारे हवस की हवेली में मेरे साथ रोज ही बलात्कार करती हैं।मै तिल तिल कर मर रहा हूं।उसका बात करते करते गला रुंधने लगा।मैने तुरंत उसे एक गिलास पानी पीने को दिया।वो पानी के दो चार घूंट लगाया और गला साफ करते हुये बोला। यह मेरी विशंगति है कि मै हमेश हर इंशान की जिंदगी में गलत समय में सही प्रेमिका के साथ पैदा होता हूं या फिर सही समय पर गलत प्रेमिका के साथ पैदा होकर उसकी मजबूरी बन जाता हूं।
      प्रथम प्रेम की ममी का नग्न रुग्ण शरीर मेरे सामने था।प्रथम प्रेम के प्रतिबिंब के सौंदर्य और मांसल आनंद मिट्टी में मिल चुका था। उसके अंतर्मन की आवाज और मुखर हुई वो बोला जीवन में प्रथम प्रेम के बहुत से फायदे भी है।सही समय पर सही प्रेमिका के साथ मेरा जन्म लेना जंगल में मंगल मनाने की तरह होता है।खुदा ना खास्ता यदि प्रेमिका का विरह मन में समाता है तो मन भी एकाग्रता के माउंटएवरेस्ट का पर्वतारोही बन जाता है।जहां वो दिन भर अपनी प्रेमिका के बारे में सोचता था अब वो सफलता रूपी प्रेमिका के बारे में सोच सोच कर उसे प्राप्त करने का जतन करता है। इस अतिएकाग्रता की एक हानि भी यह है कि अतिएकाग्रता पगलई के रूप में दिलोदिमाग में हावी होकर प्रेमी को पागलखाने के द्वार खटखटाने के लिये मजबूर भी कर देता है।
      अयान तू खुद समझ एक जब मेरे अन्य पर्यायवाची इश्क मोहब्बत और प्यार जो खुद अपूर्ण है वो जीवन को पूर्णता कैसे दे सकते है।वैदिक काल से देव दानव मानव मेरे नाम पर ऐश किये।आज भी मेरे नाम से हर देश के उद्योग कैश कर रहे हैं।हर पीढी ने पीढी दर पीढी  मेरे जैसे अमृत को मीठे जहर में बदल दिया है। मेरे घुलने से हर रिस्ते में एक भ्रम बना रहता है। जैसे की हर पति पत्नी को पतिव्रता मानने का भ्रम पालकर पूरा जीवन निर्वहन करता है और यही भ्रम उसके सुखद जीवन का आधार बनता है। मैने कहा यार तू सढिया गया है,मां बहन बेटी के प्यार को इस श्रेणी में नही रखा जा सकता है। वो इस तरह के नहीं होते। उसने कहा बेटा अयान ये तेरी वैचारिक म्यान से निकला मनोवैज्ञानिक भ्रम ही है। समय के साथ हर रिस्ता आज के समय में पुराना होता चला जाता है। लोहा जितना पुराना होने लगता है जंग लगने का खतरा उतना ही बढता रहता है। वो बोला अयान इसकी कथा अनंत है,फिर कभी और चलेगा हमारे बीच का बयान।रात्रि का तीसरा पहर प्रारंभ समाप्त होने को है।मेरे जाने का वक्त हो रहा है।
      मैने उसे उसी तरह दोबारा पट्टियों में कैद किया और एक फ्लाइंग किस से हैप्पी वेलेनटाइन डे की मुबारकबाद देते हुये बाय बाय कहा।पर उसके जाने के बाद यही सोचता रहा कि मेरा प्रेम सही समय पर गलत प्रेमिका के साथ था या गलत समय पर सही प्रेमिका के साथ।तभी अचानक फोन की घंटी बजी,उसनींदे मैने अपनी आंख मींजते हुये रिसीवर उठाया तो उधर से मधुर आवाज आई कि हैप्पी वेलेनटाइन डे जान।
अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७

रंग बदलने की होली......


व्यंग्य                                           रंग बदलने की होली......
      फगुआ आ गया मित्रों फिर से, होली का त्योहार हर वरष ही अपने रंग में सभी को रंगने आता है.हम अपनी परंपरा के अनुरूप होलिका दहन करके अगले दिन धुरेणी खेलने को काफी उत्साहित रहते हैं. इस बार जब मै होलिका दहन के समय पर होली सेंकने नजदीक गया तो ऐसा लगा कि होलिका दो बारा प्रह्लाद को लेकर जलती लकडियों के बीच से निकल मेरे सामने आखडी हुई.मै सकते में आगया... मेरे मुह से अचानक निकला- मैने आपको पहचाना नहीं. उसने कहा- अयान रंग लगाने वालों से डर नहीं लगता साहब,रंग बदलने वालों से लगता हैं.. मै होलिका हूं... क्या तुम लोग मुझे हर साल इस फगुआ के दिन जलाते हो.. क्या मै तुम लोगों की रिस्ते में कुछ नहीं लगती... माना कि मैने एक बार इतिहास में प्रह्लाद को लेकर अपनी चिता में खुद जली थी. पर उसकी सजा तो आप सब हर बार मुझे देते है. उस सनातन काल से आज तक हर साल मुझे जला कर खुशी मनाते है... मैने कहा यह तो परंपरा है हमारे धर्म की. तुमने जो कृत्य किया था उसका पश्चाताप करके सम्पूर्ण मानव समाज प्रसन्न होता है.
      वो तपाक से बोल उठी,क्या बकवास करते हो अयान,तुम नहीं जानते क्या. हर साल होली में हम अपने घर को पवित्र करते हैं. नजर उतारने का ढोंग करते हैं और जाकर मेरी चिता में डाल आते है. मेरे साथ तो राई आटा और नमक मिर्च जल जाता है. परन्तु क्या बुरी नजर से अपने परिवार को बचा पाते है. क्या हमारे परिवार, समाज, देश में प्रेम बना रहता है. हमारे जैसे ना जाने कितनी होलिका कितने घरों में छिपी बैठी हैं. क्या उनकी चिता सजती है. शायद नहीं. आज के समय में तो सब मौसम की तरह बदल रहे है, देश का माहौल बदल रहा है. आज कल लोग रंग खेलते नहीं बल्कि बदल लेते है. लोगों के रंग बदलने  की कला के सामने गिरगिट भी शरमा जाते है. मै उसके तर्क से अवाक रह गया. मै चुपचाप उसकी बातें सुनने के लिये विवश था... वो बोलते बोलते एमोशनल हो गई उसकी पलकें भीग गई... वो रोने लगी और बोली- अब किस होली की बात करते हो... आज कल कहां कोई होली मनाता है. सब अपने अपने काम धाम मे व्यस्त हैं. भाभियों को देवरों से बात करने में शर्म आती है क्यों कि कहीं देवरानी प्रश्न चिन्ह ना खडा कर दे, और जीजा साली की बात ही ना करो.. जीजा तो सालियों को अपनी घर वालियों से ज्यादा ही प्यार करने लग गये है, जीजा यदि साली को रंग लगाता है तो बीवी को शक हो जाता है कि.. जीजा कोई गलत हरकत करके मजा ना लेले... हर रिस्ते में रंग बदलने की तेज प्रक्रिया जारी है... वो पुरानी आनंददायी होली की विरासत को भी तुम सब ने होलिका दहन कर दिया है... आज के समय में जीजा मजे लेने के लिये इंटर नेट में सालियों की खोज करते रात भर बिजी होते हैं.. और भाभियां स्मार्ट फोन में खींची गई सेल्फी से हजारों देवरों के साथ अपनी रास लीला करने में व्यस्त होती हैं.
      पलाश और टेशू तो फगुआ के नाम से पहले खिल जाते थे... हंसी खुशी फाग गाते थे और होरियारे गाने बजाने और पीने पिलाने का सुरूर लिये गांव गांव घूमते फिरते थे. पर आज के समय में फेसबुक और व्हाट्स अप में तुम लोगों का होली का त्योहार सिमट गया है. फाग गाने वाले गांवों में रहे नहीं.... हां सुबह से शहरों में शराब के नशे में धुत युवा साथी तेज डीजे की धमक में होली का मजा लेते हैं.... अब तो लगता है कि रंग लगने के लिये तरस रहे हैं.. देश में ऐसा रंग चढा है कि वो कालिख बन गया है....देश को होली का इंतजार ही नहीं करना पडता.. इतने लोग है कि समय समय पर देश का रंग बदलने में वो कभी पीछे नहीं हटते हैं. कभी कन्हैया लाल की जय होती है... कभी भारत माता की जय पर पूरा देश बवाल मचाता है... कभी भारत पाक के रंग में कराची में रंगा नजर आता है तो कभी पेशावर पाकिस्तान के आतंकी रंग में रंग जाता है. कभी नमो नमो का रंग विदेश में चढता है.. तो बिहार और दिल्ली में नमो नमो की घुल जाती है. नेता तो साल भर होली मनाते है.... मै उसकी हर बात को बहुत ही ध्यान से सुनता रहा.. मै समझ गया था कि वो आज होली के न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में खडी है और मेरी पेशी हो रही है.. उसकी हर बात खुद में एक व्यंग्य है. वो बोली- पहले तो फिल्मो के गाने भी होली की याद दिलाते थे होली में जब वो गाने बजते थे तो बूढों को भी जवानी का एहसास होने लगता था.. आज के समय में गाने तो ऐसे हैं कि त्योहार कम और ग्लैमर ज्यादा दिखाई देता है वो ग्लैमर जिसको देख कर युवा तो युवा बच्चों तक की लार टपकने लगे.
      किसानों की होली तो उसी दिन तो जल जाती है जिस दिन गेहूं और धान की बालियां मौसम के रंग बदलने दम टोड दी थी.. अब सोचने वाली बात यह है कि तुम लोग किस लिये होली मनाते हो. रंग फीके पड गये हैं... आज के समय मे होली के रंगों की जरूरत ही नहीं है... मै तो हर साल जलकर राख हो जाती हूं. पर तुम लोग अपने अंदर की होलिका को भी जलाने की कोशिश करों. यदि सभी उसे जला ले गए तो होली में इस बार ज्यादा मजा आयेगा... वो अपनी मुट्ठी में गुलाल और अबीर को मेरी तरफ उछाल कर वापिस चली गई. . तभी होरिया में उडे रे गुलाल... और रंग बरसे भीगे चुनर वाली जैसे गाने की गूंज सुनाई पडी.मैने देखा तो होलिका गुलाल और अबीर उडाते हुये वापिस दहकती जलती होली में समा गई. मै मन ही मन सोचता रहा कि हमारी होली क्या होली तो रंग बदलने वालों की होती है. रंग बरसे क्या .. आज तो रंग तरस रहें हैं कि कोई आये और हमें लगाये.
अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७