युवाशक्ति, मीडिया और वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष्य
पिछले कई सप्ताह से देश के हालातों को मद्देनज़र बहुत कुछ देखने को, समझने को, और समझकर किसी निर्णय तक पहुँचने के लिए अपने हलक और अल्फाज़ों को कागज में उतर कर आने से रोके रखा। यही सोचता रहा कि सत्तारूढ़ पार्टी कितना देश के उत्थान में योगदान दे रही है। कितने अच्छे ढ़ंग से संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की जा रही है। सरकारे कितना बेहतर ढ़ंग से देश को विकासपथ पर लिए जा रही हैं। वर्तमान सत्तारूढ़ सरकार उसके गृहमंत्रालय के कार्यों पर नज़र डालें और और केंद्रिया गृह मंत्री महोदय के वर्तमान भाषणों को सुने, और उसकी तुलना चुनावी रैलियों और चुनावी पोर्टफोलियों में उल्लेखित बातों करें तो समझ में आता है कि एक वृहद और डरावना आभामंड़ल बनाने की कोशिश की जा रही है। सी.ए.बी. सी.ए.ए, एन.आर.सी,एन.आर.ए. आदि आदि विषयों को इतनी तेजी से संसद में पास किया गया कि असम क्या पूरा देश इसके आवेश में आ गया। कुछ विश्व स्तरीय मसलों में सरकार ने बेहतर ढ़ंग से मोर्चा सम्हाला और उसको काफी हद तक सुलझा भी लिया था। किंतु देश में सरकार को जो काम दरवाजे दरवाजे जाकर इन नियम कायदों के पहले करना चाहिए था वो अब इन नियम कायदों को को लागू करने के बाद करना पड़ रहा है।
चुनावी रैलियों के वो जमीनी वायदे आज में दिलो दिमाग में घुमड़ रहे हैं जिसमें वर्तमान प्रधानमंत्री जी और गृहमंत्री जी माइक में जोर जोर से चिल्लाते थे। जिसमें अच्छे दिन, गुजरात माड़ल, दो करोड़ का हर वर्ष रोजगार, सस्ता पेट्रोल, सस्ता ड़ीजल, सस्ती रसोई गैस, सबका साथ सबका विकास जैसे बुनियादी मुद्दों की बलि चढ़ाकर उस पर बात करने वालों को मुस्लिम धर्म का पैरोकार बनाने की शाजिस रची जा रही है। विगत दिनों सीएए और एन आर सी के लिए जिस तरह पूरे देश के औसतन विश्वविद्यालय और महाविद्यालयीन युवा सड़कों पर थे, जामिया, ए एमयू, डीयू, जेएनयू के छात्र विरोध कर रहे थे उस समय लग रहा था कि सत्तर के दशक में एमरजेंसी के समय का विरोध जिसमें वर्तमान सत्तारूढ़ दल के लोग अमूमन शामिल रहे होंगे, का रिपीट टेलीकास्ट चल रहा है। उस समय भी हमारे केंद्रीय मंत्री और प्रधानमंत्री यथोचित नियंत्रण युवा शक्ति को सही रास्ते में न ला सके। उच्च शिक्षा मंत्रालय, विधि मंत्रालय, दिल्ली की केंद्रशासित सरकार भी केंद्र के सामने विरोधी बन गए। इतना ही नही देश की बहुमत राज्यों की सरकारें केंद्र सरकार के विरोध में खड़ी हुई।
केद्र सरकार ने जिस समय राम मंदिर मुद्दा सुलझाया, जिस समय सीएए और एनआरसी प्रस्तुत किया, उस समय आवाम इसके बारे में अनभिज्ञ थी, सरकार ने मुसल्मान धर्म को अपने राजनैतिक कदम को हिस्सा बनाकर खतरा मोल ले लिया, लोकतांत्रित देश में इस खतरे का परिणाम उसे सीटें गंवाकर भुगतना पड़ा, चुनावी राज्यों को धर्म, युवाशक्ति, सोशल मीडिया की अंधेर गर्दी में झोंककर केंद्र सरकार जिस तरह शिक्षा के मंदिरों में गुंड़ागर्दी और जल रहे युवा और शिक्षा संस्थानों में मौनी बाबा बन जाना, साथ ही साथ पुलिस के पक्षपाती रवैये को मौन सहमति देना, आने वाले समय में इसके परिणामों को और बुरी तरह से देश और सरकार को भुगतना पड़ेगा। विगत दिनों जेएनयू में जो कुछ हो रहा है, वो सब जानते हैं कि किसकी शह में यह काम हो रहा है। इसके पीछे कुर्सी के राजनैतिक शक्ति के पुंज, केद्रीय सत्तारूढ़ सरकार, राज्य सरकार, और गृह मंत्रालय की असफलता कही जा सकती है, मै यह जानता हूँ कि विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय आयोग की शक्तियों के आगे छात्र संगढ़नों की हुड़दंगी, आगजनी, मारापीटी बौनी है, गृहमंत्रालय के अधिकार इन सब संगढ़नों और उपद्रवियों को ठिकाने लगाने के लिए उपयोग आने चाहिए थे परन्तु, शासन के पहले मीडिया उस मुद्दे को भी वाम दक्षिण पंथ, युवाशक्ति का बंटवारा और आग में घी डालने का काम करना, सोशल मीडिया, को राजनैतिक ट्रालिंग के लिए उपयोग करना, देश की संबंधित राज्य सरकार, केंद्र सरकार की गृहमंत्रालय की असफलता को दर्शाता है।
वर्तमान परिवेश में छात्र संगढ़न और राजनैतिक संगढ़न जिस तरह से उग्र हो रहे हैं, और शिक्षा के मंदिर को युद्ध का मैदान बनाने की कोशिश की जा रही है, विरोध को राष्ट्रद्रोह का रूप दिया जा रहा है, सरकारों का मौन समर्थन देश के वर्तमान परिवेश को गृहयुद्ध, सिविल वार की ओर ले जाने की पहल है, केंद्र सरकार खुले आम हिंदू और मुस्लिम धर्म के आधार पर नागरिकता का प्रचार करना, देश की युवा शक्ति को खौला रहा है, युवाशक्ति को युवाओं की संख्या को राजनैतिक स्वार्थों के लिए राजनैतिक दलों के द्वारा इस्तेमाल करना भी देश की स्थिति के लिए घातक है। मुख्य मुद्दों से भटकना, धर्म आधारित राजनीति करना, संवैधानिक अभिव्यक्ति और विरोध, विपक्ष के अधिकार को कैद करके धाक जमाना, देश को लोकतांत्रित व्यवस्था से मोड़कर एकध्रुवीय सत्तात्मक व्यवस्था की ओर मोड़ रहा है, सरकार जब वैचारिक रूप से युवा और विरोधी दलों विपक्ष और शिक्षा संस्थानों को संतुष्ट करने में उनको इसके लाभ के बारे में असफर रही तब वह धमकी नुमा आवेशित व्यवहार कर रही है, अथवा तथाकथित रूप से करवा रही है, जो आने वाले समय के लिए कार्यकाल पूरा होने के बाद सत्तारूढ़ दल के लिए मुश्किलें खड़ा कर सकती हैं।
आज के समय में सत्तारूढ़ सरकार, और राजनैतिक दल युवाओं की शक्ति को देशविरोधी बनाने का प्रयास कर रही हैं, सत्ता विरोधी विरोध को देश विरोधी बनाने की कोशिश की जा रही है, सरकार के साथ साथ उसके मंत्रालय, अनुशांगिक संगढ़न भी देश को जलाने के उतावले हैं। मीडिया ने नीर छीर विवेक से जनता को जागरुक बनाने की बजाय बिकी हुई पत्रकारिता करना शुरू कर दिया है। सरकार के निर्णयों को जनता के हित में कैसे संवैधानिक उत्थान के लिए कैसे प्रस्तुत करना है यह भूला जा चुका है। सोशल मीडिया, युवा संगढ़नों, शिक्षा के संस्थानों को भी धार्मिक सीमा रेखा की जंजीर से सरकार ने तौलना शुरू कर दिया है। इस तरह से संकीर्ण घटनाएँ, रोष, आक्रोश, वैचारिक प्रतिद्वंदिता को सुलह तक पहुँचाने की बजाय उसमें रायता फैलाया जा रहा है, देश की आंतरिक स्थिति शीत युद्ध में बदलती जा रही है। यदि जिद्दीपन वाले रवैये को छोड़कर व्यवहारिक रूप से शांति व्वस्था के लिए पहल करने की आवश्यकता, सरकार के द्वारा लिये गए निर्णयों के प्रति नागरिकों की जागरुकता पर ध्यान देने की आवश्यकता, समस्त राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के प्रति केद्र की जिम्मेवारी को पुर्नचिंतन करना होगा। हिटलरशाही सोच, एक ही सोटे से अनपड़, कम पढ़ेलिखे, ज्यादा पढ़े लिखे,और बुद्धिजीवी वर्ग को हांकने से परहेज करना ही देश के हित में है। युवाशक्ति को मानव संसाधन के रूप में देश हित में मजबूत करना होगा, ना कि राजनैतिक हित में उनको कोयले की तरह आग में झोकें। यदि हम आज अपने देश के युवाओं को अपने निर्णयों के पक्ष में नहीं खड़ा कर सकते तो आने वाले समय में वो आपकी सरकार की देश के विकास में उपयोगिता को नहीं समझेंगें।
अनिल अयान
सतना