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Sunday, 8 August 2021

लम्पटों के शहर में.....

 व्यंग्य

लम्पटों के शहर में.....

वैसे तो हर शहर में लंपट लोग बसते हैं, किंतु मजा जीने का तब है जब लंपटॊं के शहर में हम बस रहे हों, पग पग में ऐसे लोगों के दर्शन हों, और सुबह सुबह से पूरा दिन बहुत बेहतर गुजरे, सुबह की दुआ सलाम की चासनी से सराबोर अभिनंदन मिले और उसके बाद दिन गुजरते गुजरते अपना काम निकलवाने वाले आपके घर चाय पीने आ धमकें, और स्थिति उस समय और आनंददायक हो जाती है जब ऐसे लोगों को चाय पिलाने के बाद हम मना भी न कर पायें अंत में मन मसोस कर फंसी गर्दन छुड़ाने के लिए काम करना पड़ जाये। जब शहर के अधिक्तर लोग दोस्तों की हमशक्ल में बैरी हो जाये तो जीने का आनंद बढ़ जाता है।
लंपटॊं की स्थिति यूँ होती है कि उनके दर्शन आपके पड़ोस में, दोस्तों के बीच, दुश्मनों के बीच, नात रिश्तेदारी में और तो और जाने अनजाने अनजान लोगों में भी मिल जाते हैं, ये लोग काटी अंगुरी मुतान नहीं होते। वैसे तो अनचाहे, अनजाने गले मिलेंगे पर यदि रत्ती भर का काम पड़ जाये तो मजाल है कि इनसे कोई काम निकल सके। इन लोगों के पास मुखौटे भी बहुत से होते हैं, हर पल मुखौटे ऐसे बदलते हैं कि गिरगिट भी इतना तेज रंग नहीं बदल पाता। बिन माँगे सलाह देने वाले और आपके निजी जिंदगी को सार्वजनिक करने वाले ये लंपट कपट के लब्बोंलुआब से सराबोर होते हैं। इन लोगों के अंदर मख्खनबाजी से लेकर चापलूसी का आवरण इनके चरित्र और व्यवहार को ढ़के होता है, ये हमेशा यही महसूस करवाते हैं कि इनसे बेहतर, नजदीकी, शुभचिंतक आपके जीवन में कोई भी नहीं, सब आपके दुश्मन ये आपके परम मित्र हैं।
एक बार काम निकल जाये तो ऐसे लोग आपके जीवन से अचानक लापता भी हो जाते हैं, जैसे विलुप्तप्राय होने का समय आ गया हो, और गाहे बगाहे यदि आप से इनका सामना हो भी जाए तो ऐसे प्रतिक्रिया देते हैं कि जैसे आपसे बड़ा छुतहा कोई न हो। उस समय सारी शुभचिंतकत्व और आकर्षण चुंबक के समान ध्रुवों की भाँति दूरी बनाने लगते हैं। वैसे तो हर शहर में ऐसे विशेष प्रजाति के मनुष्य पाए जाते हैं, किंतु कुछ शहर होते हैं कि जहाँ पर यह मात्रा बहुतायत हो जाती है। इस बहुतायत मात्रा के बीच अल्पमात्रा में निवास करने वाले ज्यादा ही ईमानदार लोग गच्चा खा जाते हैं, ऐसे लोग या तो हथिया लिये जाते हैं, या तो भगा दिये जाते हैं। क्योंकि जब काजल की कोठरी में सफेदपोशी वाला आदमी कदम रखता है तो सफेदी बचाने की असफल कोशिश ही करता रह जाता है।
लंपटी का गुण वैसे तो कोई अपनी अम्मा के गर्भ से सीखकर नहीं आता किंतु दुनिया के रस्मोंरिवाज को निभाने के लिए इस लंपटी में डिग्री और डाक्ट्रेट मिल ही जाती है। लंपट होना व्यक्तित्व का सबसे बड़ा सकारात्मक पहलू होता है, ठीक उसी तरह जैसे खोटा सिक्का कहीं नहीं चलता तो भीख देने के काम में चल ही जाता है। अर्थात उल्लू बनाने के लिए लंपट होना प्रथम शर्त है, इस शर्त को जो मान लेता है, वो दुनिया के किसी कोने में भी चला जाए उसे कोई ठग नहीं सकता, देखिये ठग और लंपट में ईमानदारी का अंतर होता है। ठग ठगी भी ईमानदारी से करता है किंतु लंपट लंपटी करने में ईमानदारी का लिवाज तो ओढ़े रहता है किंतु ईमानदारी का रत्ती भर उपयोग नहीं करता, कुल मिलाकर एक रुपये में तीन अठन्नी भंजाना हो तो ऐसे लोगों को अपने साथ रखना शातिर खिलाड़ियों की शतरंजी चाल होती है।

Saturday, 31 July 2021

सावन में मोहल्लों का सौंदर्यदर्शन

 सावन में मोहल्लों का सौंदर्यदर्शन


सावन भादौं आया नहीं की प्रकृति के सौंदर्य की भाँति नगरों और मोहल्लों के सौंदर्य का भी स्तर बढ़ जाता है। इस सौदर्य के लिए शासन प्रशासन के साथ साथ वहाँ के रहवासी विशेष उत्तरदायी होते हैं, मोहल्लों में सिर्फ झुग्गी झोपडियों की बस्तियाँ ही बस नहीं आतीं बल्कि पाश कालोनियों का सौंदर्य विशेष महत्व रखता हों, झुग्गी झोपडियों में तो वर्ष भर सौदर्य बना ही रहता है किंतु बहुमंजिली इमारतों वाली कालोनियों के सौंदर्य में विशेष वृद्धि वहाँ की सड़कें और नालियाँ करती हैं, या यह कहें कि नालियों से उन स्थानों का सौंदर्य और तीव्र हो जाता है, हल्की फुल्की बारिस की फुहारों का तो आनंद ही कुछ और होता है, किंतु जब नगर निगम के प्री मेंटीनेश सेशन के बाद दौंगरा पड़ता है और तीन चार घंटें इंद्र देव प्रसन्न मुद्रा में नृत्य करते हैं तो बादल इस सौंदर्य की वॄद्धि करने के लिए उतावले हो जाते हैं।

इस समय तो बादल धरती से मिलने के लिये इतनी घनघोर बारिस करते हैं, कि नदियाँ नाले अंगड़ाई लेते हुए उफान मारने लगते हैं, तो इन मोहल्लों की नालियों की क्या बिसात, इन नालियों में फिर पानी समाता नहीं है, नगर निगम के कर्मचारी जितनी मेहनत रोज नालियों का कचरा साफ करने के लिए करते हैं, उससे कम मेहनत में यह पानी नालियों का मलवा निकाल कर रख देता है, साथ ही सफाई व्यवस्था की पोल खोल देता है, इस तरह इस पानी से साथ मोहल्लों में मलवों की लीपा पोती हो जाती है, सड़कें तो सड़कें लोगों के घरों के कमरे भी इस सौंदर्य का आनंद उठाते हैं, कई कालोनियों तो सावन के मौसम में कई कई दिन तक इसकी सुगंध से सराबोर होती हैं, इस समय नगर निगम के सफाई दस्ते के लोग, गुमतियों में चाय गुटखा समोसा भजिया का आनंद ले रहे होते हैं। सावन में बारिस के मौसम में लोग गाड़ी वाले का इंतजार कचड़ा निकाल कर किये रहते हैं लेकिन गाड़ी वाला चार चार दिन तक दर्शन नहीं देता ठीक उसी तरह जैसे बादलों के कारण सूरज के दर्शन नहीं होते। इन मोहल्लों के बच्चे नालियों के पानी में खाले भरे स्थानों के जल भराव के कारण मेढ़कों की टर्र टर्र का खूब आनंद लेते हैं, और शाम समय इसी गंदे पानी से अपना खेल खेलकर मनोरंजन करते हैं। जब ज्यादा बारिस होती है तो सड़कें और नालियाँ पानी में जलमग्न हो जाती हैं, जैसे समुद्र में जहाज जलमग्न हो जाते हैं। इस तरह बहुत से लोगों के कपड़ों में छीटों की बारिस होती है, चलने वालों के साथ वाहन चलाने वाले भी इस दुर्दशा पर सौंदर्य की दुहाई देते हैं।

इस तरह का सौंदर्य मोहल्लों, निचले इलाकों में कई बार आता है, मानसून आने के पहले जितना फंड मेंटीनेंश में आता है, वो इसी तरह की साफ सफाई और व्यवस्था दुरुस्त करने में लग जाता है, सावन भादौं में मोहल्ले और इससे जुड़ी नालियाँ इस सौंदर्य का प्रदर्शन करती हैं, कितने ही वाहन और घर हर वर्ष अपने मालिकों के मरम्मत तो करवाते हैं पर शासन के तरीके से नहीं। सावन भादौं का अपना अपना विवरण होता है किंतु अव्यवस्थाओं से यह विवरण और चरम सीमा पर पहुँचता है। सरकार कहती है कि इस सौंदर्यशास्त्र के लिए रहवासी शाबासी के पात्र हैं और रहवासी कहते हैं कि इसके लिए प्रशासन और सरकार पीठ ठोकवाने के लिए उत्तरदायी इस तरह से दोनों एक दूसरे की पीठ थपथपाकर मन को आनंदित करते रहते हैं। मेरे मोहल्ले में भी कुछ इससे बेहतर सौंदर्य बिखरा हुआ है। मै भी किसी की पीठ थपथपाना चाहता हूँ और ईशवर से यही मनाता हूँ, कि मानसून में प्रकृति के सौंदर्य की तरह मोहल्लों का सौंदर्य भी दिन दूना और रात चौगुना बढ़े ताकि हमारा मुहल्ला भी पेपरों की मेन हेडिंग बना रहे। धन्य हो इंद्र देव आपने आने पर मोहल्ले इतना अच्छा सजते संवरते हैं कि मन आनंद से भर उठता है। ईशवर करे आप ऐसे ही नालियों और मोहल्लों का सौंदर्य बढ़ा कर हमें कृतार्थ करते रहें और धन धान्य से शासन प्रशासन को फलीभूत करते रहें।


अनिल अयान

Sunday, 5 April 2020

हर बात में थू-थू करने की परंपरा


व्यंग्य आलेख

हर बात में थू-थू करने की परंपरा
अपना देश वैश्विक और जैविक महाआपदा की वजह से इक्कीस दिन के लॉक डाउन में अपने अपने घरों में आराम फरमाएगा, ऐसा पूरा देश सोचता है, शासन प्रशासन देश की जनता को ऐसा करने के लिए हर सुविधा मुहैया कर रहा है, ताकि हम खुद को एक दूसरे से सामाजिक और भौतिक रूप से अलग कर सकें और कोविड़ उन्नीस की संक्रमण चैन को अलग कर सकें, देश की जनता को हर तरह से आधात्म और मनोरंजन से जॊड़ने के लिए रामायण महाभारत, चाणक्य, शक्तिमान जैसे धारावाहिक दूरदर्शन मुफ्त में दिखा रहा है ताकि हम मानसिक रूप से विचलित ना हो जाएँ, अपने दैनिक उपयोग की सामग्रियों और अन्य सुविधाओं के लिए सरकार ने निशेधाज्ञा की घोषणा भी नहीं की ताकि हमें कोई दिक्कत ना हो, हमें आवश्यक काम से बाहर निकलने के लिए भी आजादी भी कुछ समय के लिए सरकार ने दे दिया, परन्तु हमारा खुराफाती दिमाग हर बात में कमी निकालने की आदत से बाज नहीं आ रहा है, हर बात में मीनमेख निकालने पर तुला है, हर बात पर थू-थू करके सरकार और शासन की व्यवस्थाओं की बेइज्जती करने पर हम तुले हुए हैं, इसका सबसे बेहतर माध्यम है सोशल मीडिया। कुछ भी होगा हम खुद के चेहरे को लाइव दिखाकर थू-थू करने लग जाएगें। जनता कर्फ्यू से आज तक का अवलोकन करने पर समझ में आता है कि शाबासी देने वाले लोग कम हैं और मुँह में थूकने वाले लोग ज्यादा ही हमारे देश में रहते हैं। आइये देखें जरा कैसे हमारे देश के ये बीमार देश की विभिन्न स्थितियों और निर्णयों में थू थू करने की परंपरा का निर्वहन किया। इसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष भी पीछे नहीं रहा।
      हमारा देश में कोरोना संक्रमण का खतरा जब महसूस हुआ तो, प्रारंभ से ही, सेनीटाइजेशन, हाथ धुलने, और मास्क लगाने की बात जब शासन से सभी तक पहुँचाई तो हम लोगों ने इस बात पर थू-थू किया कि लोगों को बच्चों वाली बाते अब सरकार से सीखना होगा, सरकार, खिलाड़ी, अभिनेता बताएगें कि हाथ कैसे धोना है, माननीय प्रधानमंत्री जी ने जनता कर्फ्यू लगाया और और शाम को पांच बजे शंख, थाली या घंटे बजाने का आह्वान किया ताकि हमारे कर्मवीर चिकित्सक, पुलिस, बिजली विभाग, सफाईकर्मी, के प्रति सम्मान दर्शाया जा सके, लोग उस पर भी थू-थू करने लगे, इस निर्णय के बाल की भी खाल निकालने लगे, कमिया बताने लगे और अंधविश्वासी का तमगा प्रधानमंत्री को सौंप दिये, एक दो दिन के बाद देश में लॉक डाउन की घोषणा इक्कीस दिन के लिए जब प्रधानमंत्री जी ने किया तो पूरा देश सकपका गया, कुछ बुद्धिजीवियों को इस बात का भान हो गया था किंतु अधिक्तर जनता सकते में आ गई, हमारे देश के दूसरे अनुशासन पर्व में अनुशासन की बलि चढ गई, इसकी वजह बेरोजगारी, भूख, परदेश की बेरहमी, और यातायात का बंद हो जाना था, सरकार ने बुद्धिजीवियों की तरह गरीबों पर भी आखिरकार इस तरह थू थू कर दिया, दिखाने के दाँत और खाने के दांत और वाली सरकार ने मजदूरों और पलायन करने वालों पर ऐसा थूका कि वो सैकडों किलोमीटर पैदल चलने को मजबूर हो गए, सरकार ने अपने निर्णय से इन बेसहारों पर थूका तो सोशल मीडिया में तथाकथित टुकडे-टुकड़े गैंग ने सरकार पर थू-थू किया। जल्दबाजी में थू-थू बढी तो सरकार ने इनके लिए कुछ रहमदिली दिखाई, उसमें भी सोशल मीडिया के कर्मवीर वीरता भरी थू-थू कर डाली।
      मरकज में मुस्लिम संप्रदाय का पूरा का पूरा कुनबा कोरोना संक्रमित पाया गया, मौलाना या अनुयाइयों तक जाने अनजाने ने देश भर में कोविड का संक्रमण फैलाया, डाक्टरों और नर्सों पर अश्लील हरकतें की, उनके मुंह में थूका, आइशोलेशन सेंटर में अपनी सभ्यता का परिचय नंगे होकर दिया, इसी समुदाय ने डाक्टर्स की टीम को दौड़ा दौड़ा कर पीटा, अब इससे बड़ी थू-थू दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार की भला क्या हो सकती थी, और तो और मीडिया को जिसे पहले से सिर्फ एक दूसरे पर थूकने और थूक कर चाटने की पुरातन बीमारी है उसने सरकार, मुस्लिम संप्रदाय, शासन प्रशासन की उन्हीं के साये में रहकर खूब थू थू किया। मै इस समुदाय पर थू-थू नहीं कर रहा, क्योंकि इसमें कई बहुत ही नेक दिल के लोग हैं जो अपने मित्र हैं, किंतु कुछ मुट्ठी भर लोगों की थू-थू ने पूरे संप्रदाय के सम्मान में काला धब्बा लगा दिया। जिनको जनता को जागरुक करने की जिम्मेवारी दी गई वो भी मौका परस्त होकर एक दूसरे के मुंह में सिर्फ थू-थू बस नहीं किए बल्कि थूकने से भी बाज नहीं आये, और तो और इस आपातकाल में जब हमारे कलाकार, साहित्यकार, खिलाड़ी, रंगमंचीय लोग, राजनेता, देश में समाजसेवा, दानवीरता का परिचय दे रहे हैं, और फोटो खिंचाकर पूरी दुनिया में अपने द्वारा किए कार्यों का प्रदर्शन कर रहे हैं,  पीएम केयर्स की जमा की गई धनराशि की रशीदों में लाइक और कमेंट्स बटॊर रहे हैं, उन्हें हम किस श्रेणी में रखें यह हम सब खुद निर्णय लें, ।
      जहाँ पर पूरा देश इस जंग में प्रधानमंत्री जी को अपना नेतृत्व मानकर उनकी बात पर रात में नौ बजे नौ मिनट के लिए लाइट बंदकर सम्मान के लिए दिए टार्च या मोबाइल की लाइट जलाकर आभार व्यक्त किया, कर्मवीरों के प्रति सम्मान व्यक्त किया, उस बीच कई लोग प्रधानमंत्री जी से भी आगे निकल कर पटाखे फोड़े, डीजे फ्लोर्स में नाचे गाए, चैत में दीवाली मनाये, यह भी उसी श्रेणी का कार्य किया गया। इस बीच बहुत से सोशल मीडिया के कर्मवीर जो दसवी पास थे वो विद्युत विभाग के अभियंताओं की भांति विद्वान बनकर आपस में तूतू-मैमैं और थू-थू करने में लगे रहे। थू-थू करने वाले लोग, या मुँह पर थूकने वाले लोग यह भूल जाते हैं कि इससे उनकी परंपरा का भी बोध होता है, समय कुसमय थूक कर चाटना इसी परंपरा का एक भाग रहा है। हम भारत के वासी हैं और हमें अपने विचार रखने का पूरा अधिकार संविधान ने दिया है, इस तथ्य को लेकर हमें यह भी अधिकार मिल जाता है कि हम अपनी विद्वता के आवेश में आकर एक दूसरे के मुंह में थू-थू करते रहें और इस तरह अपनी मूर्खता का परिचय देते रहें। ये तो कुछ उदाहरण है, जो मैने अपने ऊपर थू-थू करवाने के लिए आप सबके सामने रखे, लेकिन इस परंपरा से ही हमारा देश महान बन रहा है, विकासशील होने में हमारी थू-थू करने की परंपरा का भी बहुत योगदान है। जिस पर सभी को गाहे बगाहे गर्व कर लेना चाहिए।
अनिल अयान
९४७९४११४०७





Thursday, 19 March 2020

मूर्खिस्तान के मूर्खाधिराज अनिल अयान

मूर्खिस्तान के मूर्खाधिराज
अनिल अयान

विश्व में एक विशेष देश है, मूर्खिस्तान, वहाँ पर विश्वभर के मूर्ख निवास करते हैं, और मूर्खता करके मन ही मन प्रसन्न होने की मूर्खता करते हैं। यहाँ पर मूर्खों की सरकार मूर्खों के द्वारा और मूर्खों के विकास के लिए बनाई जाती है, मूर्खता के लिए देश में राष्ट्रीय मूर्ख पर्व का आयोजन हर वर्ष किया जाता है, उस दिन उस देश के मूर्खाधिराज और सारे मूर्ख नागरिक अपनी सर्वश्रेष्ठ मूर्खता का प्रदर्शन करते हैं, इस आयोजन में मूर्खता की सवश्रेष्ठ प्रस्तुति के लिए बनाए गए निर्णायक भी मूर्खों में सर्वश्रेष्ठ होते हैं, जीतने वाले को मूर्ख श्री, मूर्ख विभूषण, मूर्ख रत्न और मूर्ख भूषण की उपाधि दी जाती है। यहाँ के संविधान को निर्मित करने वाली सविंधान निर्माण समिति में भी देश के सर्वश्रेष्ठ मूर्खों का पैनल बनाया जाता है। इससे यह तो निश्चित होता है कि इस प्रकार के संविधान के किसी भी नियम को कोई भी मूर्ख नेता राज सभा में अपने स्वार्थ के लिए इस संविधान को मूर्खता का प्रदर्शन करके और बहुमत जुटाकर बदल सकता है।
इस मूर्खिस्तान में मूर्खाधिराज का चुनाव भी बड़े हे दिलचश्प अंदाज में होता है, पहले तो नागरिकों के बीच में मूर्ख नेता अपनी मूर्खतापूर्ण भाषणबाजी करता है, फिर मूर्ख नागरिक अपने मूर्ख नेता को कान मुरेर कर वोट देते हैं, चुनाव अधिकारी इन मूर्ख नेताओं से विभिन्न मूर्ख गवाहों के बीच में कान मुरेरने की संख्या पूछकर निश्चित करता है कि जिस मूर्ख नेता के सबसे ज्यादा कान मुरेरे जाते हैं उसे राज सभा में भेजा जाता है, विभिन्न प्रदेशों से आए मूर्ख प्रतिनिधि अपने मूर्खाधिराज बनाते हैं, जो प्रतिनिधि अपनी पीढ़ में सबसे ज्यादा घूंसे सह लेता है वो मंत्री बनता है, और जो सबसे देर तक मुर्गा बनकर अपनी मूर्खता की नुमाइस करता है वो मूर्खाधिराज बनता है। सबसे उम्रदराज मूर्ख राजनेता इस राज सभा का सभापति बनाया जाता है, जिसे सारे मूर्ख नेता प्रतिनिधि और मूर्खाधिराज मुर्गा बनकर सम्मान देते हैं। यहाँ पर मूर्खता को विश्व विख्यात करने वाले उत्पादों की फैक्ट्रियाँ, उद्योग, सर्विस सेक्टर, और शिक्षा के लिए विद्यालय महाविद्यालय और विश्वविद्यालय खोले गए, इन सब में सिर्फ मूर्खता को राष्ट्रीय लक्ष्य बनाकर, मूर्खता की सर्वश्रेष्ट विकास दर को प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयास किया जाता है।
मूर्खता के लिए देश में राष्ट्रीय मूर्ख पर्व का आयोजन हर वर्ष किया जाता है, इस में सब लोग एक दूसरे को मूर्ख बनाने की असफल कोशिश करते हैं क्योंकि मूर्खों को मूर्ख बनाने में सफलता प्राप्त करने वाला सबसे बड़ा पढा लिखा माना जाता है। जिसे मूर्ख नागरिक हसी का पात्र बना देते हैं इस लिए असफल कोशिश करने वाले सर्वश्रेष्ठ नागरिक को जीतने पर मूर्ख श्री, मूर्ख विभूषण, मूर्ख रत्न और मूर्ख भूषण की उपाधि दी जाती है। इस देश की न्याय प्रणाली में भी मूर्खाधीश बैठे होते हैं, जो मूर्ख नेताओं की सुनवाई करने में तो मिनट भी नहीं लगाते किंतु बहन बेटियों के ऊपर होने वाले अत्याचार, और किसानों मजदूरों पर होने वाले अपराधों में न्याय देने पर वर्षों तक विचार करने की सर्वश्रेष्ठ मूर्खता करने से बाज नहीं आते। इस देश में उल्लू बनाने पर आधारित विभिन्न फिल्मों का निर्माण किया जाता है। और सिनेमाघरों में नागरिकों को निःशुल्क दिखाया जाता है। यह भी एक राष्ट्रीय मूर्खतापूर्ण कर्तव्य ही है।
यहाँ के युवाओं को मूर्खाधिराज नौकरी नहीं देते, वो सोचते हैं कि कहीं होनहार युवा अपनी मूर्खता का परिचय देकर उनका पद ना हथिया लें, इसलिए उन्हें पकोड़े तलने और अच्छे दिन के शेखचिल्ली वाले स्वप्न लोक का भ्रमण करने का आदेश दे दिया जाता है। यहाँ के होनहार मूर्ख युवा दिन भर मोबाइल और सोशल मीडिया में अपनी मूर्खता के एक से एक प्रदर्शन करते हैं और लाइक तथा कमेंट से मंत्रमुग्ध रहते हैं, खाली समय में पकोड़े तलते हैं और मूर्खाधिराज का जयकारा लगाते हैं। मूर्खाधिराज इस बात पर खुश हैं कि पूरे विश्व से उनके देश में विभिन्न किस्म के मूर्ख आते हैं, पर्यटक स्थलों में जाते हैं, और मूर्खिस्तान की मूर्खता की ऐतिहासिक इमारतें देखते हैं, और इस तरह पूरे विश्व में प्रचार प्रसार करते हैं। इस देश में विद्वता, होशियारी, चालाकी, ज्ञानी होना राष्ट्रीय अपराध माने जाते हैं, इसके लिए मृत्युदंड ही एक मात्र सजा है, इस प्रकार के अपराधों के लिए कोई भी दया याचिका का प्रावधान नहीं है। मूर्खाधिराज ऐसे मामलों में अपराधियों को मुर्गा बनाकर बेइज्जत किया जाता है। इस देश में अन्य देश न कोई आतंकवाद फैलाते हैं, ना कोई कब्जा करते हैं, ना ही इनको अपना गुलाम बनाना चाहते हैं।
विश्व में विभिन्न देशों में मूर्खाधिराज के पुतले बनाए जाते हैं और पुतले के सामने मूर्खिस्तान के इस मूर्खाधिराज के मूर्खतापूर्ण शासन के किस्से स्वर्णाक्षरों से लिखे गए होते हैं। पूरा विश्व मूर्खिस्तान को विश्व का नौंवा अजूबा मानते हैं। विश्व के पूरी देश जहाँ अपनी बुद्धिमानी से देश को गतिशील बनाते हैं, देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करते हैं वहीं यह देश अपनी मूर्खता से देश को गतिशील बनाए हुए है। इससे बड़ी अचंभित करने वाली घटना विश्व में कभी कभी घटित होती है। इसलिए यह विश्व के लिए किसी अजूबे से कम नहीं है। विश्व भर के विश्वविद्यालयों के स्कालर्स इस देश में मूर्खता पर शोध करने आते हैं, और मूर्खता पर पीएचडी, डीलिट और डीएससी करके जाते हैं।  इस देश में मूर्खता, मूर्खता और मूर्खता का की वास है, पूरा विश्व इन्हें मूर्ख समझने की मूर्खता कर रहा है। परंतु ये अपनी मूर्खता को ही ईश्वर का सबसे बड़ा उपहार और वरदान मानते हैं। जहाँ पूरा विश्व आपसी मारामारी में और एक दूसरे की सुखशांति छीनने में संघर्षरत हैं, एक दूसरे के धर्म को नीचा दिखाने के लिए आपसी कलह का कारण बना है, वहाँ ऐसे मूर्खिस्तानों और मूर्खाधिराजों की मूर्खता पूरे विश्व के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं। हम सबको इनकी मूर्खता पर गर्व है। इनकी मूर्खता महान है, इस देश की शान है, और इसी शान पर पूरा विश्व कुर्बान है।

अनिल श्रीवास्तव "अयान"
श्रीराम गली, दीपशिखा स्कूल के पास
सतना म.प्र.
9479411407
ayaananil@gmail.com

Monday, 6 January 2020

युवाशक्ति, मीडिया और वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष्य

युवाशक्ति, मीडिया और वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष्य

पिछले कई सप्ताह से देश के हालातों को मद्देनज़र बहुत कुछ देखने को, समझने को, और समझकर किसी निर्णय तक पहुँचने के लिए अपने हलक और अल्फाज़ों को कागज में उतर कर आने से रोके रखा। यही सोचता रहा कि सत्तारूढ़ पार्टी कितना देश के उत्थान में योगदान दे रही है। कितने अच्छे ढ़ंग से संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की जा रही है। सरकारे कितना बेहतर ढ़ंग से देश को विकासपथ पर लिए जा रही हैं। वर्तमान सत्तारूढ़ सरकार उसके गृहमंत्रालय के कार्यों पर नज़र डालें और और केंद्रिया गृह मंत्री महोदय के वर्तमान भाषणों को सुने, और उसकी तुलना चुनावी रैलियों और चुनावी पोर्टफोलियों में उल्लेखित बातों करें तो समझ में आता है कि एक वृहद और डरावना आभामंड़ल बनाने की कोशिश की जा रही है। सी.ए.बी. सी.ए.ए, एन.आर.सी,एन.आर.ए. आदि आदि विषयों को इतनी तेजी से संसद में पास किया गया कि असम क्या पूरा देश इसके आवेश में आ गया। कुछ विश्व स्तरीय मसलों में सरकार ने बेहतर ढ़ंग से मोर्चा सम्हाला और उसको काफी हद तक सुलझा भी लिया था। किंतु देश में सरकार को जो काम दरवाजे दरवाजे जाकर इन नियम कायदों के पहले करना चाहिए था वो अब इन नियम कायदों को को लागू करने के बाद करना पड़ रहा है।
चुनावी रैलियों के वो जमीनी वायदे आज में दिलो दिमाग में घुमड़ रहे हैं जिसमें वर्तमान प्रधानमंत्री जी और गृहमंत्री जी माइक में जोर जोर से चिल्लाते थे। जिसमें अच्छे दिन, गुजरात माड़ल, दो करोड़ का हर वर्ष रोजगार, सस्ता पेट्रोल, सस्ता ड़ीजल,  सस्ती रसोई गैस, सबका साथ सबका विकास जैसे बुनियादी मुद्दों की बलि चढ़ाकर उस पर बात करने वालों को मुस्लिम धर्म का पैरोकार बनाने की शाजिस रची जा रही है। विगत दिनों सीएए और एन आर सी के लिए जिस तरह पूरे देश के औसतन विश्वविद्यालय और महाविद्यालयीन युवा सड़कों पर थे, जामिया, ए एमयू, डीयू, जेएनयू के छात्र विरोध कर रहे थे उस समय लग रहा था कि सत्तर के दशक में एमरजेंसी के समय का विरोध जिसमें वर्तमान सत्तारूढ़ दल के लोग अमूमन शामिल रहे होंगे, का रिपीट टेलीकास्ट चल रहा है। उस समय भी हमारे केंद्रीय मंत्री और प्रधानमंत्री यथोचित नियंत्रण युवा शक्ति को सही रास्ते में न ला सके। उच्च शिक्षा मंत्रालय, विधि मंत्रालय, दिल्ली की केंद्रशासित सरकार भी केंद्र के सामने विरोधी बन गए। इतना ही नही देश की बहुमत राज्यों की सरकारें केंद्र सरकार के विरोध में खड़ी हुई।
केद्र सरकार ने जिस समय राम मंदिर मुद्दा सुलझाया, जिस समय सीएए और एनआरसी प्रस्तुत किया, उस समय आवाम इसके बारे में अनभिज्ञ थी, सरकार ने मुसल्मान धर्म को अपने राजनैतिक कदम को हिस्सा बनाकर खतरा मोल ले लिया, लोकतांत्रित देश में इस खतरे का परिणाम उसे सीटें गंवाकर भुगतना पड़ा, चुनावी राज्यों को धर्म, युवाशक्ति, सोशल मीडिया की अंधेर गर्दी में झोंककर केंद्र सरकार जिस तरह शिक्षा के मंदिरों में गुंड़ागर्दी और जल रहे युवा और शिक्षा संस्थानों में मौनी बाबा बन जाना, साथ ही साथ पुलिस के पक्षपाती रवैये को मौन सहमति देना, आने वाले समय में इसके परिणामों को और बुरी तरह से देश और सरकार को भुगतना पड़ेगा। विगत दिनों जेएनयू में जो कुछ हो रहा है, वो सब जानते हैं कि किसकी शह में यह काम हो रहा है। इसके पीछे कुर्सी के राजनैतिक शक्ति के पुंज, केद्रीय सत्तारूढ़ सरकार, राज्य सरकार, और गृह मंत्रालय की असफलता कही जा सकती है, मै यह जानता हूँ कि विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय आयोग की शक्तियों के आगे छात्र संगढ़नों की हुड़दंगी, आगजनी, मारापीटी बौनी है, गृहमंत्रालय के अधिकार इन सब संगढ़नों और उपद्रवियों को ठिकाने लगाने के लिए उपयोग आने चाहिए थे परन्तु, शासन के पहले मीडिया उस मुद्दे को भी वाम दक्षिण पंथ, युवाशक्ति का बंटवारा और आग में घी डालने का काम करना, सोशल मीडिया, को राजनैतिक ट्रालिंग के लिए उपयोग करना, देश की संबंधित राज्य सरकार, केंद्र सरकार की गृहमंत्रालय की असफलता को दर्शाता है।
वर्तमान परिवेश में छात्र संगढ़न और राजनैतिक संगढ़न जिस तरह से उग्र हो रहे हैं, और शिक्षा के मंदिर को युद्ध का मैदान बनाने की कोशिश की जा रही है, विरोध को राष्ट्रद्रोह का रूप दिया जा रहा है, सरकारों का मौन समर्थन देश के वर्तमान परिवेश को गृहयुद्ध, सिविल वार की ओर ले जाने की पहल है, केंद्र सरकार खुले आम हिंदू और मुस्लिम धर्म के आधार पर नागरिकता का प्रचार करना, देश की युवा शक्ति को खौला रहा है, युवाशक्ति को युवाओं की संख्या को राजनैतिक स्वार्थों के लिए राजनैतिक दलों के द्वारा इस्तेमाल करना भी देश की स्थिति के लिए घातक है। मुख्य मुद्दों से भटकना, धर्म आधारित राजनीति करना, संवैधानिक अभिव्यक्ति और विरोध, विपक्ष के अधिकार को कैद करके धाक जमाना, देश को लोकतांत्रित व्यवस्था से मोड़कर एकध्रुवीय सत्तात्मक व्यवस्था की ओर मोड़ रहा है, सरकार जब वैचारिक रूप से युवा और विरोधी दलों विपक्ष और शिक्षा संस्थानों को संतुष्ट करने में उनको इसके लाभ के बारे में असफर रही तब वह धमकी नुमा आवेशित व्यवहार कर रही है, अथवा तथाकथित रूप से करवा रही है, जो आने वाले समय के लिए कार्यकाल पूरा होने के बाद सत्तारूढ़ दल के लिए मुश्किलें खड़ा कर सकती हैं।
आज के समय में सत्तारूढ़ सरकार, और राजनैतिक दल युवाओं की शक्ति को देशविरोधी बनाने का प्रयास कर रही हैं, सत्ता विरोधी विरोध को देश विरोधी बनाने की कोशिश की जा रही है, सरकार के साथ साथ  उसके मंत्रालय, अनुशांगिक संगढ़न भी देश को जलाने के उतावले हैं। मीडिया ने नीर छीर विवेक से जनता को जागरुक बनाने की बजाय बिकी हुई पत्रकारिता करना शुरू कर दिया है। सरकार के निर्णयों को जनता के हित में कैसे संवैधानिक उत्थान के लिए कैसे प्रस्तुत करना है यह भूला जा चुका है। सोशल मीडिया, युवा संगढ़नों, शिक्षा के संस्थानों को भी धार्मिक सीमा रेखा की जंजीर से सरकार ने तौलना शुरू कर दिया है। इस तरह से संकीर्ण घटनाएँ, रोष, आक्रोश, वैचारिक प्रतिद्वंदिता को सुलह तक पहुँचाने की बजाय उसमें रायता फैलाया जा रहा है, देश की आंतरिक स्थिति शीत युद्ध में बदलती जा रही है। यदि जिद्दीपन वाले रवैये को छोड़कर  व्यवहारिक रूप से शांति व्वस्था के लिए पहल करने की आवश्यकता, सरकार के द्वारा लिये गए निर्णयों के प्रति नागरिकों की जागरुकता पर ध्यान देने की आवश्यकता, समस्त राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के प्रति केद्र की जिम्मेवारी को पुर्नचिंतन करना होगा। हिटलरशाही सोच, एक ही सोटे से अनपड़, कम पढ़ेलिखे, ज्यादा पढ़े लिखे,और बुद्धिजीवी वर्ग को हांकने से परहेज करना ही देश के हित में है। युवाशक्ति को मानव संसाधन के रूप में देश हित में मजबूत करना होगा, ना कि राजनैतिक हित में उनको कोयले की तरह आग में झोकें। यदि हम आज अपने देश के युवाओं को अपने निर्णयों के पक्ष में नहीं खड़ा कर सकते तो आने वाले समय में वो आपकी सरकार की देश के विकास में उपयोगिता को नहीं समझेंगें।
अनिल अयान
सतना
 

Sunday, 10 November 2019

"गुरु नानक" से आलोकित सर्वधर्म सम्भाव का प्रकाश

"गुरु नानक" से आलोकित सर्वधर्म सम्भाव का प्रकाश

"काहे रे बन खोजन जाई।/ सरब निवासी सदा अलेपा, तोही संग समाई॥१॥ / पुष्प मध्य ज्यों बास बसत है, मुकर माहि जस छाई। तैसे ही हरि बसै निरंतर, घट ही खोजौ भाई ॥२॥ बाहर भीतर एकै जानों, यह गुरु ग्यान बताई। जन नानक बिन आपा चीन्हे, मिटै न भ्रमकी काई॥३॥
जब गुरुनानक देव जी ने वर्ष 1496 में अपना पहली भविष्यवाणी किया – जिसमें उन्होंने कहा कि “कोई भी हिन्दू नहीं और ना ही कोई मुस्लमान है” और कहा कि यह एक महत्वपूर्ण घोषणा है जो ना सिर्फ आदमी के भाईचारा और परमेश्वर के पितृत्व की घोषणा है,  बल्कि यह भी स्पष्ट है की मनुष्य की प्राथमिक रूचि किसी भी प्रकार के अध्यात्मिक सिधांत में नहीं है, वह तो मनुष्य और उसके किस्मत में हैं।" तब ही उनके अनुयाइयों ने जान लिया था कि भारतभूमि में एक नया आलोक अवतरित हुआ है। एक वह समय था और एक आज का समय है जब पाँच सौ पचास साल गुजर चुके हैं, और हमारा पड़ोसी बिना किसी शर्त के इस निर्णय मे आ गया कि इस अवसर पर करतारपुर कारीडोर इस पुण्य दर्शनार्थ खोलने में एक भी पल की देरी नहीं की, जो स्वागत योग्य था। और एक अच्छे पड़ोसी होने का संदेश भी था।
गुरुनानक देव जी को किसी भी धर्म की बंदिशों में नहीं बाँधा जा सका। क्योंकि उनके द्वारा दी गई शिक्षाओं को खुद कई धर्मों के स्वीकार किया। उनकी उदारता को देश विदेशों में पूज्य माना गया। उन्होंने अपने सिद्धांतो और नियमों के प्रचार के लिए अपने घर तक को छोड़ दिया और एक सन्यासी के रूप में रहने लगे। उन्होंने हिन्दू और मुस्लमान दोनों धर्मों के विचारों को सम्मिलित करके एक नए धर्म की स्थापना की जो बाद में सिख धर्म के नाम से जाना गया। इसी संदर्भ में उनके जीवन की कई घटनाओं से सीख लिया जा सकता है उसमें से पहली घटना जरा देखें जिसमें गुरु नानक देव, जब, लगभग 5 वर्ष के हुए तब पिता ने एक मौलवी के पास पढ़ने के लिए भेजा | मौलवी, उनके चेहरे का नूर देखकर हैरान रह गया | जब उसने गुरु नानक देव जी की पट्टी पर “ऊँ” लिखा, तब उसी क्षण उन्होंने “१ऊँ” लिखकर संदेश दे दिया कि ईश्वर एक है और हम सब उस एक पिता की सन्तान हैं | मौलवी, उनके पिता कालू जी के पास जा कर बोला कि उनका पुत्र तो एक अलाही नूर है, उसको वह क्या पढ़ाएगा, वह तो स्वयं समस्त संसार को ज्ञान देगा |भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हुई |
इसी तरह जब गुरू जी विभिन्न यात्राओं में या उदासियों में विभिन्न देशों की यात्रा कर रहे थे तभी एक एक घटना ने पूरे विश्व को एक सूत्र वाक्य दिया कि ईश्वर एक है और हर जगह विद्यमान है, जो सनातन धर्म में उद्धत किया गया है। इस घटना को एक सीख के रूप में देखा जा सकता है जिसमें गुरु नानक जी नें अपने मिशन की शुरुवात मरदाना के साथ मिल के किया। एक बार गुरु जी रात के समय काबे की तरफ विराज गए तब जिओन ने गुस्से में आकर गुरु जी से कहा कि तू कौन काफ़िर है जो खुदा के घर की तरफ पैर पसारकर सोया हुआ है? गुरु जी ने बड़ी नम्रता के साथ कहा, मैं यहाँ सरे दिन के सफर से थककर लेटा हूँ, मुझे नहीं मालूम की खुदा का घर किधर है तू हमारे पैर पकड़कर उधर करदे जिधर खुदा का घर नहीं है| यह बात सुनकर जिओन ने बड़े गुस्से में आकर गुरु जी के चरणों को घसीटकर दूसरी ओर कर दिया और जब चरणों को छोड़कर देखा तो उसे काबा भी उसी तरफ ही नजर आने लगा| इस प्रकार उसने जब फिर चरण दूसरी तरफ किए तो काबा उसी और ही घुमते हुआ नज़र आया| जिओन ने जब यहे देखा कि काबा इनके चरणों के साथ ही घूम जाता है तो उसने यह बात हाजी और मुलानो को बताई जिससे बहुत सारे लोग वहाँ एकत्रित हो गए| गुरु जी के इस कौतक को देखकर सभी दंग रहगए और गुरु जी के चरणों पर गिर पड़े| उन्होंने गुरु जी से माफ़ी भी माँगी| जब गुरु जी ने वहाँ से चलने की तैयारी की तो काबे के पीरों ने विनती करके गुरु जी की एक खड़ाव निशानी के रूप में अपने पास रख ली|
उन्होने अपने जीवन में वैसे तो बहुत से मत दिए जो धर्म संस्कृति की पृष्ठभूमि को परिभाषित करने के लिए काफी थी किंतु उनकी कुछ शिक्षाएँ उनके द्वारा धर्म, संप्रदाय, पंथ के लिए क्या विचार थे यह स्पष्त करने में काफी हैं, जिसमें, उन्होने सनातन मत की मूर्तिपूजा की शैली के विपरीत एक परमात्मा की उपासना का एक अलग मार्ग मानवता को दिया। उन्होंने हिंदू धर्म मे फैली कुरीतिओं का सदैव विरोध किया। उनके दर्शन में सूफीयों जैसी थी । साथ ही उन्होंने तत्कालीन राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक स्थितियों पर भी नज़र डाली है। संत साहित्य में नानक उन संतों की श्रेणी में हैं जिन्होंने नारी को बड़प्पन दिया है। वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के भारी समर्थक थे। धार्मिक सदभाव की स्थापना के लिए उन्होंने सभी तीर्थों की यात्रायें की और सभी धर्मों के लोगों को अपना शिष्य बनाया। उन्होंने हिन्दू धर्म और इस्लाम, दोनों की मूल एवं सर्वोत्तम शिक्षाओं को सम्मिश्रित करके एक नए धर्म की स्थापना की जिसके मिलाधर थे प्रेम और समानता। यही बाद में सिख धर्म कहलाया। भारत में अपने ज्ञान की ज्योति जलाने के बाद उन्होंने मक्का मदीना की यात्रा की और वहां के निवासी भी उनसे अत्यंत प्रभावित हुए। 25 वर्ष  के भ्रमण के पश्चात् नानक कर्तारपुर में बस गये और वहीँ रहकर उपदेश देने लगे। उनकी वाणी आज भी ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ में संगृहीत है।
एक मूल दार्शनिक, योगी, गृहस्थ, धर्मसुधारक, समाज सुधारक, कवि, देशभक्त और विश्वबंधु के रूप में भी हम सब गुरुनानक देव को देख सकते हैं, उन्हें नानक से गुरु और गुरु से देव बनते महसूस कर सकते हैं, उनके जीवन के सिद्धांतो को वर्तमान संदर्भों में उपयोगिता को समझ सकते हैं। इनके उपदेश का सार यही होता था कि ईश्वर एक है उसकी उपासना हिंदू मुसलमान दोनों के लिये हैं। मूर्तिपुजा, बहुदेवोपासना को ये अनावश्यक कहते थे। हिंदु और मुसलमान दोनों पर इनके मत का प्रभाव पड़ता था। ईश्वर को अपने भीतर ढूंढो. कोई भी मनुष्य दुसरो को अपने से छोटा न समझे. सभी जातियां और धर्म समान है. ईश्वर को पाने के लिए किसी भी प्रकार का बाहरी आडम्बर बेकार है, सभी जाति, धर्म के लोग हो आखिरकार मानव ही तो हैं इसलिए मानव सेवा ही सबसे बड़ा उदार धर्म है, इसलिए उन्होने लंगर की शुरुआत की। एक कवि के रूप में नानक जी ने हुनर दिखाया, नानक जी सूफी कवि भी थे। उनके भावुक और कोमल हृदय ने प्रकृति से एकात्म होकर जो अभिव्यक्ति की है, वह निराली है। उनकी भाषा में फारसी, मुल्तानी, पंजाबी, सिंधी, खड़ी बोली, अरबी के शब्द समा गए थे। गुरबाणी में शामिल है- जपजी, सोहिला, दखनी ओंकार, आसा दी वार, बारह माह प्रमुख रचनाओं के भाग आज भी मौजूद हैं जो पाठ के रूप में किये जाते हैं। अंततः उनकी एक वाणी से अपने इस स्मरण को पूर्ण विराम देता हूँ कि-
हरि बिनु तेरो को न सहाई। काकी मात-पिता सुत बनिता, को काहू को भाई॥/
धरनी अरु संपति सगरी जो मानिओ अपनाई। तन छूटै कुछ संग न चालै, कहा ताहि लपटाई॥
दयाल सदा दु:ख-भंजन, ता सिउ रुचि न बढाई। नानक कहत जगत सभ मिथिआ, ज्यों सुपना रैनाई॥
ब पूरा विश्व इस महामानव की उपयोगिता और शिख धर्म को अनुसरण कर रहा है तो हिंदुस्तान के साथ पाक को तो पहल करना ही था। आइए इस प्रकाश पर्व को वैश्विक स्तर की आध्यात्मिकता तक पहुँचाएँ और अंतर्मन में गुनगुनाएँ।बोले सो निहाल सत श्री अकाल। जो व्यक्ति यह कहेगा कि ईश्वर ही अन्तिम सत्य है उसपर चिकालिक ईश्वर का आशीर्वाद रहेगा।

अनिल अयान,सतना
संपर्क ९४७९४११४०७

Tuesday, 29 October 2019

कुर्सी के रामराज्य में अच्छे दिन


कुर्सी के "राम राज्य" मे "अच्छे दिन....."
अनिल अयान
प्रभु राम अयोध्या लौट आए हैं। राम राज्य आ गया है। अच्छे दिन तो पहले से ही आ चुके थे। अपनी दूसरी पंचवर्षीय में अच्छे दिन बहुत आएं हैं। भगवान राम जी आज भी अयोध्या में तंबू में निवास कर रहे हैं। अदालतें प्रभु राम को रामराज्य में भी रनिवास नहीं दिलवा सकीं। समय गुजरते ही अगले चुनाव तक यह मामला सरकारी दफ्तर के उस अलमारी में गायब हो जाता है जहां बाबू चपरासी और अधिकारियों को भी पसीना बहाना पड़ता है। अच्छे दिन इस तरह से है। कि देश की सत्तारूढ पार्टी की सीटें कम होकर भी मुखिया जी फादर आफ इंडिया के तमगे से प्रसन्न हैं। मन की बात में जनता जनार्दन को सियाचिन ग्लेशियर में स्वच्छता अभियान का संदेश दिया जाता है पर पुलवामा के शहीदों की शहादत को बिसरा भी दिया जाता है। स्वदेशी अपनाओ के संदेश के साथ साथ चाइना का बाजार और तिब्बत शरणार्थियों का बाजार पूरी ठंडक में लोगों को गर्मी देने का काम करता है।
शहरों, कस्बों और गांवों में स्वच्छता अभियान इतना तगड़ा है कि चौराहों में कचड़ा मुंह बना रहा है‌। राजनीति में में स्वच्छता अभियान इतनी तेजी चलाया जा रहा है विपक्ष अपने अस्तित्व की तलाश में व्यस्त हैं। छद्मयुद्ध में हरियाणा ने सत्तारूढ दल को सबक सिखा दिया है। जब से जम्मू काश्मीर और लद्दाख अलग हुए तब से धाराएं प्रवाहित हो रही हैं। जम्मू काश्मीर के राज्यपाल को धरती के स्वर्ग से भी स्थानांतरित कर दिया गया। एक तरफ जहां हर प्रदेश में कमल खिलाने की फिराक में  गृहमंत्री पूरी तरह से व्यस्त हैं। अभी तक को सामान खरीदने बेचने के लिए बाजार सजता था पर अब तो सरकारों के बनने बिगडने के लिए एमपी एमएलए की बोलियां लग रही है। कहीं पर फिफ्टी का मामला चल रहा है। कुल मिलाकर लोकतंत्र का रामराज्य जारी है।
हम सबको इस रामराज्य में धर्म पंथ की भूल-भुलैया मे व्यस्त किया जा रहा है। स्मार्ट सिटी के नाम पर धन को समर्पित किया जा रहा है। मीडिया को दो किनारों की तरह पक्ष और विपक्ष में बांट दिया गया है। राज सेवक सामुद्र के किनारे स्वच्छता अभियान के महाअभियान में परम व्यस्त हैं। मीडिया इस ब्रेकिंग समाचार को जनहित में जारी करने में  टीआरपी मैया के सामने नतमस्तक ह़ो चुकी है। मीडिया भी दो फांकों में बट चुका है। एक सत्तारूढ की चरण वंदना कर शौर्य गाथा गा रहा है। और दूसरा शौर्यगाथाओं के पीछे से नेपथ्य में छिपाए मुख्य मुद्दों को उजागर कर रहा है। चुनाव के समय पर ही विपक्ष दल की विधानसभा सरकारों पर आईबी और सीबीआई के छापे मारे जाते हैं और जेल का रास्ता दिखाया जाता है। त्योहारों के समय पर ही मिलावट और लाइसेंस का ध्यान आता। एक विभाग दूसरे विभागों की टांग खींचने में सबसे आगे रहते हैं। धर्म को अफीम बनाकर रोज की घुट्टी पिलाने में सत्तारूढ़ पूरी तरह से मुख्य धारा को छोड़ अपनी धारा को मुख्य बनाने की जुगत भिड़ा रहा है। धारा एक सौ चौवालिस के बाद जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का क्या हुआ यह जनता ना जान पाई। मीडिया ने इसको दिखाने से परहेज़ किया। कभी सावरकर, कभी सरदापटेल कभी गांधी के नाम पर  राजनीति के साइबर सेल सोशल मीडिया में रायता फैला देते हैंदल दलदल में ही दलित राजनीति कुर्सी के राम राज्य लाने के लिए कर रहे हैं। धर्म की अफीका नशा इतना तगड़ा है कि अमुक धर्म के एक भड़काऊ भाषण देने वाले धार्मिसुधारक को सरे आम कत्ल कर दिया जाता है। और मीडिया उसके पीछे पड़ जाता है उसकी मां जिस मुख्यमंत्री को इसका गुनहगार मानती है, उसी से मिलने और उसी के माध्यम से जब नौकरी और मुआवजे का आदेश मिला तब पूरा परिवार उन्हे धन्यवाद देता है। अमुक और तमुक धर्म को लड़ाने में विभिन्न मीडिया और दल और राम राज्य पूरा प्रयास करते हैं। खींच तान के समय में सत्यता रूढ़ दल का मुखिया चालाकी से मौन धारण कर लेता है। जनता जनार्दन यह चालाकी भी बखूबी समझती है। जनता जानती है कि वो राम राज्य का सुख भोग रही है। जहां पर योजनाओं में लदे हुए वायदे हैं। वायदों के अच्छे दिन है।
चुनावी दौरों की बात हो, अच्छे दिन की बात हो, या मन की बात हो सभी में छिपा उद्देश्य विपक्ष को गरियाना, पड़ोसी देशों की खिल्ली उड़ाना, ढकोसला पूर्ण तथ्यों की बलि दे देना, मुख्य मुद्दों से भटकाना, अर्थव्यवस्था ,सुरक्षा रोजगार, कृषि और किसान के जमीनी हालापर चुप्पी साध लेने का काम किया जा रहा है। जनता को नेताओं की लंगोट बनाकर लपेट लिया गया है। देश में हर शासकीय सेवा का प्राइवेटाइजेशन हो रहा है। जम्हूरियत की बात करने वालों को कारागार की सुविधा दी जा रही है। बाबरी मस्जिद और राम मंदिर तो अब निर्माण की आशा त्याग चुके हैं। सन चौदह और सन उन्नीस के चुनावी एजेंडे खाक छानने में मग्न हैं। देश आर्थिक, सामाजिक, सुरक्षात्मक और राजनैतिक अनुशासन पर्व मनाने में व्यस्त हैं। पर सब प्रसन्न हैं क्योंकि हम सब रामराज्य का सुख भोग रहे हैं। संजय सबकुछ बता रहा है आखिंन देखी। पर धृतराष्ट्र को केशव पर पूर्ण विश्वास है कि चाहे द्वापर हो त्रेता हो या कलयुग रामराज्य में अच्छे पर मंहगे दिन का सुख तो भोगना ही पड़ेगा।  इस रामराज्य में सबकी मनोकामना पूरी हो रही है। सबको इसी का भ्रम है कि सरकार उसका ध्यान रख रही है। और यही भ्रम कुर्सी के रामराज्य के लिए अफीमाई घुट्टी है। जिससे सत्ता का, देश का, दल का और लोक सेवक का दंभ सम्मान अमिट बनेगा, यह कथा अनंत है और अभिप्राय और भी अनंत है। आइये सब मिलकर कर उद्घोष करें , बोलो प्रभु रामचंद्र की जय, सिया बलराम चंद्र की जय, राम राज्य अमर रहे,भारत देश अमर रहे। हम सबका कल्याण हो।।
अनिल अयान।