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Monday, 19 November 2018

बहुत जल्दी चल दिये सुकुमार बाल और नवगीतों के सम्राट

बहुत जल्दी चल दिये सुकुमार बाल और नवगीतों के सम्राट
ॠषि सुतीष्ण की धरती में वैसे तो मवाली से ले कर बवाली तक पैदा हुए। अमीर से गरीब तक ने पैदा होकर इस धरती का मान बढ़ाया है। पर इतने सालों के इतिहास में इस धरती ने यदि कुछ खास किस्म का इंशान पैदा किया है तो वो है डा हरीश निगम, हम सबके लिए यह अनजाना नाम हो सकता है। किंतु साहित्य जगत में अपनी अमिट छाप छॊड़ने वाले हरीश निगम नाम के व्यक्ति का व्यक्तित्व अव्यक्त सा रहा । सतना के लोगों ने मात्र उन्हें स्वशासी महाविद्यालय के प्राध्यापक के रूप में जाना, समाज शास्त्र के नाम पर उनके वख्तव्य दैनिक समाचार पत्र में छपे भी और पढ़े भी गए। वो सामाजिक मुद्दे चाहे दहेज हो, बलात्कार हो, समाजिक और आर्थिक विस्थापन हो, समाज और राजनीति हो, या फिर समाज और अर्थ व्यवस्था हो। वो हर फन मौला इंशान थे। सन दो हजार तीन में जब मै कालेज की पढ़ाई में गया तो शांत चित, सालीन, और स्कूटी से जीवन भर कालेज जाने वाले डा हरीश निगम सर ना नुकुर, विवादों से दूर, गोपनीय विभाग की वो बंद बिल्डिंग में ड्यूटी करते हुए मिले। शायद ही कोई विद्यार्थी उनकी वजह से परेशान हुआ हो। बाद में पता चला कि ये वही हरीश निगम हैं जो लगातार अखबारों में नवगीत के कालम लिखते हैं। ये वही हरीश निगम हैं जिनके बाल गीत बाल पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए।
जी हां मै उसी हरीश निगम की बात कर रहा हूँ जिसे शायद देश का कोई अखबार नहीं होगा जिसने ना प्रकाशित किया हो। पुरानी पत्र पत्रिकाओं में कादंबनी से  लेकर नवनीत, वीणा से लेकर इंद्र प्रस्थ भारती ने बाल रचनाओं के लिए डा हरीश निगम को साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान दिया।उनकी कहानियों पर टेलीफिल्मों का निर्माण हुआ और राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद द्वारा प्रकाशित पाठ्यपुस्तकों में भी उनकी रचनाएँ शामिल की गई हैं। बाल भारती, चंपक, पराग, नंदन, बालहंस, लोटपोट, सुमन सौरभ, धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, कादंबिनी, रविवार, आजकल, नवनीत, नया ज्ञानोदय, मधुमती, सरिता, मुक्ता, मनोरमा, मेरी सहेली, गृहशोभा, आउटलुक, सीनियर इंडिया, आज, अमर उजाला, संडेमेल, स्वतंत्र भारत, लोकमत, ट्रिब्यून, नई दुनिया, नवभारत, दैनिक जागरण, शिखर वार्ता जैसी पत्रिकाओं व पत्रों में उनकी कहानियाँ, नवगीत, गजलें, कविताएँ, बालगीत, बालकथाएँ आदि प्रकाशित हैं। देश के किसी भी विचार धारा के अखबार रहे हों उन्हें बाल साहित्यकार के रूप में जाना समझा पढ़ा और गुना भी, देश में सतना की धरती ही नहीं बल्कि विंध्य में एक मात्र बालसाहित्यकार पैदा हुआ और वो था डा हरीश निगम। बच्चों के बचपन की धुन को वो बडप्पन के साथ सुने भी गुने और शब्दों के माध्यम से बुने भी। उन्होने समय की धरातल में बचपन की बानगी को बालगीतों और बाल कविताओं में पिरोया। उनकी बाल गीत और बाल कविताए फिलहाल चार राज्यों के प्राथमिक पाठ्यक्रम में शामिल किए गये।सुंदर-सुंदर सरस बिंबमयी शब्दावली पाठक को बरबस ही अपनी ओर आकृष्ट कर लेती है।उनका एक कहानी-संग्रह 'हरापन नहीं लौटेगा' भी प्रकाशित है। एक बालगीत-संग्रह 'टिंकू बंदर' तथा एक बालकथा 'मिक्कू जी की लंबी दुम' प्रकाशित हैं। इनके अतिरिक्त अनेक सहयोगी संकलनों यथा– नवगीत अर्धशती, यात्रा में साथ-साथ, गीत और गीत, बीसवीं शताब्दी, गज़लपुर, चुने हुए बालगीत में उनके नवगीत एवं उनकी गजलें और बाल कविताएँ संग्रहीत हैं। एक बानगी- भइया बस्ते जी/
थोड़ा अपना वजन घटाओ/भइया बस्ते जी/हम बच्चों का साथ निभाओ/भइया बस्ते जी।/गुब्बारे से फूल रहे तुम/भरी हाथी से,/कुछ ही दिन में नहीं लगोगे/मेरे साथी से।/फिर क्यों ऐसा रोग लगाओ/भइया बस्ते जी।/कमर हमारी टूट रही है/कांधे दुखते हैं,/तुमको लेकर चलते हैं कम/ज्यादा रूकते हैं।/कुछ तो हम पर दया दिखाओ/भइया बस्ते जी।
उनकी यह बस उपलब्धि नहीं थी गीतों को श्रंगार की मार्मिक धरती से पुरुस्थापित करने और नवगीतों में विंधय का नाम अखिल भारतीय स्तर पर लेजाने का काम अनूप अशेष के बाद हरीश निगम का ही था। अखबारों में नवगीत को रचनाओं के रूप में प्रकाशित करने के लिए नितांत आवश्यकता को भी उन्होने समझा और माना। नवगीतों में उन्होने जगबीती को उकेर दिया। मर्म को टटोलने वाले ये गीत गीतों के अगर बीस नहीं थे तो उसके उन्नीस भी नहीं थे। गीतों में गाँव से लेकर जिंदगी , समाज से लेकर गाँव तक की बात की। फसलों से लेकर त्योहारों तक की बाद अपने ही अंदाज से हरीश निगम ने किया। 'होंठ नीले धूप में' एवं 'अक्षर भर छाँव' उनके प्रसिद्ध नवगीत संग्रह हैं। उनके नवगीतों में कोमलकांत पदावली का प्रयोग हुआ है, इसीलिए उन्हें सुकुमार नवगीतों का सम्राट कहा जाता है। एक नवगीत की बानगी देखिए- सुख अंजुरि-भर/दुख नदी-भर/जी रहे/दिन-रात सीकर!/ढही भीती/उड़ी छानी/मेह सूखे/आँख पानी/फड़फड़ाते /मोर-तीतर!/हैं हवा के होंठ दरक/फटे रिश्ते/गाँव-घर के/एक मरुथल/उगा भीतर!/आक हो-/आए करौंदे/आस के/टूटे घरौंदे/घेरकर/बैठे शनीचर!
वादों और विचारधाराओं से परहेज करने वाले हरीश निगम सतना की साहित्यिक पोंगापंथी से दूर होकर वीरानी में लेखन करते रहे। कई पाठकों को उनका घर द्वार तक नहीं पता था। माँ शारदा की धरती में आशीष लेकर वो चाहते तो विज्ञान का शिक्षण भी कर सकते थे किंतु समाजशासत्र को चुनकर उन्होने समाज की परिपाटी में नवाचार करने की ठानी। कवि मन ने उन्हें कलम उठाकर चलने के लिए मजबूर कर दिया। आज पूरा देश हरीश निगम के जाने को साहित्य में नवगीत और बाल साहित्य का कभी ना खत्म होने वाला रिक्त स्थान बना रहा है। विंध्य क्षेत्र भी इस साहित्य युग के पुरोधा को याद करके गमगीन होता। कई अखबारों के नवगीत के कालम भी रिक्त हो जाएगें। हाँ यह तय है कि उनकी जगह कोई और प्रकाशित होगा किंतु हर रचनाकार का स्वर्ण युग होता है। हरीश निगम अपने शिखर में पहुँच कर संध्या होने से पहले ही भौतिक रूप से अस्त हो गए। उनकी रचनाएँ अब उनकी याद के रूप में हम सबकी सहोदर होगीं वो कभी अस्त नहीं होगीं। वो इस सहोदर को याद करवाती रहेगीं।।मुझे कालेज से साहित्य के इस क्षेत्र में पहुँचाने का श्रेय डा हरीश निगम और डा लाल मणि तिवारी ही थे। उन्होने ही तत्कालिक पाठक मंच संयोजक संतोष खरे का पता और गोष्ठियों की जानकारी दी। हमारी शब्द शिल्पी को एक अभिभावक के रूप में उन्होने स्नेह दिया। कल का शनीचर उनको लील गया अपने काल के गर्भ में। साहित्य की इस आकस्मिक घटना के बाद बस इतना ही कहना शेष है कि बहुत जल्दी चल दिये आप, सुकुमार बाल और नवगीतों के सम्राट "हरीश सर"।

अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७

दौड़ा-दौड़ा, भागा-भागा सा बेचारा जीवन


दौड़ा-दौड़ा, भागा-भागा सा बेचारा जीवन

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर विशेष

अजीब से दास्तां हो गई है हमारे जीवन की, हम सुबह उठकर दौड़ने भागने लगते हैं, और रात तक दौड़ते भागते रहते हैं। कभी कभी तो हम इतने तनाव में होते हैं कि नींद में भी दौड़ना भागना शुरू कर देते हैं। आखिरकार हमारी यह दौड़ भाग हमें किस ओर लिए जा रही है। हम मन ही मन अपने मन की नहीं सुनना चाह रहे हैं। हम दिमाग के ताने बाने के संकेतों को नज़रंदाज करने में लगे हुए हैं। हम जब कभी हाथ पैर से दौड़ा भागी नहीं करते तो हम दिमाग और दिल से मैराथन शुरूकर देते हैं। हमारा दिमाग बिस्तर में लेटे हुए, कुर्सी में बैठे हुए भारत ही क्या विश्व भर में कुछ ही छणों में विचरण कर आता है। हमारा दिल और उसकी धड़कने टेली पैथी के जरिए कितने संमंदर पार बैठे अपने दोस्तों के गप्प करके आ जाती हैं। हम कितने व्यस्त हो गए हैं। अब हम काम धंधे को छोड़कर तकनीकि की गिरफ्त में आ गए हैं। अगर हमें कोई रोगकारक जीव संक्रामित कर दे तो हम डाक्टर के पास जाकर गोली दवाई खाकर अपना उपचार कर लेते हैं। किंतु जब टेक्नलाजी और उसकी ट्रैफिकिंग की वजह से तनाव और मानसिक असंतुलन के ग्रास में समाते हैं तो हमारा कोई खेवन हार नहीं होता। हम मनो वैज्ञानिक रूप से टूट से जातेहैं और अपनी इस टूटन का गुस्सा अपने कार्य क्षेत्र में या फिर अपने परिवार में पत्नी, बच्चे, माता पिता अन्य सदस्यों पर उतारते हैं। हम कभी तनाव, कभी क्लेश, कभी बैर, कभी मानसिक रूप से कमजोरी के कई लक्षण दिखा ही देते हैं। मानसिक रूप से टूटने वाले हर एक व्यक्ति अपने आप को रोगी नहीं स्वीकार करते बल्कि वो इसे अपने व्यवहार में बदलाव मानते हैं और स्वस्थ भी महसूस करते हैं। वो इसे समाज में हो रहे बदलाव का हिस्सा मानते हैं। यदि हम इस तरह के मानवीय व्यवहार के परिवर्तन को वैश्विक स्तर पर देखें तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि भारतीय समाज का हर नागरिक किसी ना किसी मानसिक रोग से ग्रसित है। मै कोई डाक्टर नहीं किंतु अपने आसपास के लोगों के व्यवहारों के अध्ध्यन से पता लगता है कि हमारे आसपास, हर क्षेत्र में मनोरोगी मौ जूद हैं।
मनोवैज्ञानिक और मानसिक स्वास्थ की चिंता 19वीं शताब्दी के मध्य में, विलियम स्वीटजर प्रथम व्यक्ति थे जिनको होने लगी थी। जिन्होंने "मानसिक स्वास्थ्य" को पहली बार स्पष्ट रूप से परिभाषित किया, जिसे सकारात्मक मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के कार्यों के समकालीन दृष्टिकोण के अग्रदूत के रूप में देखा जा सकता है। उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य को एक कला के रूप में परिभाषित किया है जिसका कार्य है ऐसी घटनाओं और प्रभावों के खिलाफ मस्तिष्क को संरक्षित करना जो इसकी ऊर्जा, गुणवत्ता या विकास को बाधित या नष्ट कर सकते हैं। "मानसिक स्वास्थ्य" के क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण शख्सियत थी डोरोथिया डिक्स एक स्कूल शिक्षिका, जिन्होंने अपने पूरे जीवन उन लोगों की सहायता के लिए प्रचार किया जो मानसिक बीमारी से पीड़ित थे और उन दु:खद परिस्थितियों को सामने रखा जिसमे इन लोगों को रखा जाता था। 20 वीं सदी की शुरुआत में, क्लिफर्ड बीयर्स ने राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य समिति की स्थापना की और संयुक्त राज्य में प्रथम आउट पेशेंट मानसिक स्वास्थ्य क्लिनिक खोला. मानसिक स्वास्थ्य को कई रूप में देखा जा सकता है जहां एक व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य के कई विभिन्न संभावित मूल्य हो सकते हैं। मानसिक स्वस्थ को आम तौर पर एक सकारात्मक गुण के रूप में देखा जाता है, इस रूप में कि एक व्यक्ति मानसिक स्वास्थ्य के उच्चतम स्तर तक पहुंच सकता है, भले ही उनमे किसी भी निदान योग्य मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति नहीं है। मानसिक स्वास्थ्य के एक समग्र मॉडल में आमतौर पर ऐसी अवधारणाएं शामिल होती हैं जो मानवविज्ञान, शैक्षिक, मानसिक, धार्मिक और सामाजिक दृष्टिकोण पर आधारित होती है, साथ ही साथ इसमें व्यक्तित्व, सामाजिक नैदानिक, स्वास्थ्य और विकासात्मक मनोविज्ञान का सैद्धांतिक दृष्टिकोण शामिल होता है। कई मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर इस बात को समझने लगे हैं, या समझ चुके हैं कि धार्मिक विविधता और आध्यात्मिकता में योग्यता का क्या महत्व है।
मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों के बारे में जागरूकता बढ़ाने और मानसिक स्वास्थ्य के सहयोगात्मक प्रयासों को संगठित करने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 10 अक्टूबर को मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है। विश्व मानसिक स्वास्थ्य संघ ने विश्व के लोगों के मानसिक स्वास्थ्य देखभाल को यथार्थवादी बनाने के लिए वर्ष 1992 में विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस की स्थापना की थी। विश्व में चार व्यक्तियों में से एक व्यक्ति जीवन के किसी मोड़ पर मानसिक विकार या तंत्रिका संबंधी विकारों से प्रभावित है। मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित दस से उन्नीस वर्ष की उम्र के व्यक्तियों की वैश्विक रोग भार में पच्चीस प्रतिशत हिस्सेदारी है। विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस वर्ष 2018 "विश्व के बदलते परिदृश में वयस्क और मानसिक स्वास्थ्य" पर केंद्रित है। किशोरावस्था और वयस्कता के शुरुआती वर्ष जीवन का वह समय होता है, जब कई बदलाव होते हैं, उदाहरण के लिए स्कूल बदलना, घर छोड़ना तथा कॉलेज, विश्वविद्यालय या नई नौकरी शुरू करना। कई लोगों के लिए ये रोमांचक समय होता हैं तथा कुछ मामलों में यह तनाव और शंका का समय हो सकता है। कई लाभों के साथ ऑनलाइन प्रौद्योगिकियों का बढ़ता उपयोग इस आयु वर्ग के लोगों के लिए अतिरिक्त दबाव भी लाया है,  
कई युवा तो आज के समय के एक दो दिन वाले प्यार के चक्कर मे खुद को फांस कर मानसिक अकेलेपन, अवसाद,निराशा की अनुभूति करतेहैं। युवाओं में किसी अनजान अपने का पास आना और फिर दिल तोड़कर फारिक हो जाने से भी टूटन की सथिति पैदा हो जाती है। यदि इसे पहचाना और प्रबंधित नहीं किया जाता है, तो यह तनाव मानसिक रोग उत्पन्न कर सकता है। सभी मानसिक रोगों में से आधे चौदह वर्ष की उम्र तक शुरू होते है, लेकिन अधिकांश मामले रोग की जानकारी और उपचार के बिना रह जाते है। किशोरों में रोग के संदर्भ में अवसाद तीसरा प्रमुख कारण है। आत्महत्या पंद्रह से उनतीस वर्षीय लोगों के बीच मृत्यु का दूसरा प्रमुख कारण है। किशोरों में अल्कोहल और मादक पदार्थों का हानिकारक उपयोग कई देशों में एक प्रमुख समस्या है तथा यह असुरक्षित यौन संबंध या खतरनाक ड्राइविंग जैसा ज़ोखिमपूर्ण व्यवहार उत्पन्न करता है। आहार विकार भी चिंता का विषय हैं। यदि उपचार नहीं किया जाता है, तो ये स्थितियां बच्चों के विकास, शिक्षा प्राप्ति तथा उनकी जीवन अपेक्षाएँ पूरी करने और जीवन की क्षमता को प्रभावित करती हैं। इससे उनके कैरियर के प्रति दबाव बनताहै, माता पिता को उनकी वजह से हर जगह अपमान महसूस होता है। समाज रिश्तेदारी में उनके प्रति घृणा का भाव और हास्य का भाव पैदा होता है। कहीं न कहीं समाज में उनकी उपादेयता भी कम हो जाती है।
हमारे भारत देश में आज  लगभग 35 मिलियन लोग दस से चौबीस वर्ष की आयु के बीच हैं; भारत, लगभग तीस प्रतिशत युवा जनसंख्या के साथ युवाओं का देश है। किशोरों और वयस्कों के बीच मानसिक परेशानी की रोकथाम और प्रबंधन की शुरूआत जागरूकता बढ़ाकर और मानसिक रोग के प्रारंभिक चेतावनी संकेतों और लक्षणों को समझकर कम उम्र से की जानी चाहिए। माता-पिता और शिक्षक घर एवं स्कूल में रोजमर्रा की चुनौतियों का मुक़ाबला करने में सहयोग के लिए बच्चों और किशोरों के जीवन कौशल निर्माण करने में मदद कर सकते हैं जैसे कि सामाजिक कौशल, समस्या सुलझाने का कौशल और आत्मविश्वास बढ़ाना, प्रयास संसाधन और सेवाएं उत्पन्न और विकसित करने पर केंद्रित होना चाहिए, जो कि वयस्कों को सशक्त और जुड़ा महसूस होने में सहयोग करता हैं। मनोवैज्ञानिक सहयोग स्कूलों और अन्य सामुदायिक स्तरों पर प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों द्वारा प्रदान किया जा सकता है जो कि मानसिक स्वास्थ्य विकारों का पता लगा सकते हैं तथा उन्हें प्रबंधित कर सकते हैं। किशोरावस्था स्वास्थ्य को प्रोत्साहित और संरक्षित करने से न केवल किशोर स्वास्थ्य को, बल्कि समाज और देश को भी लाभ होता है। इसके अलावा, समाज की सोच को महती रूप से बदलने की आवश्यकताहै। किशोरों और युवाओं को सोशल मीडिया और इसकी व्यस्तताओं से जितना दूर रखेंगे मानसिक तनाव उतना ही ज्यादा कम होगा, हर उमर के साथी यदि मानसिक रूप से स्वस्थ, आत्मविश्वासी,और सजग होगें प्राकृतिक रूप तकनीकि रूप को अपने समय की आवश्यकतानुसार उपयोग करेंगें तो तन मन दोनों खुश होगा। दिनचर्या भी आसानी से चलेगी, हम अपनी जिंदगी में दौड़ेगे तो पर भाग भाग कर खुद को पस्त नहीं करेंगें। हमें यह मान लेना चाहिए कि मानसिक स्वस्थ युवा जनबल, परिवार और समुदाय तथा समाज में अधिक योगदान करने में सक्षम बनता हैं।
अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७


















अंधाधुध "भक्ति" का शक्ति प्रदर्शन

अंधाधुध "भक्ति" का शक्ति प्रदर्शन

हमारे नगर में फिर पधारा नवरात्रि का उत्सव नौ दिन और दशहरे की धमक से गूँजता दसवाँ दिन नगर को महानगर की संस्कृति और सभ्यता जोड़ ही देता है। अच्छा तो है कि इस मामले में हमारा नगर अछूत तो नहीं रहा, अब तो वर्ष दर वर्ष भक्ति भी आधुनिक होती जा रही है। आधुनिकता के अंधानुकरण ने भक्ति को अंधाधुंध रूप में प्रभावित भी किया और सच्ची भक्ति को शक्ति प्रदर्शन में प्रवाहित भी कर दिया। अब तो यह शक्ति प्रदर्शन आदिशक्ति साधना का आड़ंबर प्रतीत होता है। भक्ति में बालीवुड़ के गीतों को शामिल करने की वो होड़ है जो बेजोड़ भक्ति को टोड़कर घोर अपराध कर दिया है। समय, समाज, बाजार, और स्टेटस सिंबल ने भक्ति रस में भी सोमरस से लेकर कामुक ऋंगार रस तक को समावेश कर डाला। हमारी आस्था और विश्वास को बाजार में बेंच कर बाजारू रवैये के साथ यह उत्सव महोत्सव में तब्दील हो रहा है। सचाई तो यह है कि इन सबके बीच भी कहीं कहीं भूली बिसरी आध्यात्मिक आस्था की नैसर्गिक सुगंध नाक में आकर बसेरा डालती है तो लगता है कि हमारी नाक कहीं तो सुरक्षित है। वरना इन स्टेट्स सिंबल को माब लिंचिंग के जरिए आस्थाएँ भी मीटू कैंपेन में शामिल होने के लिए सोशल मीडिया में अपना एकाउंट बनाने के लिए जीरो फिगर मेंटेन किए हुए हैं।
पितृ पक्ष की शांति को बोझ मानते हुए गणेश उत्सव से छूटे पंडाल पर किसी का डेरा न हो, इसलिए पितृपक्ष को चुपचाप संसद में चलने वाले मौसमी सत्र में विपक्ष स्वरूप मानते हुए एड्वांस बुकिंग कर दी जाती है। बैठकी के पहले से ही चौराहों, सड़कों, और गलियों में नव दुर्गा समितियों के पंडालों का कद रावण के कद और उसके दंभ को और बढ़ा देता है। दुर्गा जी के विराजमान होते ही मोहल्ले के तथाकथित मजनूँ, टपोरी, और उचक्के किस्म के वो युवा जो फिलहाल पान की दुकान में सिगरेट के धुएं से छल्ले बनाने, बाइक की टू सीटर में चार लोगों का जुगाड़ बनाने वाले स्टंटबाज, और स्कूल से मेडिकल लीव लिए अतिसंस्कारित सपूत कपूत दिन रात चंदा एकट्ठा करने में एक कर देते हैं, इसके लिए मोहल्ले के नेता, पार्सद, मंत्री और स्वनाम धन्य लाल बत्ती वाले लक्ष्मी पुत्रों के नाड़े ढी़ले किए जाते हैं, पंड़ाल में वो लोग जरूर रात्रि जागरण करते हैं जिनकी रात्रि जागरण अन्य दिनों में चैटिंग और मोबाइल स्क्रीन में नीले चित्र देखने के आदी होते हैं। यहाँ से चोरी की विद्युत मंड़ल की बिजली लेकर उन्ही की छाती में मूंग दलते ये नव दुर्गा उत्सव समिति वालों का नौ दिन सारी अंगुलियाँ, उत्सव, भक्ति, ऐश्वर्य, वैभव, ऐश, और दिखावे से परिपूर्ण होती है, ये सभी हर शाम को मोहल्ले की स्त्रियों को भजन संध्या के लिए जरूर आमंत्रित करते हैं और इसी बहाने सेल्फी उत्सव और फेसबुक लाइव शो जारी रहता है, समय समय पर भक्ति संगीत के साथ साथ भक्ति नृत्य के नाम पर फैशन, मेकब, बाजार और स्टाइल को ओढ़ने वाले ये पल पूरी तरह से रहीशी का प्रदर्शन ही करते हैं। यहाँ वही लोग चुनरी ओढ़कर तथाकथित भक्ति का प्रदर्शन करते दिखते हैं जिनकी नज़रें सिर्फ चुनरी के पीछे कुछ झांकने में व्यस्त होती हैं, आदत से मजबूर जो गये हैं वो लोग।
इन्हीं नौ दिनों में कन्या भोज के नाम से मुहल्ले भर की बेटियों को बटोरने का उत्सव होता है। वो परिवार जिनके घरों में पढ़ने लिखने वाली नौनिहालों को साल भर रगड़ के काम कराया जाता है, कन्या भोज के दिन भी उनकी ड्यूटी सुबह से ही लग जाती है, क्योंकि वो कन्याएँ कन्या भोज की कन्याओं से अलग हैं अर्थात अछूत जो हैं, कन्याओं का परिवार की महिलाओं के द्वारा अपहरण करके जबजस्ती नौ कन्याओं की पूर्ति की जाती है, कुछ परिवार शारदेय नवरात्र में तो नौ से नौ सौ तक कन्याओं को भोजन करा कर खुद पीठ थपथपाते हैं किंतु चैत्र नवरात्र में वो ही सब कन्याओं को भोजन कराना तो दूर पूजा करना, उनको सम्मान देना भूल जातेहैं ना जाने कौन सा अजगर उन्हें सूँघ जाता है। कन्या भोज अब मात्र ट्रेंड बनकर रह गया है, जैसे एक भेंड दौड़ते हुए कुएँ में गिरती है तो पूरा का पूरा समूह देखा सीखी बंटाधार कर देता है।कन्याओं की अस्मिता पर नज़र रखने वाले वो सभी सफेदपोश इस अवसर में अपने दागों को छिपाने के लिए और दाग पर भक्ति का निरमा रगड़ने वाले यह पुण्य सरिता में अपना हाथ जरूर साफ करना चाहते हैं। लेकिन अफसोस इस अवसर पर भी इनकी लार टपकने और आंतरिक बारिश की पोल खोलने का मौका नहीं चूकती। महिलाओं से बेटियों तक इस समय सर्वपूज्य बनी होती हैं। कई लोग तो इस समय पर भी इन्हें हरामजादी,कुल्टा और कुलनाशिनी का सम्मान देकर विभूषित करने से बाज नहीं आ रहे हैं। ये सब मी टू कैंपेन से खार खाए और अपने नासूरों में खार लगाए बुद्धिजीवी लोग हैं। इनकी बुद्धिजीविता भी इस समय अपने सर्वश्रेष्ठ स्टेट्स सिंबल को बनाने में व्यस्त हैं। ये भूल गए हैं कि इनको पैदा करने वाली माँ, राखी बाँधने वाली बहन, इनके लिए अपना घर छोड़कर आने वाले पत्नी, और इनके घर को छोड़कर पराई होने वाली बेटी भी इसी श्रेणी में नहीं आती क्या?
महाराष्ट्र से चलने वाले गणपति उत्सव, गुजरात से चलने वाले गरबा रास और डाँडिया, बंगाल से चलने वाले नौ दुर्गा उत्सव चरण जब देश भर में फैल रहे हैं तो गरबा डांडिया उत्सव में भी पारंपरिक परिधान के साथ साथ वैभव पैर पसार रहा है, शादी के शुभ मुहुर्त के इंतजार में बैठे शादी के पैलेस, और शादीघर गणपति उत्सव से ही इनकी तैयारियों में व्यस्त भी हो जाते हैं और पस्त भी हो जाते हैं, नगर की खूबसूरती इन पंडालों में तो दिखती ही हैं बदसूरती भी मेकब के पीछे छिपी होती है, यह सूरती तन से लेकर मन तक फाउंडेशन, लिपिस्टिक, और फेश पैक के मुखौटे के पीछे नौ दिनों के लिए दुबक जाती है, भारी भरकम जाम के झाम को समेटे ये मनोरंजन के संसाधन अपने प्रसाधन तक का इंतजाम करने में असफल होते दिखते हैं, इस उत्सव में मेकब, ड्रेस, स्कूल, कालेज, हर समाज के युवा समिति के पदाधिकारीगण, और नेता नपाड़ी, फैक्ट्रियाँ तक इस महारास में अपनी अपनी आहुति देते नजर आती है, मीडिया पार्टनर के रूप में इस अवसर में अखबारो के डेहरी खनने पर आधुनिकता इन्हें विवश कर देती हैं। युवाओं से लेकर सुगर, बीपी, और जोड़ों के दर्द वाले बुजुर्ग भी अपने आप को जवान महसूस करने लगते हैं। यही जवानी की रवानी उनकी खुशियों का पुण्य स्थापित करती है।
दशहरा उत्सव में रावण वध और रामलीला तो रामलीला समाज की चिंता और शासन की चिंता के हवाले हो जाती है, रावण के कद को पुतले के कद के साथ बढ़ा दिया जाता है। इसको बढ़ाने में कारीगरों की पूरी फौज गड्डी गिनने में खुश होती है। राम हनुमान और लक्ष्मण का चरित्र रामलीला में मंचन करने वाले बेरोजगारी के चलते इस अवसर को हर वर्ष भोग कर आगे नौकरी की तलाश में बाहर निकल जाते हैं, पारंपरिक रूप से रावण मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों में बमों, और पटाखों के जरिए तेज आवाज के साथ उनका औपचारिक वध कर दिया जाता है। राम जानकी लक्ष्मण की विजय यात्रा निकाली जाती है। रावण मन ही मन अपने भाई और बेटों के साथ इस मानव प्रजाति को अनाब सनाब बोलता रह जाता है कि क्यों हर साल यह ढ़कोसला कर रहे हो नालायकों, तुम्हारी पीढियों में ही छुपे चरित्रहीन, मानव के रूप में राक्षस, मौजूद हैं, उन्हें तुम लोग पूज रहे हो और मेरे पुतले को जलाकर मेरी पांडित्य पूर्ण सलाह को पटाखों की प्रतिध्वनि में विलुप्त कर देते हो। अब तो ये मुखौटे निकाल लो सच्ची श्र्द्धा भक्ति से आस्था का निर्वहन करो, गुनहगारों को सजा दिलवाकर आज के रावण को मारो। स्टेटस सिंबल बनाने और इसे अपडेट करने से जिंदगी न चलेगी महामानवो के पीछे छिपे मुखौटाबाजों।
अनिल अयान,सतना  














स्वतंत्र पत्रकारिता, साहित्य-समाज का अजेय झंड़ावरदार गणेश शंकर विद्यार्थी

स्वतंत्र पत्रकारिता, साहित्य-समाज का अजेय झंड़ावरदार गणेश शंकर विद्यार्थी
जन्म दिन - २६ अक्तूबर १८९०

”जो कलम सरीखे टूट गये पर झुके नहीं, उनके आगे यह दुनिया शीश झुकाती है
जो कलम किसी कीमत पर बेची नहीं गई, वह तो मशाल की तरह उठाई जाती है”
उपर्युक्त पंक्तियां सुकवि रामकृष्ण श्रीवास्तव ने तब लिखी थी जब युवा ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष का शंखनाद कर रहे थे। वैचारिक प्रतिरोध समाजिक आवश्यकता बन चुका था, विरोधात्कम वैचारिक युद्ध पत्रकारिता के द्वारा चलाया जा रहा था, वैसे तो सतना के वरिष्ठ पत्रकार चिंतामणि मिश्र की पुस्तक पत्रकारिता की चुनौतियाँ पुस्तक का एक परोवाक अनुच्छेद में उद्धत है कि " हिंदी पत्रकारिता का जन्म ही राज सत्ता के संघर्ष के लिए और शासकों के शोषण को नंगा करने के लिए हुआ था किंतु अब पत्रकारिता खुद नंगी हो गई है, आज समाज के भीतर तक अकुलाहट, नालायकी और क्षुब्धता व्याप्त है। नाना प्रकार के राजनीतिक धार्मिक और आर्थिक पाखंड आम आदमी की छाती पर मार्चपास्ट कर रहे हैं और पत्रकारित धृष्टराष्ट्र की भूमिका निर्वहन कर रही है। जब जेब और पेट भरने के लिए फेके गए सत्ता के टुक्ड़ों को रेंग रेंग कर बटोरना ही लक्ष्य बना लिया गया हो तो गाड़ी बाड़ी और साड़ी सुलभ हो जाती है किंतु पेट और जेब तो रंडियों के दलाल भी भर लेते हैं टुच्चई करके पैसा बनाना है तो इस पेशे से आसान और भी धंधे हैं।"
पत्रकारिता का पोस्टमार्टम करता और कट कापी पेस्ट के इस युग में पत्रकारिता के नाम पर कागज की लिपाई पुताई करने वालों के लिए तात्कालिक गणेश शंकर विद्यार्थी को जानना समझना और जुझारूपन के साथ वैचारिक विवेचना करना आज की महती आवश्यकता है। यह सच है कि आजादी के पहले का समय और भारत की स्थिति और आज की स्थिति में भारत की परिस्थितियाँ पूरी तरह से अलग हो चुकी है। भारत की वो युवा शक्ति और युवा लेखनी की धार राजनीति की धार के सामने मंद हो चुकी है। आज के समय में कुछ समाचार पत्रों को छोड़ दें तो वो मॉब लिंचिंग की तरह भीड़ की उपज बन चुके हैं। कई अखबार तो समय की नजाकत से मुंह मोड़ते हुए खाना पूर्ति का काम करने में मगन हैं।
पहले पैरा में व्यक्त पंक्तियाँ स्वराज के लिए अपना तन, मन, धन और जीवन समर्पित कर देने वाले अमर शहीद और कलम के धनी जनयोध्दा गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे जुझारू व्यक्तित्व की शान में ही लिखी गई थी। विद्यार्थी जी ने पत्रकारिता के जरिये स्वराज को जनांदोलन बना डाला था, उस समय बंदूख और सत्याग्रह दोनों आमने सामने आ चुके थे, स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की भी दो जमात हो चुकी थी, गरम दल और नरम दल के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आंतरिक कलह के चलते किनारा पकड़ने लग गये थे। महावीर प्रसाद द्विवेदी की सरस्वती पत्र की संपादकीय टीम मे रहे गणेश शंकर विद्यार्थी में वो ललक जुनून और समय की गति को पहचानने की छमता थी कि उन्होने पत्रकारिता और कलम की सत्ता के चलते अंग्रेजी सत्ता और परतंत्रता के विरोध में कलम को हथियार बनाकर कूद गए, फिर तो एक समाचार को चलाकर उसे किसी और युवा को सौंप कर अन्य समाचार पत्र को सम्हालने का सिलसिला चल पड़ा. ‘हमारी आत्मोसर्गता’, भारत मित्र, बंगवासी, महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के पत्र ‘अभ्युदय’,‘प्रताप’,'प्रभा'  जैसे प्रमुख पत्रों को विद्यार्थी जी ने विद्यार्थी की तरह पाला पोसा उससे कुछ सीखा और फिर स्वतंत्रता के लिए  अपने विचारों के महाकुंभ को चेतना के स्वरों के साथ समर्पित कर दिया।‘झंडा ऊंचा रहे हमारा’ गीत जो श्याम लाल गुप्त पार्षद ने लिखा था. उसे भी 13 अप्रैल 1924 से जलियांवाला की बरसी पर विद्यार्थी ने गाया जाना शुरू करवाया था।
विद्यार्थी जी सिर्फ पत्रकार ही नहीं थे बल्कि एक अच्छे विचारक, चिंतक, साहित्य और समाज के सक्रिय और अजेय झंड़ावरदार भी थे, पठन पाठन के प्रति उनकी रुचि दिनों दिन बढ़ती गई। उन्होंने अपने समय के विख्यात विचारकों वाल्टेयर, थोरो, इमर्सन, जान स्टुअर्ट मिल, शेख सादी सहित अन्य रचनाकारों की कृतियों का अध्ययन किया। वे लोकमान्य तिलक के राष्ट्रीय दर्शन से बेहद प्रभावित थे।पंडित मदन मोहन मालवीय के विचारों से सहमत होकर वो अभ्युदय की संपादकीय टीम के हिस्सा बने। महात्मा गांधी ने उन दिनों अंग्रेजों के खिलाफ अहिंसात्मक आंदोलन की शुरूआत की थी जिससे विद्यार्थी जी सहमत नहीं थे, क्योंकि वे स्वभाव से उग्रवादी विचारों के थे उनका स्पष्ट मानना था कि उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि हम राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन, सामाजिक आर्थिक क्रांति, जातीय गौरव, साहित्यिक सांस्कृतिक विरासत के लिए, अपने हक अधिकार के लिए संघर्ष करेंगे।नानक सिंह की ‘सौदा ए वतन’ नामक कविता और काकोरी काण्ड के नायक रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा को उन्होंने ‘प्रताप’ की प्रेस से ही प्रकाशित किया था। इसके बाद से ही प्रताप और विद्यार्थी जी पराधीन भारत में बदनाम पत्रकार और पत्र के संपादक के रूप में सुप्रसिद्ध हो गए।
इतना ही नहीं जब उन्हें जेल की चार दीवारी में रहना पड़ा तो तब भी वो साहित्यिक माहौल में रहे उनका सानिध्य जेलयात्रा के दौरान माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, सहित अन्य साहित्यकारों से भी हुआ। उन्होने उस समय इन रचनाकारों की रचनाओं और उससे उपजते देश प्रेम तथा स्वतंत्रता संग्राम में इनकी रचनाओं से उत्पन्न चेतना का बारीकी से पारखी की तरह अध्ययन किया और जीवन के अंतिम दौर तक कौमी एकता के लिए संघर्ष करते रहे।हसरत मोहानी जिन्होंने गजल लिखी है, चुपके-चुपके रात-दिन आंसू बहाना याद .... गणेश शंकर विद्यार्थी और उन्नाव के हसरत मोहानी साहब बहुत अच्छे दोस्त थे. हरसत मोहानी की 1924 में जब जेल से वापसी हुई तो गणेश शंकर विद्यार्थी ने उनकी तारीफ में प्रतापमें एक लेख लिखा था. जिसमें उन्होंने लिखा था कि मौलाना को मजहब के नाम पर झगड़ने वालों को रोकना चाहिए. और मोहानी ही हैं जो गांधी जी के बाद लोगों को मजहब के नाम पर एक-दूसरे को मारने से बचा सकते हैं।
विद्यार्थी जी साम्प्रदायिक के घोर विरोधी थे और उन्होंने जीवनभर एकजुटता, कौमी एकता पर जोर दिया।  जिस कौमी एकता के लिए वो लड़ते रहे, जिस संप्रदायिता के लिए वो विरोध दर्ज करते रहे यह विधि का विधान ही था कि दंगों के चलते ही कलम का यह सिपाही मौन हो गया। एक लावारिश लाश की तरह इसकी विचारशीलता भी अपने तन को छोड़कर लोगों के मन में घर कर गई। सन अट्ठारह सौ नब्बे से सन उन्नीस सौ एकतिस तक उनका जीवन परतंत्र भारत में ही चलता रहा। उनकी कलम ने विरोध के स्वरों को हवा देने का काम किया। वो ऐसे पत्रकार थे जिन्होने स्वतंत्रता को पत्रकारिता से वृहद रूप से जोड़ने का काम किया। पत्रकारिता के जनक और पोषक के रूप में उनका काम हमेशा स्मरणीय रहेगा। आज पत्रकारिता का जो भी रूप हमारे सामने है वह कहीं ना कहीं आदि पत्रकार देवर्षि नारद, विद्यार्थे जी और माखनलाल चतुर्वेदी प्रभाश जोशी, जैसे कलमकारों से होता हुआ वर्तमान तक पहुँचा है, पत्रकारिता के नाम पर जितनी चकाचौंध आज  मौजूद है वह शायद उस समय नहीं थी जब गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे कलमकारों ने स्वातंत्रता संग्राम को फतेह करना ही पत्रकारिता का मिशन बनाया था, जिसमें विचार, दृष्टि और निर्णय शामिल था। आने वाली पत्रकारों की पीढी इन पूर्वजों के विचारों को पहचान पाएँ यह इस समय में सबसे बड़ी पत्रकारिता की चुनौती है।
अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७   

खुदे शहरों में "खुदा" को याद करें

खुदे शहरों में "खुदा" को याद करें

ये खुदे - खुदे से शहर,अब ऐतबार बिल्कुल भी नहीं।
खुदा को याद करना है अब इंतजार बिल्कुल भी नहीं।

खुदाई से ही नई सभ्यताओं की खोज हुई हैं पुरातत्व विभाग इसी को मूल मंत्र मान कर अपने कर्तव्य निष्ठ होने की पुष्टि करता है। खुदाई की इसी परंपरा का निर्वहन पुरातन काल असे आज तक हमारे मुंसिबदार भी कर रहे हैं। इस समय जब सुबह सुबह निकलो तो ऐसा लगता है कि हम हड़्प्पा और मोहनजोदड़ों के पुरातन नगर में पहुंच गए हैं। जहाँ पर फिर कोई नई खुदाई नई सभ्यता को जन्म देने वाली है। यह जन्मोत्सव का बरहौं कब होगा यह अज्ञात है। किंतु एक बात तो तय है कि इस खुदाई की परंपरा का असर सरकार के स्वास्थ्य में जरूर पड़ा है। यही वजह रही है कि इस तरह की खुदाई करके सृजन करने का काम उन्हीं को दिया जाता है जो इस मामले में प्रायोगिक रूप से नौसिखिये हैं और कागजाती मामले में निपुण हैं। इससे सरकारी कार्य की गुणवत्ता का स्तर भी स्तरीय हो जाता है। खुदाई के इस धूल धक्कड़ी सम्राज्य में हर रहवासी अपने जानमाल और स्वास्थ्य के लिए खुदा को जरूर याद करता है। अगर राजा का स्वास्थ्य सुधरा हुआ है तो कुछ प्रजा को भी खुदा की नेमत मिलनी ही चाहिए।
खुदाई के चलते इस समय प्रशासन बहुत ज्यादा सकते में है क्योंकि वो जानता है कि यह माहौल आने वाले चुनाव के लिए संक्रामक है। इस संक्रमण के चलते कहीं वोटों को धूल वाली सर्दी खांसी बुखार हो गया तो वोटिंग के दिन वो बीमार होकर खटिया ही टोड़ेगा और इसका परिणाम यह होगा कि मतगणना के दिन पार्टियों का हाल बेहाल हो जाएगा क्योंकि खस्ताहाल शहर की खुदाई करने और नई वोटतंत्र की सभ्यता की खोज करने की कोशिश बेमानी ही होती है। इस बेमानी वाले धतकरम में मरन हम सबकी तो होती है किंतु सरकारों प्रशासनों और जिलाधीशों की ज्यादा मरन होती है क्योंकि समय समय पर चुनावी दौरे होते हैं, पुलिस से लेकर आलाकमान अफसर तक राष्ट्रीय नेताओं की अगवानी करने के सिर दर्द को झेलने के लिए मनोवैज्ञानिक रूप से खुद को तैयार करते हैं। उस समय इन खुदे शहरों की तथाकथित अच्छे दिन वाली एक्स्प्रेसवे सड़कों को थोड़ा बहुत सड़क के रूप में परिभाषित करने के लिए नगर निगम और नगर पालिका के कर्मचारी युद्धस्तर की तैयारी करते हैं सोचते हैं कि राजाधिराज को कोई खबर नहीं है किंतु वो ये नहीं जानते कि जब राजाधिराज खबरों के बिस्तर में ही चैन की नींद लेते हैं तो ये खुदाई वाली खबरें उनसे बेचारी कैसे छिपी होंगी।
ऐसा नहीं है कि सिर्फ जमीनी खुदाई की जा रही है। सोशल मीडिया में तो वैचारिक खुदाई करने का भी ठेका ठेकेदारों को उसी तरह दिया गया है जैसे शराब के ठेकेदारों को रेवड़ी बांटी जाती है। इस समय सोशल मीडिया में सिर्फ दो स्थान है। राष्ट्रभक्तिस्थान और देशद्रोहिस्थान इन स्थानों के वासी होने के लिए सिर्फ एक मापदंड़ का विधान है। अगर आपको सरकार की नीतियों को आँख मूँद कर
समर्थन करने का अंधभक्तित्व गुण प्राप्त हैं तो पहले स्थान के निवासी हैं अन्यथा विरोधियों के लिए सिर्फ दूसरा स्थान सुनिश्चित है। इन स्थानों में काम की बातें और मुद्दों को संदेहास्पद बनाया ही जाता है साथ ही साथ भ्रांतियों को फैलाने का पुण्य कार्य भी किया जाता है। कुल मिलाकर इस स्थान पर चौर्यकला से निपुण लोग भीड़ को नियंत्रित करने का कार्य करते हैं, अर्थात नागरिकों को सस्ते से सस्ते दर में इंटरनेट उपल्ब्ध करवाकर बेरोजगारी को कम करने का सीना पीटने वाली कंपनी की कृपा से उन बिंदुओं को पटल से गायब कर दिया जाता है, जिनके बारे में जनता को सोचना चाहिए, बल्कि उन मुद्दों को मॉब लिंचिंग के लिए परोस दिया जाता है जिनका देश के विकास और अर्थव्यवस्था से दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं है।
उपर्युक्त पैरा का एक छोटा सा उदाहरण मी टू और सेम टू यू वाला लिया जा सकता है खाई अघाई किस्म के फुरसतिए सेलेब्रिटीज ने मीटू हैश टैग से विद्रोह की आँधी ला दीं। जब तक शोषण से अवशोषित होकर नाम दाम मिलता रहा तब तक सब जायज रहा अब उसी दबे अत्याचार की दुहाई देकर विद्रोह की ज्वलंत आग लगाने का यह कैंपेन पूरे देश को उसकी मूलभूत चिंता से भटका दिया। देश को नौकरी, अर्थव्यव्स्था, बैंको का कर्ज, किसानों की मौतों, राज्यों की आपसी झड़प छिप गई। इन संबंधित महिलाओं को चाहिए था कि न्याय पालिका में पिटीशन दायर करके केश करती और कुसूरवार को सजा दिलवाती, या महिला आयोग के साथ मिलकर न्यायसंगत निर्णय के लिए पहल करतीं किंतु उन्हें तो कंट्रोवर्सी और लाइक कमेंट्स का ताजमहल खड़ा करना था, जिसमें वो केंद्र बिंदु में दिखाई दें। इसी का दूसरा उदाहरण पटाखों को फोड़ने में घंटे निर्धारित करने का विषय, दिल्ली वायु प्रदूषण से आत्म हत्याकरने के लिए दिन गिन रही है, और पटाखों के बदले ग्रीन दीवाली का प्रचार करने की बजाय इस पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है जबकि पटाखों का आयात और विक्रय पर सरकार और शासन का की नियंत्रण है। सरदार पटेल की मूर्ति बनवाने के लिए भी चीन का माल आयात करने पर खूब धमा चौकड़ी मचाई जा रही है, वहाँ पर स्वदेशी व्यव्स्था को घेरे में लिया जा रहा है।
राजनैतिक दल अपने कार्यकर्ताओं की वफादारी की भी खुदाई करने में व्यस्त हैं। चुनाव में सत्तारूढ़ होने का सपना लेकर पुराने से पुराने तथा उम्रदराज कार्यकर्ताओं की वफादारी का डीएनए टेस्ट करके उनकी आत्मा की खुदाई कर दी गई। परिवार वाद के नाम का बुल्डोजर चलने की वजह से उम्मीदवारों की उम्मीद पर पार्टियों ने ऐसे पानी फेरा कि विद्रोह का स्वर यहाँ भी फूट पड़ा वफादारों ने भी पार्टी को बता दिया कि पार्टी उन्हें मॉब लिंचिंग न करे, वो सोशल मीड़िया के अंध भक्त नहीं हैं जो अपनी राजनैतिक जीवनी को पार्टी के संस्मरण के लिए बलिदान कर दें, निर्दलीय लड़कर वोट को पतंग की तरह लूट लेने का गुण इन्हीं वफादार कार्यकर्ताओं से सीखा जा सकता है।यह विरोध उसी तरह है जैसे स्वतंत्रता समर मंगल पांडे ने किया था। लोकतंत्र के इस पर्व को महापर्व बनाने की मैराथन में जागरुकता कार्यक्रमों के चलते सिर्फ चुनाव आयोग की आचार संहिता से बच कर अपने स्वार्थ को सिद्ध करने का हुनर भी इस वैचारिक खुदाई में खुदा को याद करा ही देती है।
कुल मिलाकर खुदाई करना अब सर्वव्यापी कृत्य हो गया है। इससे कितना सृजन होगा यह कोई नहीं जानता। किंतु सुविधाभोगी समाज में असुविधा व्याप्त है। शहर से लेकर गाँव कस्बे और शहर से लेकर राजधानी और महानगर तक इस संवैधानिक और ऐतिहासिक सुविधा से त्रस्त हो चुकी है। सब अंतर्मन में राम राम जप रहे हैं, परंतु यह संदेह है कि राम राम का संबोधन कहीं हे राम में ना बदल जाए। क्योंकि दोनों संबोधन आज के समय में पार्टीगत हो गए हैं। अब देखना यह है कि इस संबोधन में कहीं सीता राम कहने वालों का समावेश हो गया तो जय श्री राम कहने वालों की परंपरा की निर्वाध गति में कितना वेग उत्पन्न होता है। क्योंकि खुदाई से गति अवरोधक तो खुद बखुद बन ही जाते हैं जिन्हें नैसर्गिक विडंबना के रूप में क्षमा नहीं किया जाएगा। अंततः इतनी खुदाई होने के बाद देश के लोकतंत्र में कितना गतिअवरोधक निर्मित होगा। इस यक्ष प्रश्न के उत्तर के लिए भविष्य के गर्भ में जाना शेष है।
अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७

तेरा "दीप" जले.. मेरा "दिल"

तेरा "दीप" जले.. मेरा "दिल"

बाजार में ज्योतिकलश छलक रहा, पूरा बाजार दीवाली की ज्योति और स्वर्ण हीरे जवाहरातों के आभूषणों से पटा पड़ा है, एक दुकानदार के पूरे परिवार वाले  भी अलग अलग दुकानों को लगाकर सड़क के अतिक्रमण में अपना हाथ बंटा रहे हैं। देश की आवो हवा को देखकर यही लग रहा है कि देश की गरीबी इस ज्योति कलश की चमक से खत्म हो चुकी है। मँहगाई लक्ष्मी के वाहन के गठजोड़ करके प्रसन्नचित्त जीवन व्यतीत करने लग गई है। इस समय चुनावों के मौसम में किसी की अमावस है और किसी की पुरमासी है। सब अपनी अपनी गणित में व्यस्त हैं। कोई रुपयों की गणित में व्यस्त है, कोई वोटों की गणित में व्यस्त है, कोई सीटों की गणित में व्यस्त है। कोई लक्ष्मी और गणेश की पूजा और उसके मुहुर्त में पंचक की गणित में व्यस्त है। कुल मिलाकर इस बार की दीवाली का जश्न खट्टा मीठा हो रहा है। इन सबके चलते सबसे ज्यादा मरन कर्तव्य निष्ठ और समय सापेक्ष विश्वासपात्र सरकारी कर्मचारियों की है, पुलिस वालों की ड्यूटी गली कूचें से लेकर किसी भी अधिकारी और आलाकमान अधिकारी, और मेलों बाजारों में लगा दी जाती है, शांति व्यवस्था को सुधारने का जिम्मा जैसे इसी पलटन के हाथों में सौंप दिया गया है। प्रशासन हर बात की जागरुकता चलाएगा किंतु कभी शांति सौहार्द की जागरुकता नहीं चलाता है, त्योहारों में कायदे से इसकी भी मुहिम गली चौराहों से हर जगह तक पहुंचना चाहिए। पर पुलिस वालों की दीवाली खराब करने का श्रेय दीवाली को जाता है, इस बार तो हद तब हो गई जब उन सरकारी बाबुओं की ड्यूटी चुनावी प्रोटोकाल में लग गई जिनको महीने का वेतन बनाना था, इस बार तो राजस्व विभाग ही बिना वेतन के दीवाली मनाने वाला है, कुल मिलाकर दिलजले प्रकार के ये कर्मचारी मरता क्या न करता वाली स्थिति में चुनावी बिगुल की तैयारी में चाक चौबंद व्यवस्थापक बने हुए हैं।
हमारे देश का यह सौभाग्य रहा है कि यहाँ पर अमीरी गरीबी की खाईं इतनी ज्यादा गहरी है कि जितना पाटो, उतना बढ़ती है, अमीरी को सरकारी आरक्षण प्राप्त है, और गरीबी को समान्य वर्ग का अनारक्षण खाए जा रहा है, देश ग्रीन पटाखों का घोष कर रहा है, पटाखे बनाने वाली कंपनियां इस चिंता में सूखी जा रही हैं कि कौन सा बारूद डाला जाए कि पटाखे ग्रीन हो जाए, प्रदूषण को उनकी भनक भी न पड़े, दिल्ली का प्रदूषण भी इन्हीं ग्रीन पटाखों की वजह से इंद्रप्रस्थ बन जाए तो कितना अच्छा हो, जिस प्रकार ईद मिलन, दशहरा मिलन, होली मिलन का क्रेज है उसी तरह दीपावली मिलन का समारोह क्यों नहीं गतिशील हो रहा यह सोचता हूँ, तब जाकर बड़ी मुश्किल से उत्तर मेरे कदमों में आकर नतमश्तक हो जाता है कि सभी समुदाय धनतेरस में हीरे जवाहरात खरीदने, पटाखे फोड़ने, गणेश जी की को याद करने के बहाने लक्ष्मी को बचाने और लक्ष्मी को तिजोड़ी में कैद करने में व्यस्त हैं, वो सोचते हैं, कि धन तेरस से छोटी दीवाली तक चलने वाले इस त्योहार में कही किसी दिन माता लक्ष्मी रिसा करके वापिस न चली जाए। यह हमारे देश का गौरव है कि जो गरीब मोमबत्ती, रुई की बातियाँ, फूलों की लडियाँ, और भी पूजा में आने वाली नैसर्गिक चीजें आमजन के लिए लेकर आता है उसका परिवार खुद सड़क में दुकानदार बना क्रय विक्रय की राजनीति में व्यस्त है। पटाखों, और बमों की अनुनाद से भरपूर इस समाजिक व्यवस्था में इनकी स्थिति कभी नहीं सुधरी, ना सुधरेगी, फुटपाथ में लगाने वाले ये मौसमी दुकानदार अपनी दीवाली तो अपना सामान बेंचकर तथा लाई रिवड़ी दाना के साथ मना लेते हैं, आम मंदिर मठों, और चौराहों में घरों से बेघर किए गए उन बुजुर्गों की दीवाली सिर्फ दिल जलाकर ही होती है, जिनके वारिश उनको लावारिश बनाकर वृद्धाश्रमों, अस्पतालों के दरवाजों,  कहीं नही तो मंदिरों और मठों के प्रांगणॊं में भक्त गणों के प्रसादों और उतरन, से जीवन यापन करने के लिए मजबूर बनाते हैं।
वर्तमान की दीवाली तो ई गिफ्ट्स, ई शॉपिंग और आन लाइन मार्केटिंग से लबालब सराबोर है, लिंक, और वन टाइम पासवर्ड के माध्यम से ये कंपनियों के नुमाइंदे दीपावली में बाजार तक ना सही आपके घर तक सीधे अच्छे दिन लाने के लिए तत्पर हैं. एक आफिस में कम्प्यूटर की कीबोर्ड में व्यस्त युवाओं की फौजी अंगुलियाँ देश की अधिकांशतः स्थानों को अपने उतसवी माहौल से प्रभावित करने के लिए लालायित हैं,उनके लिए दीवाली उनका, प्रमोशन, इंसेंटिव, और उनका फारेनट्रिप है, उनके लिए गणेश लक्ष्मी की पूजा, और प्रसाद वितरण इतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि उनका दिया जाने वाला टारगेट।अधिक्तर मल्टीनेशनल कंपनी में बहुत से युवा तो सिर्फ अपनी जिंदगी को दीवाली होली के त्योहारों को टारगेट पूरा करने में खपा रहे हैं, अगर टारगेट न पूरा हो तो छुट्टीयाँ भी कैंसिल हो जाती है। अपने रिस्क में छुट्टियाँ नौकरियों से छुट्टियों की फुलझडियाँ जलाने के लिए काफी होती हैं, युवाओं की एक फौज तो राजनैतिक पार्टियों की आटी सेल में माब लिंचिंग और इल्यूजन को तमराज किलविस की तरह फैलाने वाले रस्सी बमों के साथ खुश हैं, थोड़ा बहुत मेहनत, हुनर को एक तेज रफ्तार देने वाला यह अवसरवादिता उनकी बेरोगारी के रोजगार का प्रसाद तो बन ही जाता है। यह प्रसाद निश्चित ही संतुष्टि की मिलावटी मिठास देने का कार्य जरूर करता है।
किसानों की दिया दिवारी तो फसलों में बालियाँ देखकर ही होती है, गाँव की माटी के सुगंधित दिए, फसल के दानों से तैयार की गई रंगोलियाँ, दीवाली के अवसर पर गाए जाने वाली लोक गीत की भीनी भीनी महक, लोकनृत्य की ढोलक और मंजीरे के साथ तेज रक्त से समान प्रवाहित करने वाली तीव्रता अब बंजर सूखी धरती के घावों और कर्ज के साथ आत्महत्या के लिए प्रेरित होती आत्माओं की त्रासद जिंदगी से विलुप्त सी हो गई है। गांवों की राजनीति चिंतजनक है, किसानी करने वाले धीरे धीरे मजदूरी,बंधुआगिरी, अन्य व्यवसाय के प्रति सरकारी आश्वासन,और दलालों की गिरफ्त में आकर दिया दिवारी सब पर भारी वाली कहावतों को चरितार्थ करते नजर आते हैं। यह है कि जय जवान जय किसान, कृषि प्रधान देश की परिकल्पना करने वाला भारत देश अब कलाम के इंडिया ट्वेंटी, ट्वेटी वाले उद्देश्यों को पूरा करने लायक नहीं बचा, अब दीवाली ही नहीं अन्य त्योहारों का चरित्र राष्ट्र चरित्र होने की बजाय धर्म उपदेशी चरित्र के रूप में उजागर होने लगा है। समाज की विशंगतियों ने धर्म पंथ और संप्रदाय गत विद्वेश पैदा कर दिया है। मीडिया में धर्म विध्वंशक हाइपोथेटिकल समाचारों के चलते तिथ त्योहारों को भी संदेहात्मक नजरिए से टीआरपी बढ़ाने वाले फैक्टर के रूप में बेंचा जा रहा है। समाज की वो सौहार्द वाली दीवाली दलगत हो गई है। दीवाली के जरिए अब ऐश्वर्य , वैभव, चातुर्यता, और संपन्नता को महिमामंडित किया जा रहा है, जैसे जैसे नैसर्गिकता खत्म हो गई वैसे वैसे प्रदूषण भी बढ़ गया, बनावटी धूल धक्कड़ वाले हवन में राख बनकर उडने वाली दुर्गंध में वो महक कहाँ जो औषधीय गुण से लिप्त होती थी और पूरे वातावरण को स्वस्थ बनाने का काम करती थी। बाजार में बैठा हर नागरिक तिथ त्योहारों में बाजार की गिरफ्त में आ चुका है। घरेलू सामग्रियों से परे वो सेंथेटिक समानों पर आधारित हो चुका है।
दीवाली की इन पंद्रह दिवसीय परंपरागत रीति रिवाजों की घर वापसी बहुत आवश्यक है, समय के साथ पाश्चात्य भाव से दीवाली की रासायनिक चमक प्राकृतिक जीवन शैली को बद रंग बनाने के लिए दोषी होती है। खान से लेकर पान तक मिलावटी सामग्रियों के रूप में विषैला हो चुका है,ग्रामीण तो बहुत ठीक स्थिति में है जो वो प्रकृति के कुछ तो नजदीक है, अट्टालिकाओं में दीवाली के बमों और पटाखों की धमक जीवन को बहरा बना रहा है, बीमारियों के दरवाजे में खड़ा कर दिया है। हम दिलों दिमाग को सही रखने की दवा लेते रह जातेहैं, किंतु जीवन भर जिंदादिल बनने से परहेज करते हैं। आंतरिक करुषता को दूर करके पारदर्शिता पूर्ण जीवन जीने की रीति का दीपक जलाने की आवश्यता है। संबंधों की बाती को ज्योतित कर प्रेम प्रवाहित करने की आवश्यकता है। हर इशान की महत्ता को समझकर अपने जीवन में उसके स्थान को बनाए रखने की आवश्यकता है।अपने आसपास भी अमीर गरीब की खाई को पाटने और सभी को अपने साथ लेकर त्योहार मनाने की आवश्यकता है। इसके लिए हमें किसी मुहुर्त की जरूरत नहीं बल्कि अपने अंतस के मुहुर्त को पहचानने की जरूरत है। किसी भी तरह सही कम से कम उनके घर भी दीपक जलाकर देखिए जिनके घर में उजियारा फैलने से इसलिए घबड़ाता है कि कहीं वो अछूत न घोषित हो जाए।
अनिल अयान

९४७९४११४०७

सत्ता स्वयंवर विवाह समारोह

सत्ता स्वयंवर विवाह समारोह
सत्ता फिर से दुल्हन बनने के लिए तैयार खड़ी है, चुनाव रूपी बारात की तिथि, चुनाव आयोग नामक पुरोहित ने विचार दिया। फिर से विधान सभा नामक ससुराल सजाई जा रही है। इस विवाह के स्वयंवर में सभी वर अपने अपने भाग्य को आजमाने के लिए मैदान में युद्ध स्तर की तैयारी कर चुके हैं। कई तो वर के रूप में सिद्ध होने के लिए वोटों की गणित के प्रमेय सिद्धि में देव और देवी द्वार माथा टेक रहे हैं कई सत्ता के पूर्व प्रेमी भी विरोध का बिगुल बजाकर हुंकार भर चुके हैं और ढंके की चोंट में कह रहे हैं, प्रेम सिद्ध ना हुआ तो स्वयंवर में सिद्धि तो प्राप्त हो ही सकती है। हाथ आजमाने में क्या जा रहा है। कुछ राशि ही तो जा ने वाली है। सबसे बड़ी बात यह है कि कई उम्मीदवार इस स्वयंवर में सम्मान निधि के नाम पर दान दक्षिणा में मिले हुए गरीबों के द्वारा चलने व ना चलने वाले सिक्के भी मटकों में भरकर ला रहे हैं। ताकि गड्डियों को इससे दूर रखा जाए। अन्य विवाह समारोह में वर पक्ष पार्टी अपनी आर्थिक सम्म्पन्नता का खूब बखान अतिशयोक्ति पूर्ण करते हैं। यहाँ तो उम्मीदवार इसमें में अन्योक्ति अलंकार का प्रयोग करते हुए बताते कुछ और हैं और होता कुछ और....। उन्हें इस बात की भरपूर डरावनी आशा होती है कि कहीं आयोग पुरोहित उनकी चल अचल संपत्ति को काला धन की श्रेणी में लाकर स्वयंवर से उनका पत्ता साफ न कर दे। सबसे बड़ी मजेदार बात यह है कि पुरोहित को जिस तरह के मंत्रों का उच्चारण करना होता है वो जानता है कि पूर्व प्रेमी उम्मीदवार के लिए कौन सा मंत्र बाँचना है और वधु प्राप्ति के लिए ताजे उम्मीदवार के लिए कौन सा मंत्र बाँचना है।
इस बार के विवाह समारोह में पुरोहित ने उम्मीदवारों की खर्च सीमा का आधार कार्ड़ और बैंक अकाउंट से सीधा संबंध स्थापित कर लिया है। सभी संवाददाताओं को सख्त आदेश है कि वो हर जगह के उस उम्र के सभी उम्मीदवारों को यह निमंत्रण पत्र भी हल्दी चावल लगाकर दिया जाए ताकि थोक का थोक स्वयंवर की परीक्षा आयोजित किया जा सके। पुरोह्ति को सत्ता सुख भोगने के लिए और संतानोत्पत्ति हेतु उचित वर खोजने में प्रायिकता का सिद्धांत भी सही सिद्ध हो सके। वर पक्ष के उम्मीदवारों की राजनैतिक परिवार भी इस स्वयंवर में ऐसे लिप्त हैं जैसे उम्मीदवार को नहीं बल्कि उनके परिवार के हर सदस्य को शहनशाह की पदवी मिलना तो तय ही है और हुकूमत करने का मौका रखा रखाया है। इस स्वयंवर का उत्सव इतना ज्यादा उत्साह जनक है कि पुरोहित और उसने शिष्य़ गण भी इस स्वयंवर विवाह को सम्मपन्न कराने के लिए सत्ता के मायके के घराती बने हुए हैं। इस अवसर पर गाहे बगाहे, निमंत्रण पत्र के साथ साथ, सोमरस, और सम्मोहित करने हेतु मुद्रा अंतरण तक चलाया जा रहा है। इस समारोह की खासियत यह भी है। उस उम्र के हर व्यक्ति को मजबूरी वस स्वयंवर में उम्मीदवार का समर्थन करने जाना ही है। इस यात्रा करने वाले व्यक्ति को हम मतदाता के नाम से जानते है। वैसे तो वो समर्थन करता है और उम्मीवार को स्वयंवर में सफलता की कामना अपनी मजबूरी और स्वार्थवश करता है। किंतु वो जानता है कि सत्ता सुख भोगने का वरदान मात्र पुरोहित ने वर और उसके राजनैतिक परिवार वाले भाई भतीजों के नाम ही किया है। समर्थकों को महज मुंगेरीलाल के हसीन सपने ही दिखाए जाते हैं ये वो समर्थक होते हैं जिनके जयकारे से स्वयंवर की परीक्षा में उम्मीदवार का हौसला अफजाई होता है। जितना तेजी से ये उम्मीवार की जय बोलते हैं पुरोहित के सामने उसकी उतनी ही इमेज बनती है। यह सच है कि ये सारे उम्मीदवार सिर्फ इमेज ही बनाने में लगे रहते हैं, मलाई तो कोई और खा जाता है।
इस समारोह का माहौल कुछ ऐसा होता है कि राजनैतिक खानदान भी इसकी रसमलाई को चख ही लेते हैं, वो उम्मीदवारी के लिए बोली लगवाते हैं, रायसुमारी करवाते हैं, यह देखा जाता है कि जातिगत, धर्मगत  कौन सा सदस्य खानदान की नाक कटाएगा नहीं, स्वयंवर में सत्ता के लिए वो अंतित दौर तक स्वयंवर से बाहर न होगा। कौन है जो साम दाम दंड भेद का प्रयोग करके सत्ता स्वयंवर में अपना परचम लहराएगा और खूँटा गाड़ेगा। कुल मिलाकर यह समझिये कि सिंहावलोकन करने के बाद ही स्वयंवर के लिए वर को सजाया जाता है। हालाँकि यह भी सच है कि सत्ता वो चंड़ी होती हैं जो अपने स्वयंवर में हासिल किए गए वर को आने वाले पाँच साल के जीवन में सिर्फ नचाती ही रहती है। नाच नाच कर वर स्वयंवर के इस सुख को भोगता रहता है। और पाँच साल के बाद सत्ता फिर तैयार खड़ी हो जाती है नई नवेली दुल्हन का मेकब करके  वर को भोगने हेतु। वर को यह महसूस होता है कि वो सत्ता सुख भोग रहा है, सत्ता को यह महसूस होता है कि वो वर सुख भोग रही है। और इस तरह दोनों का यह भ्रम सरकार रूपी वैवाहिक रथ को पाँच साल की अवधि तक पहुँचा ही देते हैं। रही सही कर समर्थकों रूपी मतदाता सिर्फ जय जयकार करने में ही लीन रहते हैं और उन्हें भी इस बात का भ्रम होता है कि वो भी सत्ता सुख नहीं भोग पा रहे तो क्या हुआ, कम से कम सत्ता सुंदरी का वर वधु आमंत्रण के माध्यम से दीदार करने का परमानंद तो प्राप्त हो रहा है। भौतिक ना सही तो मनोवैज्ञानिक सुख तो प्राप्त ही हो रहा है। पुरोहित इस बात के भ्रम में रहता है कि वर पक्ष के प्रतिद्वंदियों की वजह से यह पंचवर्षीय स्वयंवर कराने के लिए वो वर के राजनैतिक खानदानों, और पूर्व प्रेमियों के निर्दलीय छोटे परिवारों में सुख का रामराज्य व्याप्त कर पा रहा है। इसी तरह उसकी दक्षिणा भी उनकी झोली में चली जाती है।
इस स्वयंवर से एक प्रतिफल यह होता है कि हारे हुए वर उम्मीदवार अगले पाँच सालों के लिए सत्ता के पूर्व प्रेमी बनकर विभिन्न समारोहों में सत्ता की पतिव्रतत्व और पति की पत्नीव्रतत्व पर अफवाहों के बीज बोते रहते हैं, कभी कभी पति की कालगुजारियों पर परदा हटाने का काम, उसको बेवफा बनाने का दायित्व ये निर्वहन करते हैं, कभी कभी सत्ता इनकी बातों में आकर वैवाहिक कांटेक्ट खत्म कर देती है अन्यथा वो भी जानती है कि काहे की वफादारी और कितनी वफादारी,सब माया है इस माया में जब तक भोगना वरदान में मिला है तो भोगने का परमानंद उठाते रहो और आगे पाँच वर्ष के बाद उसे पति की दौलत तो मिलनी है और फिर वो दुल्हन की तरह सजेगी ही फिर को नए वर की तलाश में नये स्वयंवर को रचने ले किए और खानदान बदलकर नये स्वाद को चखने के लिए, कुल मिलाकर स्वादानुसार वर चयन की प्रविधि ही राष्ट्र को गतिशील बनाए हुए है। राष्ट्र कितना गतिशील है या विकसित हो रहा है यह तो मतदाता समर्थक, वर प्रतिद्वंदी, सत्ता सुंदरी, पति परमेश्वर, और पूर्वप्रेमी अपने अपने चश्में से देखते हैं, किसी को विकास स्थिर दिखता और किसी को विकास जेट विमान की रफ्तार से दिखता है। आइए इस स्वयंवर की यज्ञ पीठिका में आहुति देने चलें, उम्मीवार की जय जयकार करने कुछ आहुतियाँ दान करके महादानी कर्ण का तमका हाशिल करके आएँ।
अनिल अयान ,सतना
९४७९४११४०७