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Monday, 19 November 2018

खुदे शहरों में "खुदा" को याद करें

खुदे शहरों में "खुदा" को याद करें

ये खुदे - खुदे से शहर,अब ऐतबार बिल्कुल भी नहीं।
खुदा को याद करना है अब इंतजार बिल्कुल भी नहीं।

खुदाई से ही नई सभ्यताओं की खोज हुई हैं पुरातत्व विभाग इसी को मूल मंत्र मान कर अपने कर्तव्य निष्ठ होने की पुष्टि करता है। खुदाई की इसी परंपरा का निर्वहन पुरातन काल असे आज तक हमारे मुंसिबदार भी कर रहे हैं। इस समय जब सुबह सुबह निकलो तो ऐसा लगता है कि हम हड़्प्पा और मोहनजोदड़ों के पुरातन नगर में पहुंच गए हैं। जहाँ पर फिर कोई नई खुदाई नई सभ्यता को जन्म देने वाली है। यह जन्मोत्सव का बरहौं कब होगा यह अज्ञात है। किंतु एक बात तो तय है कि इस खुदाई की परंपरा का असर सरकार के स्वास्थ्य में जरूर पड़ा है। यही वजह रही है कि इस तरह की खुदाई करके सृजन करने का काम उन्हीं को दिया जाता है जो इस मामले में प्रायोगिक रूप से नौसिखिये हैं और कागजाती मामले में निपुण हैं। इससे सरकारी कार्य की गुणवत्ता का स्तर भी स्तरीय हो जाता है। खुदाई के इस धूल धक्कड़ी सम्राज्य में हर रहवासी अपने जानमाल और स्वास्थ्य के लिए खुदा को जरूर याद करता है। अगर राजा का स्वास्थ्य सुधरा हुआ है तो कुछ प्रजा को भी खुदा की नेमत मिलनी ही चाहिए।
खुदाई के चलते इस समय प्रशासन बहुत ज्यादा सकते में है क्योंकि वो जानता है कि यह माहौल आने वाले चुनाव के लिए संक्रामक है। इस संक्रमण के चलते कहीं वोटों को धूल वाली सर्दी खांसी बुखार हो गया तो वोटिंग के दिन वो बीमार होकर खटिया ही टोड़ेगा और इसका परिणाम यह होगा कि मतगणना के दिन पार्टियों का हाल बेहाल हो जाएगा क्योंकि खस्ताहाल शहर की खुदाई करने और नई वोटतंत्र की सभ्यता की खोज करने की कोशिश बेमानी ही होती है। इस बेमानी वाले धतकरम में मरन हम सबकी तो होती है किंतु सरकारों प्रशासनों और जिलाधीशों की ज्यादा मरन होती है क्योंकि समय समय पर चुनावी दौरे होते हैं, पुलिस से लेकर आलाकमान अफसर तक राष्ट्रीय नेताओं की अगवानी करने के सिर दर्द को झेलने के लिए मनोवैज्ञानिक रूप से खुद को तैयार करते हैं। उस समय इन खुदे शहरों की तथाकथित अच्छे दिन वाली एक्स्प्रेसवे सड़कों को थोड़ा बहुत सड़क के रूप में परिभाषित करने के लिए नगर निगम और नगर पालिका के कर्मचारी युद्धस्तर की तैयारी करते हैं सोचते हैं कि राजाधिराज को कोई खबर नहीं है किंतु वो ये नहीं जानते कि जब राजाधिराज खबरों के बिस्तर में ही चैन की नींद लेते हैं तो ये खुदाई वाली खबरें उनसे बेचारी कैसे छिपी होंगी।
ऐसा नहीं है कि सिर्फ जमीनी खुदाई की जा रही है। सोशल मीडिया में तो वैचारिक खुदाई करने का भी ठेका ठेकेदारों को उसी तरह दिया गया है जैसे शराब के ठेकेदारों को रेवड़ी बांटी जाती है। इस समय सोशल मीडिया में सिर्फ दो स्थान है। राष्ट्रभक्तिस्थान और देशद्रोहिस्थान इन स्थानों के वासी होने के लिए सिर्फ एक मापदंड़ का विधान है। अगर आपको सरकार की नीतियों को आँख मूँद कर
समर्थन करने का अंधभक्तित्व गुण प्राप्त हैं तो पहले स्थान के निवासी हैं अन्यथा विरोधियों के लिए सिर्फ दूसरा स्थान सुनिश्चित है। इन स्थानों में काम की बातें और मुद्दों को संदेहास्पद बनाया ही जाता है साथ ही साथ भ्रांतियों को फैलाने का पुण्य कार्य भी किया जाता है। कुल मिलाकर इस स्थान पर चौर्यकला से निपुण लोग भीड़ को नियंत्रित करने का कार्य करते हैं, अर्थात नागरिकों को सस्ते से सस्ते दर में इंटरनेट उपल्ब्ध करवाकर बेरोजगारी को कम करने का सीना पीटने वाली कंपनी की कृपा से उन बिंदुओं को पटल से गायब कर दिया जाता है, जिनके बारे में जनता को सोचना चाहिए, बल्कि उन मुद्दों को मॉब लिंचिंग के लिए परोस दिया जाता है जिनका देश के विकास और अर्थव्यवस्था से दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं है।
उपर्युक्त पैरा का एक छोटा सा उदाहरण मी टू और सेम टू यू वाला लिया जा सकता है खाई अघाई किस्म के फुरसतिए सेलेब्रिटीज ने मीटू हैश टैग से विद्रोह की आँधी ला दीं। जब तक शोषण से अवशोषित होकर नाम दाम मिलता रहा तब तक सब जायज रहा अब उसी दबे अत्याचार की दुहाई देकर विद्रोह की ज्वलंत आग लगाने का यह कैंपेन पूरे देश को उसकी मूलभूत चिंता से भटका दिया। देश को नौकरी, अर्थव्यव्स्था, बैंको का कर्ज, किसानों की मौतों, राज्यों की आपसी झड़प छिप गई। इन संबंधित महिलाओं को चाहिए था कि न्याय पालिका में पिटीशन दायर करके केश करती और कुसूरवार को सजा दिलवाती, या महिला आयोग के साथ मिलकर न्यायसंगत निर्णय के लिए पहल करतीं किंतु उन्हें तो कंट्रोवर्सी और लाइक कमेंट्स का ताजमहल खड़ा करना था, जिसमें वो केंद्र बिंदु में दिखाई दें। इसी का दूसरा उदाहरण पटाखों को फोड़ने में घंटे निर्धारित करने का विषय, दिल्ली वायु प्रदूषण से आत्म हत्याकरने के लिए दिन गिन रही है, और पटाखों के बदले ग्रीन दीवाली का प्रचार करने की बजाय इस पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है जबकि पटाखों का आयात और विक्रय पर सरकार और शासन का की नियंत्रण है। सरदार पटेल की मूर्ति बनवाने के लिए भी चीन का माल आयात करने पर खूब धमा चौकड़ी मचाई जा रही है, वहाँ पर स्वदेशी व्यव्स्था को घेरे में लिया जा रहा है।
राजनैतिक दल अपने कार्यकर्ताओं की वफादारी की भी खुदाई करने में व्यस्त हैं। चुनाव में सत्तारूढ़ होने का सपना लेकर पुराने से पुराने तथा उम्रदराज कार्यकर्ताओं की वफादारी का डीएनए टेस्ट करके उनकी आत्मा की खुदाई कर दी गई। परिवार वाद के नाम का बुल्डोजर चलने की वजह से उम्मीदवारों की उम्मीद पर पार्टियों ने ऐसे पानी फेरा कि विद्रोह का स्वर यहाँ भी फूट पड़ा वफादारों ने भी पार्टी को बता दिया कि पार्टी उन्हें मॉब लिंचिंग न करे, वो सोशल मीड़िया के अंध भक्त नहीं हैं जो अपनी राजनैतिक जीवनी को पार्टी के संस्मरण के लिए बलिदान कर दें, निर्दलीय लड़कर वोट को पतंग की तरह लूट लेने का गुण इन्हीं वफादार कार्यकर्ताओं से सीखा जा सकता है।यह विरोध उसी तरह है जैसे स्वतंत्रता समर मंगल पांडे ने किया था। लोकतंत्र के इस पर्व को महापर्व बनाने की मैराथन में जागरुकता कार्यक्रमों के चलते सिर्फ चुनाव आयोग की आचार संहिता से बच कर अपने स्वार्थ को सिद्ध करने का हुनर भी इस वैचारिक खुदाई में खुदा को याद करा ही देती है।
कुल मिलाकर खुदाई करना अब सर्वव्यापी कृत्य हो गया है। इससे कितना सृजन होगा यह कोई नहीं जानता। किंतु सुविधाभोगी समाज में असुविधा व्याप्त है। शहर से लेकर गाँव कस्बे और शहर से लेकर राजधानी और महानगर तक इस संवैधानिक और ऐतिहासिक सुविधा से त्रस्त हो चुकी है। सब अंतर्मन में राम राम जप रहे हैं, परंतु यह संदेह है कि राम राम का संबोधन कहीं हे राम में ना बदल जाए। क्योंकि दोनों संबोधन आज के समय में पार्टीगत हो गए हैं। अब देखना यह है कि इस संबोधन में कहीं सीता राम कहने वालों का समावेश हो गया तो जय श्री राम कहने वालों की परंपरा की निर्वाध गति में कितना वेग उत्पन्न होता है। क्योंकि खुदाई से गति अवरोधक तो खुद बखुद बन ही जाते हैं जिन्हें नैसर्गिक विडंबना के रूप में क्षमा नहीं किया जाएगा। अंततः इतनी खुदाई होने के बाद देश के लोकतंत्र में कितना गतिअवरोधक निर्मित होगा। इस यक्ष प्रश्न के उत्तर के लिए भविष्य के गर्भ में जाना शेष है।
अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७

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