स्वतंत्र पत्रकारिता, साहित्य-समाज का अजेय झंड़ावरदार गणेश शंकर विद्यार्थी
जन्म दिन - २६ अक्तूबर १८९०
”जो कलम सरीखे टूट गये पर झुके नहीं, उनके आगे यह दुनिया शीश झुकाती है
जो कलम किसी कीमत पर बेची नहीं गई, वह तो मशाल की तरह उठाई जाती है”
उपर्युक्त पंक्तियां सुकवि रामकृष्ण श्रीवास्तव ने तब लिखी थी जब युवा ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष का शंखनाद कर रहे थे। वैचारिक प्रतिरोध समाजिक आवश्यकता बन चुका था, विरोधात्कम वैचारिक युद्ध पत्रकारिता के द्वारा चलाया जा रहा था, वैसे तो सतना के वरिष्ठ पत्रकार चिंतामणि मिश्र की पुस्तक पत्रकारिता की चुनौतियाँ पुस्तक का एक परोवाक अनुच्छेद में उद्धत है कि " हिंदी पत्रकारिता का जन्म ही राज सत्ता के संघर्ष के लिए और शासकों के शोषण को नंगा करने के लिए हुआ था किंतु अब पत्रकारिता खुद नंगी हो गई है, आज समाज के भीतर तक अकुलाहट, नालायकी और क्षुब्धता व्याप्त है। नाना प्रकार के राजनीतिक धार्मिक और आर्थिक पाखंड आम आदमी की छाती पर मार्चपास्ट कर रहे हैं और पत्रकारित धृष्टराष्ट्र की भूमिका निर्वहन कर रही है। जब जेब और पेट भरने के लिए फेके गए सत्ता के टुक्ड़ों को रेंग रेंग कर बटोरना ही लक्ष्य बना लिया गया हो तो गाड़ी बाड़ी और साड़ी सुलभ हो जाती है किंतु पेट और जेब तो रंडियों के दलाल भी भर लेते हैं टुच्चई करके पैसा बनाना है तो इस पेशे से आसान और भी धंधे हैं।"
पत्रकारिता का पोस्टमार्टम करता और कट कापी पेस्ट के इस युग में पत्रकारिता के नाम पर कागज की लिपाई पुताई करने वालों के लिए तात्कालिक गणेश शंकर विद्यार्थी को जानना समझना और जुझारूपन के साथ वैचारिक विवेचना करना आज की महती आवश्यकता है। यह सच है कि आजादी के पहले का समय और भारत की स्थिति और आज की स्थिति में भारत की परिस्थितियाँ पूरी तरह से अलग हो चुकी है। भारत की वो युवा शक्ति और युवा लेखनी की धार राजनीति की धार के सामने मंद हो चुकी है। आज के समय में कुछ समाचार पत्रों को छोड़ दें तो वो मॉब लिंचिंग की तरह भीड़ की उपज बन चुके हैं। कई अखबार तो समय की नजाकत से मुंह मोड़ते हुए खाना पूर्ति का काम करने में मगन हैं।
पहले पैरा में व्यक्त पंक्तियाँ स्वराज के लिए अपना तन, मन, धन और जीवन समर्पित कर देने वाले अमर शहीद और कलम के धनी जनयोध्दा गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे जुझारू व्यक्तित्व की शान में ही लिखी गई थी। विद्यार्थी जी ने पत्रकारिता के जरिये स्वराज को जनांदोलन बना डाला था, उस समय बंदूख और सत्याग्रह दोनों आमने सामने आ चुके थे, स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की भी दो जमात हो चुकी थी, गरम दल और नरम दल के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आंतरिक कलह के चलते किनारा पकड़ने लग गये थे। महावीर प्रसाद द्विवेदी की सरस्वती पत्र की संपादकीय टीम मे रहे गणेश शंकर विद्यार्थी में वो ललक जुनून और समय की गति को पहचानने की छमता थी कि उन्होने पत्रकारिता और कलम की सत्ता के चलते अंग्रेजी सत्ता और परतंत्रता के विरोध में कलम को हथियार बनाकर कूद गए, फिर तो एक समाचार को चलाकर उसे किसी और युवा को सौंप कर अन्य समाचार पत्र को सम्हालने का सिलसिला चल पड़ा. ‘हमारी आत्मोसर्गता’, भारत मित्र, बंगवासी, महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के पत्र ‘अभ्युदय’,‘प्रताप’,'प्रभा' जैसे प्रमुख पत्रों को विद्यार्थी जी ने विद्यार्थी की तरह पाला पोसा उससे कुछ सीखा और फिर स्वतंत्रता के लिए अपने विचारों के महाकुंभ को चेतना के स्वरों के साथ समर्पित कर दिया।‘झंडा ऊंचा रहे हमारा’ गीत जो श्याम लाल गुप्त पार्षद ने लिखा था. उसे भी 13 अप्रैल 1924 से जलियांवाला की बरसी पर विद्यार्थी ने गाया जाना शुरू करवाया था।
विद्यार्थी जी सिर्फ पत्रकार ही नहीं थे बल्कि एक अच्छे विचारक, चिंतक, साहित्य और समाज के सक्रिय और अजेय झंड़ावरदार भी थे, पठन पाठन के प्रति उनकी रुचि दिनों दिन बढ़ती गई। उन्होंने अपने समय के विख्यात विचारकों वाल्टेयर, थोरो, इमर्सन, जान स्टुअर्ट मिल, शेख सादी सहित अन्य रचनाकारों की कृतियों का अध्ययन किया। वे लोकमान्य तिलक के राष्ट्रीय दर्शन से बेहद प्रभावित थे।पंडित मदन मोहन मालवीय के विचारों से सहमत होकर वो अभ्युदय की संपादकीय टीम के हिस्सा बने। महात्मा गांधी ने उन दिनों अंग्रेजों के खिलाफ अहिंसात्मक आंदोलन की शुरूआत की थी जिससे विद्यार्थी जी सहमत नहीं थे, क्योंकि वे स्वभाव से उग्रवादी विचारों के थे उनका स्पष्ट मानना था कि उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि हम राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन, सामाजिक आर्थिक क्रांति, जातीय गौरव, साहित्यिक सांस्कृतिक विरासत के लिए, अपने हक अधिकार के लिए संघर्ष करेंगे।नानक सिंह की ‘सौदा ए वतन’ नामक कविता और काकोरी काण्ड के नायक रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा को उन्होंने ‘प्रताप’ की प्रेस से ही प्रकाशित किया था। इसके बाद से ही प्रताप और विद्यार्थी जी पराधीन भारत में बदनाम पत्रकार और पत्र के संपादक के रूप में सुप्रसिद्ध हो गए।
इतना ही नहीं जब उन्हें जेल की चार दीवारी में रहना पड़ा तो तब भी वो साहित्यिक माहौल में रहे उनका सानिध्य जेलयात्रा के दौरान माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, सहित अन्य साहित्यकारों से भी हुआ। उन्होने उस समय इन रचनाकारों की रचनाओं और उससे उपजते देश प्रेम तथा स्वतंत्रता संग्राम में इनकी रचनाओं से उत्पन्न चेतना का बारीकी से पारखी की तरह अध्ययन किया और जीवन के अंतिम दौर तक कौमी एकता के लिए संघर्ष करते रहे।हसरत मोहानी जिन्होंने गजल लिखी है, चुपके-चुपके रात-दिन आंसू बहाना याद .... गणेश शंकर विद्यार्थी और उन्नाव के हसरत मोहानी साहब बहुत अच्छे दोस्त थे. हरसत मोहानी की 1924 में जब जेल से वापसी हुई तो गणेश शंकर विद्यार्थी ने उनकी तारीफ में प्रतापमें एक लेख लिखा था. जिसमें उन्होंने लिखा था कि मौलाना को मजहब के नाम पर झगड़ने वालों को रोकना चाहिए. और मोहानी ही हैं जो गांधी जी के बाद लोगों को मजहब के नाम पर एक-दूसरे को मारने से बचा सकते हैं।
विद्यार्थी जी साम्प्रदायिक के घोर विरोधी थे और उन्होंने जीवनभर एकजुटता, कौमी एकता पर जोर दिया। जिस कौमी एकता के लिए वो लड़ते रहे, जिस संप्रदायिता के लिए वो विरोध दर्ज करते रहे यह विधि का विधान ही था कि दंगों के चलते ही कलम का यह सिपाही मौन हो गया। एक लावारिश लाश की तरह इसकी विचारशीलता भी अपने तन को छोड़कर लोगों के मन में घर कर गई। सन अट्ठारह सौ नब्बे से सन उन्नीस सौ एकतिस तक उनका जीवन परतंत्र भारत में ही चलता रहा। उनकी कलम ने विरोध के स्वरों को हवा देने का काम किया। वो ऐसे पत्रकार थे जिन्होने स्वतंत्रता को पत्रकारिता से वृहद रूप से जोड़ने का काम किया। पत्रकारिता के जनक और पोषक के रूप में उनका काम हमेशा स्मरणीय रहेगा। आज पत्रकारिता का जो भी रूप हमारे सामने है वह कहीं ना कहीं आदि पत्रकार देवर्षि नारद, विद्यार्थे जी और माखनलाल चतुर्वेदी प्रभाश जोशी, जैसे कलमकारों से होता हुआ वर्तमान तक पहुँचा है, पत्रकारिता के नाम पर जितनी चकाचौंध आज मौजूद है वह शायद उस समय नहीं थी जब गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे कलमकारों ने स्वातंत्रता संग्राम को फतेह करना ही पत्रकारिता का मिशन बनाया था, जिसमें विचार, दृष्टि और निर्णय शामिल था। आने वाली पत्रकारों की पीढी इन पूर्वजों के विचारों को पहचान पाएँ यह इस समय में सबसे बड़ी पत्रकारिता की चुनौती है।
अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७
जन्म दिन - २६ अक्तूबर १८९०
”जो कलम सरीखे टूट गये पर झुके नहीं, उनके आगे यह दुनिया शीश झुकाती है
जो कलम किसी कीमत पर बेची नहीं गई, वह तो मशाल की तरह उठाई जाती है”
उपर्युक्त पंक्तियां सुकवि रामकृष्ण श्रीवास्तव ने तब लिखी थी जब युवा ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष का शंखनाद कर रहे थे। वैचारिक प्रतिरोध समाजिक आवश्यकता बन चुका था, विरोधात्कम वैचारिक युद्ध पत्रकारिता के द्वारा चलाया जा रहा था, वैसे तो सतना के वरिष्ठ पत्रकार चिंतामणि मिश्र की पुस्तक पत्रकारिता की चुनौतियाँ पुस्तक का एक परोवाक अनुच्छेद में उद्धत है कि " हिंदी पत्रकारिता का जन्म ही राज सत्ता के संघर्ष के लिए और शासकों के शोषण को नंगा करने के लिए हुआ था किंतु अब पत्रकारिता खुद नंगी हो गई है, आज समाज के भीतर तक अकुलाहट, नालायकी और क्षुब्धता व्याप्त है। नाना प्रकार के राजनीतिक धार्मिक और आर्थिक पाखंड आम आदमी की छाती पर मार्चपास्ट कर रहे हैं और पत्रकारित धृष्टराष्ट्र की भूमिका निर्वहन कर रही है। जब जेब और पेट भरने के लिए फेके गए सत्ता के टुक्ड़ों को रेंग रेंग कर बटोरना ही लक्ष्य बना लिया गया हो तो गाड़ी बाड़ी और साड़ी सुलभ हो जाती है किंतु पेट और जेब तो रंडियों के दलाल भी भर लेते हैं टुच्चई करके पैसा बनाना है तो इस पेशे से आसान और भी धंधे हैं।"
पत्रकारिता का पोस्टमार्टम करता और कट कापी पेस्ट के इस युग में पत्रकारिता के नाम पर कागज की लिपाई पुताई करने वालों के लिए तात्कालिक गणेश शंकर विद्यार्थी को जानना समझना और जुझारूपन के साथ वैचारिक विवेचना करना आज की महती आवश्यकता है। यह सच है कि आजादी के पहले का समय और भारत की स्थिति और आज की स्थिति में भारत की परिस्थितियाँ पूरी तरह से अलग हो चुकी है। भारत की वो युवा शक्ति और युवा लेखनी की धार राजनीति की धार के सामने मंद हो चुकी है। आज के समय में कुछ समाचार पत्रों को छोड़ दें तो वो मॉब लिंचिंग की तरह भीड़ की उपज बन चुके हैं। कई अखबार तो समय की नजाकत से मुंह मोड़ते हुए खाना पूर्ति का काम करने में मगन हैं।
पहले पैरा में व्यक्त पंक्तियाँ स्वराज के लिए अपना तन, मन, धन और जीवन समर्पित कर देने वाले अमर शहीद और कलम के धनी जनयोध्दा गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे जुझारू व्यक्तित्व की शान में ही लिखी गई थी। विद्यार्थी जी ने पत्रकारिता के जरिये स्वराज को जनांदोलन बना डाला था, उस समय बंदूख और सत्याग्रह दोनों आमने सामने आ चुके थे, स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की भी दो जमात हो चुकी थी, गरम दल और नरम दल के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आंतरिक कलह के चलते किनारा पकड़ने लग गये थे। महावीर प्रसाद द्विवेदी की सरस्वती पत्र की संपादकीय टीम मे रहे गणेश शंकर विद्यार्थी में वो ललक जुनून और समय की गति को पहचानने की छमता थी कि उन्होने पत्रकारिता और कलम की सत्ता के चलते अंग्रेजी सत्ता और परतंत्रता के विरोध में कलम को हथियार बनाकर कूद गए, फिर तो एक समाचार को चलाकर उसे किसी और युवा को सौंप कर अन्य समाचार पत्र को सम्हालने का सिलसिला चल पड़ा. ‘हमारी आत्मोसर्गता’, भारत मित्र, बंगवासी, महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के पत्र ‘अभ्युदय’,‘प्रताप’,'प्रभा' जैसे प्रमुख पत्रों को विद्यार्थी जी ने विद्यार्थी की तरह पाला पोसा उससे कुछ सीखा और फिर स्वतंत्रता के लिए अपने विचारों के महाकुंभ को चेतना के स्वरों के साथ समर्पित कर दिया।‘झंडा ऊंचा रहे हमारा’ गीत जो श्याम लाल गुप्त पार्षद ने लिखा था. उसे भी 13 अप्रैल 1924 से जलियांवाला की बरसी पर विद्यार्थी ने गाया जाना शुरू करवाया था।
विद्यार्थी जी सिर्फ पत्रकार ही नहीं थे बल्कि एक अच्छे विचारक, चिंतक, साहित्य और समाज के सक्रिय और अजेय झंड़ावरदार भी थे, पठन पाठन के प्रति उनकी रुचि दिनों दिन बढ़ती गई। उन्होंने अपने समय के विख्यात विचारकों वाल्टेयर, थोरो, इमर्सन, जान स्टुअर्ट मिल, शेख सादी सहित अन्य रचनाकारों की कृतियों का अध्ययन किया। वे लोकमान्य तिलक के राष्ट्रीय दर्शन से बेहद प्रभावित थे।पंडित मदन मोहन मालवीय के विचारों से सहमत होकर वो अभ्युदय की संपादकीय टीम के हिस्सा बने। महात्मा गांधी ने उन दिनों अंग्रेजों के खिलाफ अहिंसात्मक आंदोलन की शुरूआत की थी जिससे विद्यार्थी जी सहमत नहीं थे, क्योंकि वे स्वभाव से उग्रवादी विचारों के थे उनका स्पष्ट मानना था कि उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि हम राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन, सामाजिक आर्थिक क्रांति, जातीय गौरव, साहित्यिक सांस्कृतिक विरासत के लिए, अपने हक अधिकार के लिए संघर्ष करेंगे।नानक सिंह की ‘सौदा ए वतन’ नामक कविता और काकोरी काण्ड के नायक रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा को उन्होंने ‘प्रताप’ की प्रेस से ही प्रकाशित किया था। इसके बाद से ही प्रताप और विद्यार्थी जी पराधीन भारत में बदनाम पत्रकार और पत्र के संपादक के रूप में सुप्रसिद्ध हो गए।
इतना ही नहीं जब उन्हें जेल की चार दीवारी में रहना पड़ा तो तब भी वो साहित्यिक माहौल में रहे उनका सानिध्य जेलयात्रा के दौरान माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, सहित अन्य साहित्यकारों से भी हुआ। उन्होने उस समय इन रचनाकारों की रचनाओं और उससे उपजते देश प्रेम तथा स्वतंत्रता संग्राम में इनकी रचनाओं से उत्पन्न चेतना का बारीकी से पारखी की तरह अध्ययन किया और जीवन के अंतिम दौर तक कौमी एकता के लिए संघर्ष करते रहे।हसरत मोहानी जिन्होंने गजल लिखी है, चुपके-चुपके रात-दिन आंसू बहाना याद .... गणेश शंकर विद्यार्थी और उन्नाव के हसरत मोहानी साहब बहुत अच्छे दोस्त थे. हरसत मोहानी की 1924 में जब जेल से वापसी हुई तो गणेश शंकर विद्यार्थी ने उनकी तारीफ में प्रतापमें एक लेख लिखा था. जिसमें उन्होंने लिखा था कि मौलाना को मजहब के नाम पर झगड़ने वालों को रोकना चाहिए. और मोहानी ही हैं जो गांधी जी के बाद लोगों को मजहब के नाम पर एक-दूसरे को मारने से बचा सकते हैं।
विद्यार्थी जी साम्प्रदायिक के घोर विरोधी थे और उन्होंने जीवनभर एकजुटता, कौमी एकता पर जोर दिया। जिस कौमी एकता के लिए वो लड़ते रहे, जिस संप्रदायिता के लिए वो विरोध दर्ज करते रहे यह विधि का विधान ही था कि दंगों के चलते ही कलम का यह सिपाही मौन हो गया। एक लावारिश लाश की तरह इसकी विचारशीलता भी अपने तन को छोड़कर लोगों के मन में घर कर गई। सन अट्ठारह सौ नब्बे से सन उन्नीस सौ एकतिस तक उनका जीवन परतंत्र भारत में ही चलता रहा। उनकी कलम ने विरोध के स्वरों को हवा देने का काम किया। वो ऐसे पत्रकार थे जिन्होने स्वतंत्रता को पत्रकारिता से वृहद रूप से जोड़ने का काम किया। पत्रकारिता के जनक और पोषक के रूप में उनका काम हमेशा स्मरणीय रहेगा। आज पत्रकारिता का जो भी रूप हमारे सामने है वह कहीं ना कहीं आदि पत्रकार देवर्षि नारद, विद्यार्थे जी और माखनलाल चतुर्वेदी प्रभाश जोशी, जैसे कलमकारों से होता हुआ वर्तमान तक पहुँचा है, पत्रकारिता के नाम पर जितनी चकाचौंध आज मौजूद है वह शायद उस समय नहीं थी जब गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे कलमकारों ने स्वातंत्रता संग्राम को फतेह करना ही पत्रकारिता का मिशन बनाया था, जिसमें विचार, दृष्टि और निर्णय शामिल था। आने वाली पत्रकारों की पीढी इन पूर्वजों के विचारों को पहचान पाएँ यह इस समय में सबसे बड़ी पत्रकारिता की चुनौती है।
अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७
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