वर्तमान परिस्थितियों में जब कलम को हर शहर लंपटों से भरा नजर आने लगे तब वहां पर कुछ ना कुछ अजीबो गरीब होता ही रहता है. इन्ही पडतालों का दस्तावेज जो जाने अनजाने ही कलम ने एक दम से उगल दिया. मै यह दावा नहीं करता की ये व्यंग्य हैं परन्तु व्यंग्य नुमा शायद कुछ बन पडा हो तो यह लंपटों की मेहरबानी के अलावा कुछ भी नही होगा,....
Monday, 19 November 2018
बहुत जल्दी चल दिये सुकुमार बाल और नवगीतों के सम्राट
दौड़ा-दौड़ा, भागा-भागा सा बेचारा जीवन
अंधाधुध "भक्ति" का शक्ति प्रदर्शन
हमारे नगर में फिर पधारा नवरात्रि का उत्सव नौ दिन और दशहरे की धमक से गूँजता दसवाँ दिन नगर को महानगर की संस्कृति और सभ्यता जोड़ ही देता है। अच्छा तो है कि इस मामले में हमारा नगर अछूत तो नहीं रहा, अब तो वर्ष दर वर्ष भक्ति भी आधुनिक होती जा रही है। आधुनिकता के अंधानुकरण ने भक्ति को अंधाधुंध रूप में प्रभावित भी किया और सच्ची भक्ति को शक्ति प्रदर्शन में प्रवाहित भी कर दिया। अब तो यह शक्ति प्रदर्शन आदिशक्ति साधना का आड़ंबर प्रतीत होता है। भक्ति में बालीवुड़ के गीतों को शामिल करने की वो होड़ है जो बेजोड़ भक्ति को टोड़कर घोर अपराध कर दिया है। समय, समाज, बाजार, और स्टेटस सिंबल ने भक्ति रस में भी सोमरस से लेकर कामुक ऋंगार रस तक को समावेश कर डाला। हमारी आस्था और विश्वास को बाजार में बेंच कर बाजारू रवैये के साथ यह उत्सव महोत्सव में तब्दील हो रहा है। सचाई तो यह है कि इन सबके बीच भी कहीं कहीं भूली बिसरी आध्यात्मिक आस्था की नैसर्गिक सुगंध नाक में आकर बसेरा डालती है तो लगता है कि हमारी नाक कहीं तो सुरक्षित है। वरना इन स्टेट्स सिंबल को माब लिंचिंग के जरिए आस्थाएँ भी मीटू कैंपेन में शामिल होने के लिए सोशल मीडिया में अपना एकाउंट बनाने के लिए जीरो फिगर मेंटेन किए हुए हैं।
पितृ पक्ष की शांति को बोझ मानते हुए गणेश उत्सव से छूटे पंडाल पर किसी का डेरा न हो, इसलिए पितृपक्ष को चुपचाप संसद में चलने वाले मौसमी सत्र में विपक्ष स्वरूप मानते हुए एड्वांस बुकिंग कर दी जाती है। बैठकी के पहले से ही चौराहों, सड़कों, और गलियों में नव दुर्गा समितियों के पंडालों का कद रावण के कद और उसके दंभ को और बढ़ा देता है। दुर्गा जी के विराजमान होते ही मोहल्ले के तथाकथित मजनूँ, टपोरी, और उचक्के किस्म के वो युवा जो फिलहाल पान की दुकान में सिगरेट के धुएं से छल्ले बनाने, बाइक की टू सीटर में चार लोगों का जुगाड़ बनाने वाले स्टंटबाज, और स्कूल से मेडिकल लीव लिए अतिसंस्कारित सपूत कपूत दिन रात चंदा एकट्ठा करने में एक कर देते हैं, इसके लिए मोहल्ले के नेता, पार्सद, मंत्री और स्वनाम धन्य लाल बत्ती वाले लक्ष्मी पुत्रों के नाड़े ढी़ले किए जाते हैं, पंड़ाल में वो लोग जरूर रात्रि जागरण करते हैं जिनकी रात्रि जागरण अन्य दिनों में चैटिंग और मोबाइल स्क्रीन में नीले चित्र देखने के आदी होते हैं। यहाँ से चोरी की विद्युत मंड़ल की बिजली लेकर उन्ही की छाती में मूंग दलते ये नव दुर्गा उत्सव समिति वालों का नौ दिन सारी अंगुलियाँ, उत्सव, भक्ति, ऐश्वर्य, वैभव, ऐश, और दिखावे से परिपूर्ण होती है, ये सभी हर शाम को मोहल्ले की स्त्रियों को भजन संध्या के लिए जरूर आमंत्रित करते हैं और इसी बहाने सेल्फी उत्सव और फेसबुक लाइव शो जारी रहता है, समय समय पर भक्ति संगीत के साथ साथ भक्ति नृत्य के नाम पर फैशन, मेकब, बाजार और स्टाइल को ओढ़ने वाले ये पल पूरी तरह से रहीशी का प्रदर्शन ही करते हैं। यहाँ वही लोग चुनरी ओढ़कर तथाकथित भक्ति का प्रदर्शन करते दिखते हैं जिनकी नज़रें सिर्फ चुनरी के पीछे कुछ झांकने में व्यस्त होती हैं, आदत से मजबूर जो गये हैं वो लोग।
इन्हीं नौ दिनों में कन्या भोज के नाम से मुहल्ले भर की बेटियों को बटोरने का उत्सव होता है। वो परिवार जिनके घरों में पढ़ने लिखने वाली नौनिहालों को साल भर रगड़ के काम कराया जाता है, कन्या भोज के दिन भी उनकी ड्यूटी सुबह से ही लग जाती है, क्योंकि वो कन्याएँ कन्या भोज की कन्याओं से अलग हैं अर्थात अछूत जो हैं, कन्याओं का परिवार की महिलाओं के द्वारा अपहरण करके जबजस्ती नौ कन्याओं की पूर्ति की जाती है, कुछ परिवार शारदेय नवरात्र में तो नौ से नौ सौ तक कन्याओं को भोजन करा कर खुद पीठ थपथपाते हैं किंतु चैत्र नवरात्र में वो ही सब कन्याओं को भोजन कराना तो दूर पूजा करना, उनको सम्मान देना भूल जातेहैं ना जाने कौन सा अजगर उन्हें सूँघ जाता है। कन्या भोज अब मात्र ट्रेंड बनकर रह गया है, जैसे एक भेंड दौड़ते हुए कुएँ में गिरती है तो पूरा का पूरा समूह देखा सीखी बंटाधार कर देता है।कन्याओं की अस्मिता पर नज़र रखने वाले वो सभी सफेदपोश इस अवसर में अपने दागों को छिपाने के लिए और दाग पर भक्ति का निरमा रगड़ने वाले यह पुण्य सरिता में अपना हाथ जरूर साफ करना चाहते हैं। लेकिन अफसोस इस अवसर पर भी इनकी लार टपकने और आंतरिक बारिश की पोल खोलने का मौका नहीं चूकती। महिलाओं से बेटियों तक इस समय सर्वपूज्य बनी होती हैं। कई लोग तो इस समय पर भी इन्हें हरामजादी,कुल्टा और कुलनाशिनी का सम्मान देकर विभूषित करने से बाज नहीं आ रहे हैं। ये सब मी टू कैंपेन से खार खाए और अपने नासूरों में खार लगाए बुद्धिजीवी लोग हैं। इनकी बुद्धिजीविता भी इस समय अपने सर्वश्रेष्ठ स्टेट्स सिंबल को बनाने में व्यस्त हैं। ये भूल गए हैं कि इनको पैदा करने वाली माँ, राखी बाँधने वाली बहन, इनके लिए अपना घर छोड़कर आने वाले पत्नी, और इनके घर को छोड़कर पराई होने वाली बेटी भी इसी श्रेणी में नहीं आती क्या?
महाराष्ट्र से चलने वाले गणपति उत्सव, गुजरात से चलने वाले गरबा रास और डाँडिया, बंगाल से चलने वाले नौ दुर्गा उत्सव चरण जब देश भर में फैल रहे हैं तो गरबा डांडिया उत्सव में भी पारंपरिक परिधान के साथ साथ वैभव पैर पसार रहा है, शादी के शुभ मुहुर्त के इंतजार में बैठे शादी के पैलेस, और शादीघर गणपति उत्सव से ही इनकी तैयारियों में व्यस्त भी हो जाते हैं और पस्त भी हो जाते हैं, नगर की खूबसूरती इन पंडालों में तो दिखती ही हैं बदसूरती भी मेकब के पीछे छिपी होती है, यह सूरती तन से लेकर मन तक फाउंडेशन, लिपिस्टिक, और फेश पैक के मुखौटे के पीछे नौ दिनों के लिए दुबक जाती है, भारी भरकम जाम के झाम को समेटे ये मनोरंजन के संसाधन अपने प्रसाधन तक का इंतजाम करने में असफल होते दिखते हैं, इस उत्सव में मेकब, ड्रेस, स्कूल, कालेज, हर समाज के युवा समिति के पदाधिकारीगण, और नेता नपाड़ी, फैक्ट्रियाँ तक इस महारास में अपनी अपनी आहुति देते नजर आती है, मीडिया पार्टनर के रूप में इस अवसर में अखबारो के डेहरी खनने पर आधुनिकता इन्हें विवश कर देती हैं। युवाओं से लेकर सुगर, बीपी, और जोड़ों के दर्द वाले बुजुर्ग भी अपने आप को जवान महसूस करने लगते हैं। यही जवानी की रवानी उनकी खुशियों का पुण्य स्थापित करती है।
दशहरा उत्सव में रावण वध और रामलीला तो रामलीला समाज की चिंता और शासन की चिंता के हवाले हो जाती है, रावण के कद को पुतले के कद के साथ बढ़ा दिया जाता है। इसको बढ़ाने में कारीगरों की पूरी फौज गड्डी गिनने में खुश होती है। राम हनुमान और लक्ष्मण का चरित्र रामलीला में मंचन करने वाले बेरोजगारी के चलते इस अवसर को हर वर्ष भोग कर आगे नौकरी की तलाश में बाहर निकल जाते हैं, पारंपरिक रूप से रावण मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों में बमों, और पटाखों के जरिए तेज आवाज के साथ उनका औपचारिक वध कर दिया जाता है। राम जानकी लक्ष्मण की विजय यात्रा निकाली जाती है। रावण मन ही मन अपने भाई और बेटों के साथ इस मानव प्रजाति को अनाब सनाब बोलता रह जाता है कि क्यों हर साल यह ढ़कोसला कर रहे हो नालायकों, तुम्हारी पीढियों में ही छुपे चरित्रहीन, मानव के रूप में राक्षस, मौजूद हैं, उन्हें तुम लोग पूज रहे हो और मेरे पुतले को जलाकर मेरी पांडित्य पूर्ण सलाह को पटाखों की प्रतिध्वनि में विलुप्त कर देते हो। अब तो ये मुखौटे निकाल लो सच्ची श्र्द्धा भक्ति से आस्था का निर्वहन करो, गुनहगारों को सजा दिलवाकर आज के रावण को मारो। स्टेटस सिंबल बनाने और इसे अपडेट करने से जिंदगी न चलेगी महामानवो के पीछे छिपे मुखौटाबाजों।
अनिल अयान,सतना
स्वतंत्र पत्रकारिता, साहित्य-समाज का अजेय झंड़ावरदार गणेश शंकर विद्यार्थी
जन्म दिन - २६ अक्तूबर १८९०
”जो कलम सरीखे टूट गये पर झुके नहीं, उनके आगे यह दुनिया शीश झुकाती है
जो कलम किसी कीमत पर बेची नहीं गई, वह तो मशाल की तरह उठाई जाती है”
उपर्युक्त पंक्तियां सुकवि रामकृष्ण श्रीवास्तव ने तब लिखी थी जब युवा ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष का शंखनाद कर रहे थे। वैचारिक प्रतिरोध समाजिक आवश्यकता बन चुका था, विरोधात्कम वैचारिक युद्ध पत्रकारिता के द्वारा चलाया जा रहा था, वैसे तो सतना के वरिष्ठ पत्रकार चिंतामणि मिश्र की पुस्तक पत्रकारिता की चुनौतियाँ पुस्तक का एक परोवाक अनुच्छेद में उद्धत है कि " हिंदी पत्रकारिता का जन्म ही राज सत्ता के संघर्ष के लिए और शासकों के शोषण को नंगा करने के लिए हुआ था किंतु अब पत्रकारिता खुद नंगी हो गई है, आज समाज के भीतर तक अकुलाहट, नालायकी और क्षुब्धता व्याप्त है। नाना प्रकार के राजनीतिक धार्मिक और आर्थिक पाखंड आम आदमी की छाती पर मार्चपास्ट कर रहे हैं और पत्रकारित धृष्टराष्ट्र की भूमिका निर्वहन कर रही है। जब जेब और पेट भरने के लिए फेके गए सत्ता के टुक्ड़ों को रेंग रेंग कर बटोरना ही लक्ष्य बना लिया गया हो तो गाड़ी बाड़ी और साड़ी सुलभ हो जाती है किंतु पेट और जेब तो रंडियों के दलाल भी भर लेते हैं टुच्चई करके पैसा बनाना है तो इस पेशे से आसान और भी धंधे हैं।"
पत्रकारिता का पोस्टमार्टम करता और कट कापी पेस्ट के इस युग में पत्रकारिता के नाम पर कागज की लिपाई पुताई करने वालों के लिए तात्कालिक गणेश शंकर विद्यार्थी को जानना समझना और जुझारूपन के साथ वैचारिक विवेचना करना आज की महती आवश्यकता है। यह सच है कि आजादी के पहले का समय और भारत की स्थिति और आज की स्थिति में भारत की परिस्थितियाँ पूरी तरह से अलग हो चुकी है। भारत की वो युवा शक्ति और युवा लेखनी की धार राजनीति की धार के सामने मंद हो चुकी है। आज के समय में कुछ समाचार पत्रों को छोड़ दें तो वो मॉब लिंचिंग की तरह भीड़ की उपज बन चुके हैं। कई अखबार तो समय की नजाकत से मुंह मोड़ते हुए खाना पूर्ति का काम करने में मगन हैं।
पहले पैरा में व्यक्त पंक्तियाँ स्वराज के लिए अपना तन, मन, धन और जीवन समर्पित कर देने वाले अमर शहीद और कलम के धनी जनयोध्दा गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे जुझारू व्यक्तित्व की शान में ही लिखी गई थी। विद्यार्थी जी ने पत्रकारिता के जरिये स्वराज को जनांदोलन बना डाला था, उस समय बंदूख और सत्याग्रह दोनों आमने सामने आ चुके थे, स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की भी दो जमात हो चुकी थी, गरम दल और नरम दल के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आंतरिक कलह के चलते किनारा पकड़ने लग गये थे। महावीर प्रसाद द्विवेदी की सरस्वती पत्र की संपादकीय टीम मे रहे गणेश शंकर विद्यार्थी में वो ललक जुनून और समय की गति को पहचानने की छमता थी कि उन्होने पत्रकारिता और कलम की सत्ता के चलते अंग्रेजी सत्ता और परतंत्रता के विरोध में कलम को हथियार बनाकर कूद गए, फिर तो एक समाचार को चलाकर उसे किसी और युवा को सौंप कर अन्य समाचार पत्र को सम्हालने का सिलसिला चल पड़ा. ‘हमारी आत्मोसर्गता’, भारत मित्र, बंगवासी, महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के पत्र ‘अभ्युदय’,‘प्रताप’,'प्रभा' जैसे प्रमुख पत्रों को विद्यार्थी जी ने विद्यार्थी की तरह पाला पोसा उससे कुछ सीखा और फिर स्वतंत्रता के लिए अपने विचारों के महाकुंभ को चेतना के स्वरों के साथ समर्पित कर दिया।‘झंडा ऊंचा रहे हमारा’ गीत जो श्याम लाल गुप्त पार्षद ने लिखा था. उसे भी 13 अप्रैल 1924 से जलियांवाला की बरसी पर विद्यार्थी ने गाया जाना शुरू करवाया था।
विद्यार्थी जी सिर्फ पत्रकार ही नहीं थे बल्कि एक अच्छे विचारक, चिंतक, साहित्य और समाज के सक्रिय और अजेय झंड़ावरदार भी थे, पठन पाठन के प्रति उनकी रुचि दिनों दिन बढ़ती गई। उन्होंने अपने समय के विख्यात विचारकों वाल्टेयर, थोरो, इमर्सन, जान स्टुअर्ट मिल, शेख सादी सहित अन्य रचनाकारों की कृतियों का अध्ययन किया। वे लोकमान्य तिलक के राष्ट्रीय दर्शन से बेहद प्रभावित थे।पंडित मदन मोहन मालवीय के विचारों से सहमत होकर वो अभ्युदय की संपादकीय टीम के हिस्सा बने। महात्मा गांधी ने उन दिनों अंग्रेजों के खिलाफ अहिंसात्मक आंदोलन की शुरूआत की थी जिससे विद्यार्थी जी सहमत नहीं थे, क्योंकि वे स्वभाव से उग्रवादी विचारों के थे उनका स्पष्ट मानना था कि उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि हम राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन, सामाजिक आर्थिक क्रांति, जातीय गौरव, साहित्यिक सांस्कृतिक विरासत के लिए, अपने हक अधिकार के लिए संघर्ष करेंगे।नानक सिंह की ‘सौदा ए वतन’ नामक कविता और काकोरी काण्ड के नायक रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा को उन्होंने ‘प्रताप’ की प्रेस से ही प्रकाशित किया था। इसके बाद से ही प्रताप और विद्यार्थी जी पराधीन भारत में बदनाम पत्रकार और पत्र के संपादक के रूप में सुप्रसिद्ध हो गए।
इतना ही नहीं जब उन्हें जेल की चार दीवारी में रहना पड़ा तो तब भी वो साहित्यिक माहौल में रहे उनका सानिध्य जेलयात्रा के दौरान माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, सहित अन्य साहित्यकारों से भी हुआ। उन्होने उस समय इन रचनाकारों की रचनाओं और उससे उपजते देश प्रेम तथा स्वतंत्रता संग्राम में इनकी रचनाओं से उत्पन्न चेतना का बारीकी से पारखी की तरह अध्ययन किया और जीवन के अंतिम दौर तक कौमी एकता के लिए संघर्ष करते रहे।हसरत मोहानी जिन्होंने गजल लिखी है, चुपके-चुपके रात-दिन आंसू बहाना याद .... गणेश शंकर विद्यार्थी और उन्नाव के हसरत मोहानी साहब बहुत अच्छे दोस्त थे. हरसत मोहानी की 1924 में जब जेल से वापसी हुई तो गणेश शंकर विद्यार्थी ने उनकी तारीफ में प्रतापमें एक लेख लिखा था. जिसमें उन्होंने लिखा था कि मौलाना को मजहब के नाम पर झगड़ने वालों को रोकना चाहिए. और मोहानी ही हैं जो गांधी जी के बाद लोगों को मजहब के नाम पर एक-दूसरे को मारने से बचा सकते हैं।
विद्यार्थी जी साम्प्रदायिक के घोर विरोधी थे और उन्होंने जीवनभर एकजुटता, कौमी एकता पर जोर दिया। जिस कौमी एकता के लिए वो लड़ते रहे, जिस संप्रदायिता के लिए वो विरोध दर्ज करते रहे यह विधि का विधान ही था कि दंगों के चलते ही कलम का यह सिपाही मौन हो गया। एक लावारिश लाश की तरह इसकी विचारशीलता भी अपने तन को छोड़कर लोगों के मन में घर कर गई। सन अट्ठारह सौ नब्बे से सन उन्नीस सौ एकतिस तक उनका जीवन परतंत्र भारत में ही चलता रहा। उनकी कलम ने विरोध के स्वरों को हवा देने का काम किया। वो ऐसे पत्रकार थे जिन्होने स्वतंत्रता को पत्रकारिता से वृहद रूप से जोड़ने का काम किया। पत्रकारिता के जनक और पोषक के रूप में उनका काम हमेशा स्मरणीय रहेगा। आज पत्रकारिता का जो भी रूप हमारे सामने है वह कहीं ना कहीं आदि पत्रकार देवर्षि नारद, विद्यार्थे जी और माखनलाल चतुर्वेदी प्रभाश जोशी, जैसे कलमकारों से होता हुआ वर्तमान तक पहुँचा है, पत्रकारिता के नाम पर जितनी चकाचौंध आज मौजूद है वह शायद उस समय नहीं थी जब गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे कलमकारों ने स्वातंत्रता संग्राम को फतेह करना ही पत्रकारिता का मिशन बनाया था, जिसमें विचार, दृष्टि और निर्णय शामिल था। आने वाली पत्रकारों की पीढी इन पूर्वजों के विचारों को पहचान पाएँ यह इस समय में सबसे बड़ी पत्रकारिता की चुनौती है।
अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७
खुदे शहरों में "खुदा" को याद करें
ये खुदे - खुदे से शहर,अब ऐतबार बिल्कुल भी नहीं।
खुदा को याद करना है अब इंतजार बिल्कुल भी नहीं।
खुदाई से ही नई सभ्यताओं की खोज हुई हैं पुरातत्व विभाग इसी को मूल मंत्र मान कर अपने कर्तव्य निष्ठ होने की पुष्टि करता है। खुदाई की इसी परंपरा का निर्वहन पुरातन काल असे आज तक हमारे मुंसिबदार भी कर रहे हैं। इस समय जब सुबह सुबह निकलो तो ऐसा लगता है कि हम हड़्प्पा और मोहनजोदड़ों के पुरातन नगर में पहुंच गए हैं। जहाँ पर फिर कोई नई खुदाई नई सभ्यता को जन्म देने वाली है। यह जन्मोत्सव का बरहौं कब होगा यह अज्ञात है। किंतु एक बात तो तय है कि इस खुदाई की परंपरा का असर सरकार के स्वास्थ्य में जरूर पड़ा है। यही वजह रही है कि इस तरह की खुदाई करके सृजन करने का काम उन्हीं को दिया जाता है जो इस मामले में प्रायोगिक रूप से नौसिखिये हैं और कागजाती मामले में निपुण हैं। इससे सरकारी कार्य की गुणवत्ता का स्तर भी स्तरीय हो जाता है। खुदाई के इस धूल धक्कड़ी सम्राज्य में हर रहवासी अपने जानमाल और स्वास्थ्य के लिए खुदा को जरूर याद करता है। अगर राजा का स्वास्थ्य सुधरा हुआ है तो कुछ प्रजा को भी खुदा की नेमत मिलनी ही चाहिए।
खुदाई के चलते इस समय प्रशासन बहुत ज्यादा सकते में है क्योंकि वो जानता है कि यह माहौल आने वाले चुनाव के लिए संक्रामक है। इस संक्रमण के चलते कहीं वोटों को धूल वाली सर्दी खांसी बुखार हो गया तो वोटिंग के दिन वो बीमार होकर खटिया ही टोड़ेगा और इसका परिणाम यह होगा कि मतगणना के दिन पार्टियों का हाल बेहाल हो जाएगा क्योंकि खस्ताहाल शहर की खुदाई करने और नई वोटतंत्र की सभ्यता की खोज करने की कोशिश बेमानी ही होती है। इस बेमानी वाले धतकरम में मरन हम सबकी तो होती है किंतु सरकारों प्रशासनों और जिलाधीशों की ज्यादा मरन होती है क्योंकि समय समय पर चुनावी दौरे होते हैं, पुलिस से लेकर आलाकमान अफसर तक राष्ट्रीय नेताओं की अगवानी करने के सिर दर्द को झेलने के लिए मनोवैज्ञानिक रूप से खुद को तैयार करते हैं। उस समय इन खुदे शहरों की तथाकथित अच्छे दिन वाली एक्स्प्रेसवे सड़कों को थोड़ा बहुत सड़क के रूप में परिभाषित करने के लिए नगर निगम और नगर पालिका के कर्मचारी युद्धस्तर की तैयारी करते हैं सोचते हैं कि राजाधिराज को कोई खबर नहीं है किंतु वो ये नहीं जानते कि जब राजाधिराज खबरों के बिस्तर में ही चैन की नींद लेते हैं तो ये खुदाई वाली खबरें उनसे बेचारी कैसे छिपी होंगी।
ऐसा नहीं है कि सिर्फ जमीनी खुदाई की जा रही है। सोशल मीडिया में तो वैचारिक खुदाई करने का भी ठेका ठेकेदारों को उसी तरह दिया गया है जैसे शराब के ठेकेदारों को रेवड़ी बांटी जाती है। इस समय सोशल मीडिया में सिर्फ दो स्थान है। राष्ट्रभक्तिस्थान और देशद्रोहिस्थान इन स्थानों के वासी होने के लिए सिर्फ एक मापदंड़ का विधान है। अगर आपको सरकार की नीतियों को आँख मूँद कर
समर्थन करने का अंधभक्तित्व गुण प्राप्त हैं तो पहले स्थान के निवासी हैं अन्यथा विरोधियों के लिए सिर्फ दूसरा स्थान सुनिश्चित है। इन स्थानों में काम की बातें और मुद्दों को संदेहास्पद बनाया ही जाता है साथ ही साथ भ्रांतियों को फैलाने का पुण्य कार्य भी किया जाता है। कुल मिलाकर इस स्थान पर चौर्यकला से निपुण लोग भीड़ को नियंत्रित करने का कार्य करते हैं, अर्थात नागरिकों को सस्ते से सस्ते दर में इंटरनेट उपल्ब्ध करवाकर बेरोजगारी को कम करने का सीना पीटने वाली कंपनी की कृपा से उन बिंदुओं को पटल से गायब कर दिया जाता है, जिनके बारे में जनता को सोचना चाहिए, बल्कि उन मुद्दों को मॉब लिंचिंग के लिए परोस दिया जाता है जिनका देश के विकास और अर्थव्यवस्था से दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं है।
उपर्युक्त पैरा का एक छोटा सा उदाहरण मी टू और सेम टू यू वाला लिया जा सकता है खाई अघाई किस्म के फुरसतिए सेलेब्रिटीज ने मीटू हैश टैग से विद्रोह की आँधी ला दीं। जब तक शोषण से अवशोषित होकर नाम दाम मिलता रहा तब तक सब जायज रहा अब उसी दबे अत्याचार की दुहाई देकर विद्रोह की ज्वलंत आग लगाने का यह कैंपेन पूरे देश को उसकी मूलभूत चिंता से भटका दिया। देश को नौकरी, अर्थव्यव्स्था, बैंको का कर्ज, किसानों की मौतों, राज्यों की आपसी झड़प छिप गई। इन संबंधित महिलाओं को चाहिए था कि न्याय पालिका में पिटीशन दायर करके केश करती और कुसूरवार को सजा दिलवाती, या महिला आयोग के साथ मिलकर न्यायसंगत निर्णय के लिए पहल करतीं किंतु उन्हें तो कंट्रोवर्सी और लाइक कमेंट्स का ताजमहल खड़ा करना था, जिसमें वो केंद्र बिंदु में दिखाई दें। इसी का दूसरा उदाहरण पटाखों को फोड़ने में घंटे निर्धारित करने का विषय, दिल्ली वायु प्रदूषण से आत्म हत्याकरने के लिए दिन गिन रही है, और पटाखों के बदले ग्रीन दीवाली का प्रचार करने की बजाय इस पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है जबकि पटाखों का आयात और विक्रय पर सरकार और शासन का की नियंत्रण है। सरदार पटेल की मूर्ति बनवाने के लिए भी चीन का माल आयात करने पर खूब धमा चौकड़ी मचाई जा रही है, वहाँ पर स्वदेशी व्यव्स्था को घेरे में लिया जा रहा है।
राजनैतिक दल अपने कार्यकर्ताओं की वफादारी की भी खुदाई करने में व्यस्त हैं। चुनाव में सत्तारूढ़ होने का सपना लेकर पुराने से पुराने तथा उम्रदराज कार्यकर्ताओं की वफादारी का डीएनए टेस्ट करके उनकी आत्मा की खुदाई कर दी गई। परिवार वाद के नाम का बुल्डोजर चलने की वजह से उम्मीदवारों की उम्मीद पर पार्टियों ने ऐसे पानी फेरा कि विद्रोह का स्वर यहाँ भी फूट पड़ा वफादारों ने भी पार्टी को बता दिया कि पार्टी उन्हें मॉब लिंचिंग न करे, वो सोशल मीड़िया के अंध भक्त नहीं हैं जो अपनी राजनैतिक जीवनी को पार्टी के संस्मरण के लिए बलिदान कर दें, निर्दलीय लड़कर वोट को पतंग की तरह लूट लेने का गुण इन्हीं वफादार कार्यकर्ताओं से सीखा जा सकता है।यह विरोध उसी तरह है जैसे स्वतंत्रता समर मंगल पांडे ने किया था। लोकतंत्र के इस पर्व को महापर्व बनाने की मैराथन में जागरुकता कार्यक्रमों के चलते सिर्फ चुनाव आयोग की आचार संहिता से बच कर अपने स्वार्थ को सिद्ध करने का हुनर भी इस वैचारिक खुदाई में खुदा को याद करा ही देती है।
कुल मिलाकर खुदाई करना अब सर्वव्यापी कृत्य हो गया है। इससे कितना सृजन होगा यह कोई नहीं जानता। किंतु सुविधाभोगी समाज में असुविधा व्याप्त है। शहर से लेकर गाँव कस्बे और शहर से लेकर राजधानी और महानगर तक इस संवैधानिक और ऐतिहासिक सुविधा से त्रस्त हो चुकी है। सब अंतर्मन में राम राम जप रहे हैं, परंतु यह संदेह है कि राम राम का संबोधन कहीं हे राम में ना बदल जाए। क्योंकि दोनों संबोधन आज के समय में पार्टीगत हो गए हैं। अब देखना यह है कि इस संबोधन में कहीं सीता राम कहने वालों का समावेश हो गया तो जय श्री राम कहने वालों की परंपरा की निर्वाध गति में कितना वेग उत्पन्न होता है। क्योंकि खुदाई से गति अवरोधक तो खुद बखुद बन ही जाते हैं जिन्हें नैसर्गिक विडंबना के रूप में क्षमा नहीं किया जाएगा। अंततः इतनी खुदाई होने के बाद देश के लोकतंत्र में कितना गतिअवरोधक निर्मित होगा। इस यक्ष प्रश्न के उत्तर के लिए भविष्य के गर्भ में जाना शेष है।
अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७
तेरा "दीप" जले.. मेरा "दिल"
सत्ता स्वयंवर विवाह समारोह
सत्ता फिर से दुल्हन बनने के लिए तैयार खड़ी है, चुनाव रूपी बारात की तिथि, चुनाव आयोग नामक पुरोहित ने विचार दिया। फिर से विधान सभा नामक ससुराल सजाई जा रही है। इस विवाह के स्वयंवर में सभी वर अपने अपने भाग्य को आजमाने के लिए मैदान में युद्ध स्तर की तैयारी कर चुके हैं। कई तो वर के रूप में सिद्ध होने के लिए वोटों की गणित के प्रमेय सिद्धि में देव और देवी द्वार माथा टेक रहे हैं कई सत्ता के पूर्व प्रेमी भी विरोध का बिगुल बजाकर हुंकार भर चुके हैं और ढंके की चोंट में कह रहे हैं, प्रेम सिद्ध ना हुआ तो स्वयंवर में सिद्धि तो प्राप्त हो ही सकती है। हाथ आजमाने में क्या जा रहा है। कुछ राशि ही तो जा ने वाली है। सबसे बड़ी बात यह है कि कई उम्मीदवार इस स्वयंवर में सम्मान निधि के नाम पर दान दक्षिणा में मिले हुए गरीबों के द्वारा चलने व ना चलने वाले सिक्के भी मटकों में भरकर ला रहे हैं। ताकि गड्डियों को इससे दूर रखा जाए। अन्य विवाह समारोह में वर पक्ष पार्टी अपनी आर्थिक सम्म्पन्नता का खूब बखान अतिशयोक्ति पूर्ण करते हैं। यहाँ तो उम्मीदवार इसमें में अन्योक्ति अलंकार का प्रयोग करते हुए बताते कुछ और हैं और होता कुछ और....। उन्हें इस बात की भरपूर डरावनी आशा होती है कि कहीं आयोग पुरोहित उनकी चल अचल संपत्ति को काला धन की श्रेणी में लाकर स्वयंवर से उनका पत्ता साफ न कर दे। सबसे बड़ी मजेदार बात यह है कि पुरोहित को जिस तरह के मंत्रों का उच्चारण करना होता है वो जानता है कि पूर्व प्रेमी उम्मीदवार के लिए कौन सा मंत्र बाँचना है और वधु प्राप्ति के लिए ताजे उम्मीदवार के लिए कौन सा मंत्र बाँचना है।
इस बार के विवाह समारोह में पुरोहित ने उम्मीदवारों की खर्च सीमा का आधार कार्ड़ और बैंक अकाउंट से सीधा संबंध स्थापित कर लिया है। सभी संवाददाताओं को सख्त आदेश है कि वो हर जगह के उस उम्र के सभी उम्मीदवारों को यह निमंत्रण पत्र भी हल्दी चावल लगाकर दिया जाए ताकि थोक का थोक स्वयंवर की परीक्षा आयोजित किया जा सके। पुरोह्ति को सत्ता सुख भोगने के लिए और संतानोत्पत्ति हेतु उचित वर खोजने में प्रायिकता का सिद्धांत भी सही सिद्ध हो सके। वर पक्ष के उम्मीदवारों की राजनैतिक परिवार भी इस स्वयंवर में ऐसे लिप्त हैं जैसे उम्मीदवार को नहीं बल्कि उनके परिवार के हर सदस्य को शहनशाह की पदवी मिलना तो तय ही है और हुकूमत करने का मौका रखा रखाया है। इस स्वयंवर का उत्सव इतना ज्यादा उत्साह जनक है कि पुरोहित और उसने शिष्य़ गण भी इस स्वयंवर विवाह को सम्मपन्न कराने के लिए सत्ता के मायके के घराती बने हुए हैं। इस अवसर पर गाहे बगाहे, निमंत्रण पत्र के साथ साथ, सोमरस, और सम्मोहित करने हेतु मुद्रा अंतरण तक चलाया जा रहा है। इस समारोह की खासियत यह भी है। उस उम्र के हर व्यक्ति को मजबूरी वस स्वयंवर में उम्मीदवार का समर्थन करने जाना ही है। इस यात्रा करने वाले व्यक्ति को हम मतदाता के नाम से जानते है। वैसे तो वो समर्थन करता है और उम्मीवार को स्वयंवर में सफलता की कामना अपनी मजबूरी और स्वार्थवश करता है। किंतु वो जानता है कि सत्ता सुख भोगने का वरदान मात्र पुरोहित ने वर और उसके राजनैतिक परिवार वाले भाई भतीजों के नाम ही किया है। समर्थकों को महज मुंगेरीलाल के हसीन सपने ही दिखाए जाते हैं ये वो समर्थक होते हैं जिनके जयकारे से स्वयंवर की परीक्षा में उम्मीदवार का हौसला अफजाई होता है। जितना तेजी से ये उम्मीवार की जय बोलते हैं पुरोहित के सामने उसकी उतनी ही इमेज बनती है। यह सच है कि ये सारे उम्मीदवार सिर्फ इमेज ही बनाने में लगे रहते हैं, मलाई तो कोई और खा जाता है।
इस समारोह का माहौल कुछ ऐसा होता है कि राजनैतिक खानदान भी इसकी रसमलाई को चख ही लेते हैं, वो उम्मीदवारी के लिए बोली लगवाते हैं, रायसुमारी करवाते हैं, यह देखा जाता है कि जातिगत, धर्मगत कौन सा सदस्य खानदान की नाक कटाएगा नहीं, स्वयंवर में सत्ता के लिए वो अंतित दौर तक स्वयंवर से बाहर न होगा। कौन है जो साम दाम दंड भेद का प्रयोग करके सत्ता स्वयंवर में अपना परचम लहराएगा और खूँटा गाड़ेगा। कुल मिलाकर यह समझिये कि सिंहावलोकन करने के बाद ही स्वयंवर के लिए वर को सजाया जाता है। हालाँकि यह भी सच है कि सत्ता वो चंड़ी होती हैं जो अपने स्वयंवर में हासिल किए गए वर को आने वाले पाँच साल के जीवन में सिर्फ नचाती ही रहती है। नाच नाच कर वर स्वयंवर के इस सुख को भोगता रहता है। और पाँच साल के बाद सत्ता फिर तैयार खड़ी हो जाती है नई नवेली दुल्हन का मेकब करके वर को भोगने हेतु। वर को यह महसूस होता है कि वो सत्ता सुख भोग रहा है, सत्ता को यह महसूस होता है कि वो वर सुख भोग रही है। और इस तरह दोनों का यह भ्रम सरकार रूपी वैवाहिक रथ को पाँच साल की अवधि तक पहुँचा ही देते हैं। रही सही कर समर्थकों रूपी मतदाता सिर्फ जय जयकार करने में ही लीन रहते हैं और उन्हें भी इस बात का भ्रम होता है कि वो भी सत्ता सुख नहीं भोग पा रहे तो क्या हुआ, कम से कम सत्ता सुंदरी का वर वधु आमंत्रण के माध्यम से दीदार करने का परमानंद तो प्राप्त हो रहा है। भौतिक ना सही तो मनोवैज्ञानिक सुख तो प्राप्त ही हो रहा है। पुरोहित इस बात के भ्रम में रहता है कि वर पक्ष के प्रतिद्वंदियों की वजह से यह पंचवर्षीय स्वयंवर कराने के लिए वो वर के राजनैतिक खानदानों, और पूर्व प्रेमियों के निर्दलीय छोटे परिवारों में सुख का रामराज्य व्याप्त कर पा रहा है। इसी तरह उसकी दक्षिणा भी उनकी झोली में चली जाती है।
इस स्वयंवर से एक प्रतिफल यह होता है कि हारे हुए वर उम्मीदवार अगले पाँच सालों के लिए सत्ता के पूर्व प्रेमी बनकर विभिन्न समारोहों में सत्ता की पतिव्रतत्व और पति की पत्नीव्रतत्व पर अफवाहों के बीज बोते रहते हैं, कभी कभी पति की कालगुजारियों पर परदा हटाने का काम, उसको बेवफा बनाने का दायित्व ये निर्वहन करते हैं, कभी कभी सत्ता इनकी बातों में आकर वैवाहिक कांटेक्ट खत्म कर देती है अन्यथा वो भी जानती है कि काहे की वफादारी और कितनी वफादारी,सब माया है इस माया में जब तक भोगना वरदान में मिला है तो भोगने का परमानंद उठाते रहो और आगे पाँच वर्ष के बाद उसे पति की दौलत तो मिलनी है और फिर वो दुल्हन की तरह सजेगी ही फिर को नए वर की तलाश में नये स्वयंवर को रचने ले किए और खानदान बदलकर नये स्वाद को चखने के लिए, कुल मिलाकर स्वादानुसार वर चयन की प्रविधि ही राष्ट्र को गतिशील बनाए हुए है। राष्ट्र कितना गतिशील है या विकसित हो रहा है यह तो मतदाता समर्थक, वर प्रतिद्वंदी, सत्ता सुंदरी, पति परमेश्वर, और पूर्वप्रेमी अपने अपने चश्में से देखते हैं, किसी को विकास स्थिर दिखता और किसी को विकास जेट विमान की रफ्तार से दिखता है। आइए इस स्वयंवर की यज्ञ पीठिका में आहुति देने चलें, उम्मीवार की जय जयकार करने कुछ आहुतियाँ दान करके महादानी कर्ण का तमका हाशिल करके आएँ।
अनिल अयान ,सतना
९४७९४११४०७
Friday, 16 March 2018
गिरिगिटिया साहित्यकार
गिरिगिटिया साहित्यकार
सृष्टि ने जब साहित्यकारों को पैदा किया। तो उसने यह सोचा कि साहित्यकार अगर चिंता करेगा तो चिंतन करने का समय नहीं प्राप्त कर पायेगा। इसलिए चिंता में चिंतन करने का दायित्व साहित्यकार के खाते में चला गया। जिस प्रकार साल भर में छः ऋतुए होतीहैं। इन छ ऋतुओं के अनुरूप प्रकृति का मिजाज बदलता है उसी तरह साहित्यकार नामक जीव का मिजाज भी इसी प्रकृति के अनुरूप बदलने लगा। इसी प्रकृति के अनुरूप साहित्यकार ने भी कभी कभी आपदा लाने की चेष्ठा की इसे प्राकृतिक आपदा की भांति साहित्यिक आपदा का नाम दिया गया। कई साहित्यकारों ने समय,समाज,अनुभव के अनुरूप अपने वास्तविक रंग को बदलने की कोशिश की, कुछ इस कोशिश में डार्विन के प्राकृतिक चयन के सिद्धांत को हू ब हू लागू किया और दौड़ में सबसे आगे चयनित रूप से खडे मिले, ऐसे साहित्यकार छपासरोगी साहित्यकारों की तुलना में अपने कुछ साहित्यिक अंगो का विकास इस तरह किया कि लेमार्क ने उपयोगिता और अनुपयोगिता का सिद्धांत उनके साहित्यिक जीवन को चरितार्थ कर दिया।
इस तरह के साहित्यिक रंग बदलने वाले साहित्यकार साहित्य की विरादरी के झंडावरदार बन बैठे या यह कहा जाए कि झंडावरदार होने का भ्रम पाल लिया। इस भ्रम ने इनकी उम्र के अनुरूप इन्हें हमेंशा रंगीन बनाए रखा, इनका स्थानीयता से ताल्लुकात उतना ही था जितना कि मंच में स्थित कुर्सी और माइक के सामने वाले विघ्नसंतोषी वक्ता का होता है। इस तरह के विशेष प्रजाति के साहित्यकार साहित्य कर्म में कम निपुण और राज कर्म में पूर्णतः निपुण हो गए और क्यों न हों आखिरकार इन्हें अपनी झंडावरदारी को बरकरार रखना था। इनकी आत्मस्लाघा इतनी ज्यादा रही कि अपने साहित्य कर्म की प्रशंसा अपने हम उम्र प्रशंसकों से ही लिखवाई जाती रही समय समय पर पत्र पत्रिकाओं में भेजा जाता रहा और इंतजार किया जाता रहा कि कब वह अंक नजरों के सामने हो और आत्मसुख प्राप्त किया जा सके। यह तो स्वाभाविक है कि जब साहित्यकर्म की प्रशंसा ही लिखी जाएगी तो दबाव वश कोई प्रशंसक ऐसे साहित्यकारों के विरोध में लिख कर बैठे बिठाए बैर क्यों भंजाएगा। ऐसी स्थिति में यह देखा गया कि अगर कोई स्थानीय संपादक ने उस प्रशंसा को अपनी पत्रिका का हिस्सा बना लिया, राष्ट्रीय सुख के पहले ही खतरे की घंटी छाप कर बजा दिया तब तो स्थानीय स्तर पर ऐसे साहित्यकारों को ही फुस्स बोलना पड़ गया। तब तो ऐसे साहित्यकार तिलमिला जाते हैं क्योंकि ऐटम बंब की प्राकृतिक आपदा फैलाने वाले वे आपदा लाने से पहले ही फुस्सी बंब की तरह लोकल में कैसे आगए। यह तो उनका राष्ट्रीय अपमान है। इस राष्ट्रीय अपमान का बदला राष्ट्रीय पत्रिका के प्रकाशन के पश्चात ही लिया जाता है।
ऐसे साहित्यकार सामान्यतः मुखौटों के सौखीन होते है, क्योंकि बिना मुखौटों के कही वास्तविक रंग अगर दिख गया तो साहित्यिक विरादरी में बिन बात के ही थू थू हो जाएगी, कभी गुस्से का मुखौटा, कभी निवेदन का मुखौटा, कभी वैर का मुखौटा, कभी मौन का मुखौटा, कभी व्यंग्य का मुखौटा इस श्रेणी के मुखौटे के रूप में उपयोग लाए जाते हैं। इन मुखौटो के मोह में ना जाने कितने नवोदित चमचे फंसते चले जाते हैं। इन साहित्यकारों की अपनी जमात होती है, ये संस्कारी ऐयाश होते है, ऐयाशी भी संस्कार देखकर करने में ये माहिर होते हैं, इनके मुँह में राम बगल में छुरी होती है, ये अपने ऊपर अनुसंधान तक करवाने के लिए लालायित होते हैं, जिसे पेड अनुसंधान भी कहा जा सकता है। ऐसे साहित्यकारों को नेपथ्य में दम घुटता है, इनको चांदनी रात की दूध सी नहाई रोशन बहुत प्रिय होती है, वैसे ऐसे साहित्यकार साहित्यिक चाणक्य की प्रतिध्वनि होते है, ये साहित्यकार कोपलों का स्वागत तो करते हैं परन्तु इन कोपलों को सहलाते सहलाते इनकी नीयत इनको ही धोखा देने लगती है। ऐसे साहित्यकारों को गुरुडम से विशेष लगाव होता है। ऐसे साहित्यकार अपने आचरण छूने वालों में स्नेह लट्ठ बरसाते हैं, चरण छूने वालों को स्नेह बरसाते हैं, हमारा देश का साहित्य का औसतन आधा हिस्सा इन्ही साहित्यकारों की सेवा की वजह से फल फूल रहा है। ऐसे साहित्यकारों की गुरुआई जहां देखो वहीं शुरू हो जाती है। ये साहित्यकार गजब का बोलने में तो माहिर होते हैं किंतु अजब का लिखते हैं।इन साहित्यकारों में प्रशंसा की डाइबिटीज, छपास रोग का ब्लड प्रेसर, कार्यक्रमों के मुख्य अतिथि का कैंसर, और सम्मान का एड्स जैसी लंबी बीमारी होती हैं। उम्र के साथ ये बीमारी इन साहित्यकारों के रंग और मिजाज को झेलाऊ बनाने का काम करती हैं। इस झेलाऊ मिजाज के चलते ये अकेलेपन के शिकार हो जाते हैं, यह शिकारी इन्हें साहित्यिक दीवालिया बना देता है, ये नया लिखने की बजाय पुराने लिखे, छपे, पर ही मंत्रमुग्ध होते रहते हैं, यह मंत्र मुग्धता इनकी साहित्यिक पागलपंथी की पक्की सुबूत हो जाती है। अंततः समय के न्यायालय में इनका मूल्यांकन शून्य हो जाता है, क्योंकि इनके अंदर साहित्यिक आत्मचिंता की काई जमा हो चुकी होती है इसकी वजह से मनो वैज्ञानिक और समाजिक रूप से साहित्य के दोषी करार होकर इन्हें रंग बदलते समय के अनुरूप धूल की परतें चढवा कर चुनवा दिया जाता है। ऐसे धूल की परतो के बीच चुने गिरिगिटिया साहित्यकारों को मेरी आने वाले पुस्तें बारंबार प्रणाम करेंगी।
(यह किसी साहित्यकार के व्यक्तिगत साहित्यिक जीवन का मूल्यांकन नहीं हैं।)
अनिल अयान
Tuesday, 13 March 2018
गिरिगिटिया साहित्यकार
सृष्टि ने जब साहित्यकारों को पैदा किया। तो उसने यह सोचा कि साहित्यकार अगर चिंता करेगा तो चिंतन करने का समय नहीं प्राप्त कर पायेगा। इसलिए चिंता में चिंतन करने का दायित्व साहित्यकार के खाते में चला गया। जिस प्रकार साल भर में छः ऋतुए होतीहैं। इन छ ऋतुओं के अनुरूप प्रकृति का मिजाज बदलता है उसी तरह साहित्यकार नामक जीव का मिजाज भी इसी प्रकृति के अनुरूप बदलने लगा। इसी प्रकृति के अनुरूप साहित्यकार ने भी कभी कभी आपदा लाने की चेष्ठा की इसे प्राकृतिक आपदा की भांति साहित्यिक आपदा का नाम दिया गया। कई साहित्यकारों ने समय,समाज,अनुभव के अनुरूप अपने वास्तविक रंग को बदलने की कोशिश की, कुछ इस कोशिश में डार्विन के प्राकृतिक चयन के सिद्धांत को हू ब हू लागू किया और दौड़ में सबसे आगे चयनित रूप से खडे मिले, ऐसे साहित्यकार छपासरोगी साहित्यकारों की तुलना में अपने कुछ साहित्यिक अंगो का विकास इस तरह किया कि लेमार्क ने उपयोगिता और अनुपयोगिता का सिद्धांत उनके साहित्यिक जीवन को चरितार्थ कर दिया।
इस तरह के साहित्यिक रंग बदलने वाले साहित्यकार साहित्य की विरादरी के झंडावरदार बन बैठे या यह कहा जाए कि झंडावरदार होने का भ्रम पाल लिया। इस भ्रम ने इनकी उम्र के अनुरूप इन्हें हमेंशा रंगीन बनाए रखा, इनका स्थानीयता से ताल्लुकात उतना ही था जितना कि मंच में स्थित कुर्सी और माइक के सामने वाले विघ्नसंतोषी वक्ता का होता है। इस तरह के विशेष प्रजाति के साहित्यकार साहित्य कर्म में कम निपुण और राज कर्म में पूर्णतः निपुण हो गए और क्यों न हों आखिरकार इन्हें अपनी झंडावरदारी को बरकरार रखना था। इनकी आत्मस्लाघा इतनी ज्यादा रही कि अपने साहित्य कर्म की प्रशंसा अपने हम उम्र प्रशंसकों से ही लिखवाई जाती रही समय समय पर पत्र पत्रिकाओं में भेजा जाता रहा और इंतजार किया जाता रहा कि कब वह अंक नजरों के सामने हो और आत्मसुख प्राप्त किया जा सके। यह तो स्वाभाविक है कि जब साहित्यकर्म की प्रशंसा ही लिखी जाएगी तो दबाव वश कोई प्रशंसक ऐसे साहित्यकारों के विरोध में लिख कर बैठे बिठाए बैर क्यों भंजाएगा। ऐसी स्थिति में यह देखा गया कि अगर कोई स्थानीय संपादक ने उस प्रशंसा को अपनी पत्रिका का हिस्सा बना लिया, राष्ट्रीय सुख के पहले ही खतरे की घंटी छाप कर बजा दिया तब तो स्थानीय स्तर पर ऐसे साहित्यकारों को ही फुस्स बोलना पड़ गया। तब तो ऐसे साहित्यकार तिलमिला जाते हैं क्योंकि ऐटम बंब की प्राकृतिक आपदा फैलाने वाले वे आपदा लाने से पहले ही फुस्सी बंब की तरह लोकल में कैसे आगए। यह तो उनका राष्ट्रीय अपमान है। इस राष्ट्रीय अपमान का बदला राष्ट्रीय पत्रिका के प्रकाशन के पश्चात ही लिया जाता है।
ऐसे साहित्यकार सामान्यतः मुखौटों के सौखीन होते है, क्योंकि बिना मुखौटों के कही वास्तविक रंग अगर दिख गया तो साहित्यिक विरादरी में बिन बात के ही थू थू हो जाएगी, कभी गुस्से का मुखौटा, कभी निवेदन का मुखौटा, कभी वैर का मुखौटा, कभी मौन का मुखौटा, कभी व्यंग्य का मुखौटा इस श्रेणी के मुखौटे के रूप में उपयोग लाए जाते हैं। इन मुखौटो के मोह में ना जाने कितने नवोदित चमचे फंसते चले जाते हैं। इन साहित्यकारों की अपनी जमात होती है, ये संस्कारी ऐयाश होते है, ऐयाशी भी संस्कार देखकर करने में ये माहिर होते हैं, इनके मुँह में राम बगल में छुरी होती है, ये अपने ऊपर अनुसंधान तक करवाने के लिए लालायित होते हैं, जिसे पेड अनुसंधान भी कहा जा सकता है। ऐसे साहित्यकारों को नेपथ्य में दम घुटता है, इनको चांदनी रात की दूध सी नहाई रोशन बहुत प्रिय होती है, वैसे ऐसे साहित्यकार साहित्यिक चाणक्य की प्रतिध्वनि होते है, ये साहित्यकार कोपलों का स्वागत तो करते हैं परन्तु इन कोपलों को सहलाते सहलाते इनकी नीयत इनको ही धोखा देने लगती है। ऐसे साहित्यकारों को गुरुडम से विशेष लगाव होता है। ऐसे साहित्यकार अपने आचरण छूने वालों में स्नेह लट्ठ बरसाते हैं, चरण छूने वालों को स्नेह बरसाते हैं, हमारा देश का साहित्य का औसतन आधा हिस्सा इन्ही साहित्यकारों की सेवा की वजह से फल फूल रहा है। ऐसे साहित्यकारों की गुरुआई जहां देखो वहीं शुरू हो जाती है। ये साहित्यकार गजब का बोलने में तो माहिर होते हैं किंतु अजब का लिखते हैं।इन साहित्यकारों में प्रशंसा की डाइबिटीज, छपास रोग का ब्लड प्रेसर, कार्यक्रमों के मुख्य अतिथि का कैंसर, और सम्मान का एड्स जैसी लंबी बीमारी होती हैं। उम्र के साथ ये बीमारी इन साहित्यकारों के रंग और मिजाज को झेलाऊ बनाने का काम करती हैं। इस झेलाऊ मिजाज के चलते ये अकेलेपन के शिकार हो जाते हैं, यह शिकारी इन्हें साहित्यिक दीवालिया बना देता है, ये नया लिखने की बजाय पुराने लिखे, छपे, पर ही मंत्रमुग्ध होते रहते हैं, यह मंत्र मुग्धता इनकी साहित्यिक पागलपंथी की पक्की सुबूत हो जाती है। अंततः समय के न्यायालय में इनका मूल्यांकन शून्य हो जाता है, क्योंकि इनके अंदर साहित्यिक आत्मचिंता की काई जमा हो चुकी होती है इसकी वजह से मनो वैज्ञानिक और समाजिक रूप से साहित्य के दोषी करार होकर इन्हें रंग बदलते समय के अनुरूप धूल की परतें चढवा कर चुनवा दिया जाता है। ऐसे धूल की परतो के बीच चुने गिरिगिटिया साहित्यकारों को मेरी आने वाले पुस्तें बारंबार प्रणाम करेंगी।
(यह किसी साहित्यकार के व्यक्तिगत साहित्यिक जीवन का मूल्यांकन नहीं हैं।)
अनिल अयान