hamari vani

www.hamarivani.com

Monday, 19 November 2018

दौड़ा-दौड़ा, भागा-भागा सा बेचारा जीवन


दौड़ा-दौड़ा, भागा-भागा सा बेचारा जीवन

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर विशेष

अजीब से दास्तां हो गई है हमारे जीवन की, हम सुबह उठकर दौड़ने भागने लगते हैं, और रात तक दौड़ते भागते रहते हैं। कभी कभी तो हम इतने तनाव में होते हैं कि नींद में भी दौड़ना भागना शुरू कर देते हैं। आखिरकार हमारी यह दौड़ भाग हमें किस ओर लिए जा रही है। हम मन ही मन अपने मन की नहीं सुनना चाह रहे हैं। हम दिमाग के ताने बाने के संकेतों को नज़रंदाज करने में लगे हुए हैं। हम जब कभी हाथ पैर से दौड़ा भागी नहीं करते तो हम दिमाग और दिल से मैराथन शुरूकर देते हैं। हमारा दिमाग बिस्तर में लेटे हुए, कुर्सी में बैठे हुए भारत ही क्या विश्व भर में कुछ ही छणों में विचरण कर आता है। हमारा दिल और उसकी धड़कने टेली पैथी के जरिए कितने संमंदर पार बैठे अपने दोस्तों के गप्प करके आ जाती हैं। हम कितने व्यस्त हो गए हैं। अब हम काम धंधे को छोड़कर तकनीकि की गिरफ्त में आ गए हैं। अगर हमें कोई रोगकारक जीव संक्रामित कर दे तो हम डाक्टर के पास जाकर गोली दवाई खाकर अपना उपचार कर लेते हैं। किंतु जब टेक्नलाजी और उसकी ट्रैफिकिंग की वजह से तनाव और मानसिक असंतुलन के ग्रास में समाते हैं तो हमारा कोई खेवन हार नहीं होता। हम मनो वैज्ञानिक रूप से टूट से जातेहैं और अपनी इस टूटन का गुस्सा अपने कार्य क्षेत्र में या फिर अपने परिवार में पत्नी, बच्चे, माता पिता अन्य सदस्यों पर उतारते हैं। हम कभी तनाव, कभी क्लेश, कभी बैर, कभी मानसिक रूप से कमजोरी के कई लक्षण दिखा ही देते हैं। मानसिक रूप से टूटने वाले हर एक व्यक्ति अपने आप को रोगी नहीं स्वीकार करते बल्कि वो इसे अपने व्यवहार में बदलाव मानते हैं और स्वस्थ भी महसूस करते हैं। वो इसे समाज में हो रहे बदलाव का हिस्सा मानते हैं। यदि हम इस तरह के मानवीय व्यवहार के परिवर्तन को वैश्विक स्तर पर देखें तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि भारतीय समाज का हर नागरिक किसी ना किसी मानसिक रोग से ग्रसित है। मै कोई डाक्टर नहीं किंतु अपने आसपास के लोगों के व्यवहारों के अध्ध्यन से पता लगता है कि हमारे आसपास, हर क्षेत्र में मनोरोगी मौ जूद हैं।
मनोवैज्ञानिक और मानसिक स्वास्थ की चिंता 19वीं शताब्दी के मध्य में, विलियम स्वीटजर प्रथम व्यक्ति थे जिनको होने लगी थी। जिन्होंने "मानसिक स्वास्थ्य" को पहली बार स्पष्ट रूप से परिभाषित किया, जिसे सकारात्मक मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के कार्यों के समकालीन दृष्टिकोण के अग्रदूत के रूप में देखा जा सकता है। उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य को एक कला के रूप में परिभाषित किया है जिसका कार्य है ऐसी घटनाओं और प्रभावों के खिलाफ मस्तिष्क को संरक्षित करना जो इसकी ऊर्जा, गुणवत्ता या विकास को बाधित या नष्ट कर सकते हैं। "मानसिक स्वास्थ्य" के क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण शख्सियत थी डोरोथिया डिक्स एक स्कूल शिक्षिका, जिन्होंने अपने पूरे जीवन उन लोगों की सहायता के लिए प्रचार किया जो मानसिक बीमारी से पीड़ित थे और उन दु:खद परिस्थितियों को सामने रखा जिसमे इन लोगों को रखा जाता था। 20 वीं सदी की शुरुआत में, क्लिफर्ड बीयर्स ने राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य समिति की स्थापना की और संयुक्त राज्य में प्रथम आउट पेशेंट मानसिक स्वास्थ्य क्लिनिक खोला. मानसिक स्वास्थ्य को कई रूप में देखा जा सकता है जहां एक व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य के कई विभिन्न संभावित मूल्य हो सकते हैं। मानसिक स्वस्थ को आम तौर पर एक सकारात्मक गुण के रूप में देखा जाता है, इस रूप में कि एक व्यक्ति मानसिक स्वास्थ्य के उच्चतम स्तर तक पहुंच सकता है, भले ही उनमे किसी भी निदान योग्य मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति नहीं है। मानसिक स्वास्थ्य के एक समग्र मॉडल में आमतौर पर ऐसी अवधारणाएं शामिल होती हैं जो मानवविज्ञान, शैक्षिक, मानसिक, धार्मिक और सामाजिक दृष्टिकोण पर आधारित होती है, साथ ही साथ इसमें व्यक्तित्व, सामाजिक नैदानिक, स्वास्थ्य और विकासात्मक मनोविज्ञान का सैद्धांतिक दृष्टिकोण शामिल होता है। कई मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर इस बात को समझने लगे हैं, या समझ चुके हैं कि धार्मिक विविधता और आध्यात्मिकता में योग्यता का क्या महत्व है।
मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों के बारे में जागरूकता बढ़ाने और मानसिक स्वास्थ्य के सहयोगात्मक प्रयासों को संगठित करने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 10 अक्टूबर को मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है। विश्व मानसिक स्वास्थ्य संघ ने विश्व के लोगों के मानसिक स्वास्थ्य देखभाल को यथार्थवादी बनाने के लिए वर्ष 1992 में विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस की स्थापना की थी। विश्व में चार व्यक्तियों में से एक व्यक्ति जीवन के किसी मोड़ पर मानसिक विकार या तंत्रिका संबंधी विकारों से प्रभावित है। मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित दस से उन्नीस वर्ष की उम्र के व्यक्तियों की वैश्विक रोग भार में पच्चीस प्रतिशत हिस्सेदारी है। विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस वर्ष 2018 "विश्व के बदलते परिदृश में वयस्क और मानसिक स्वास्थ्य" पर केंद्रित है। किशोरावस्था और वयस्कता के शुरुआती वर्ष जीवन का वह समय होता है, जब कई बदलाव होते हैं, उदाहरण के लिए स्कूल बदलना, घर छोड़ना तथा कॉलेज, विश्वविद्यालय या नई नौकरी शुरू करना। कई लोगों के लिए ये रोमांचक समय होता हैं तथा कुछ मामलों में यह तनाव और शंका का समय हो सकता है। कई लाभों के साथ ऑनलाइन प्रौद्योगिकियों का बढ़ता उपयोग इस आयु वर्ग के लोगों के लिए अतिरिक्त दबाव भी लाया है,  
कई युवा तो आज के समय के एक दो दिन वाले प्यार के चक्कर मे खुद को फांस कर मानसिक अकेलेपन, अवसाद,निराशा की अनुभूति करतेहैं। युवाओं में किसी अनजान अपने का पास आना और फिर दिल तोड़कर फारिक हो जाने से भी टूटन की सथिति पैदा हो जाती है। यदि इसे पहचाना और प्रबंधित नहीं किया जाता है, तो यह तनाव मानसिक रोग उत्पन्न कर सकता है। सभी मानसिक रोगों में से आधे चौदह वर्ष की उम्र तक शुरू होते है, लेकिन अधिकांश मामले रोग की जानकारी और उपचार के बिना रह जाते है। किशोरों में रोग के संदर्भ में अवसाद तीसरा प्रमुख कारण है। आत्महत्या पंद्रह से उनतीस वर्षीय लोगों के बीच मृत्यु का दूसरा प्रमुख कारण है। किशोरों में अल्कोहल और मादक पदार्थों का हानिकारक उपयोग कई देशों में एक प्रमुख समस्या है तथा यह असुरक्षित यौन संबंध या खतरनाक ड्राइविंग जैसा ज़ोखिमपूर्ण व्यवहार उत्पन्न करता है। आहार विकार भी चिंता का विषय हैं। यदि उपचार नहीं किया जाता है, तो ये स्थितियां बच्चों के विकास, शिक्षा प्राप्ति तथा उनकी जीवन अपेक्षाएँ पूरी करने और जीवन की क्षमता को प्रभावित करती हैं। इससे उनके कैरियर के प्रति दबाव बनताहै, माता पिता को उनकी वजह से हर जगह अपमान महसूस होता है। समाज रिश्तेदारी में उनके प्रति घृणा का भाव और हास्य का भाव पैदा होता है। कहीं न कहीं समाज में उनकी उपादेयता भी कम हो जाती है।
हमारे भारत देश में आज  लगभग 35 मिलियन लोग दस से चौबीस वर्ष की आयु के बीच हैं; भारत, लगभग तीस प्रतिशत युवा जनसंख्या के साथ युवाओं का देश है। किशोरों और वयस्कों के बीच मानसिक परेशानी की रोकथाम और प्रबंधन की शुरूआत जागरूकता बढ़ाकर और मानसिक रोग के प्रारंभिक चेतावनी संकेतों और लक्षणों को समझकर कम उम्र से की जानी चाहिए। माता-पिता और शिक्षक घर एवं स्कूल में रोजमर्रा की चुनौतियों का मुक़ाबला करने में सहयोग के लिए बच्चों और किशोरों के जीवन कौशल निर्माण करने में मदद कर सकते हैं जैसे कि सामाजिक कौशल, समस्या सुलझाने का कौशल और आत्मविश्वास बढ़ाना, प्रयास संसाधन और सेवाएं उत्पन्न और विकसित करने पर केंद्रित होना चाहिए, जो कि वयस्कों को सशक्त और जुड़ा महसूस होने में सहयोग करता हैं। मनोवैज्ञानिक सहयोग स्कूलों और अन्य सामुदायिक स्तरों पर प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों द्वारा प्रदान किया जा सकता है जो कि मानसिक स्वास्थ्य विकारों का पता लगा सकते हैं तथा उन्हें प्रबंधित कर सकते हैं। किशोरावस्था स्वास्थ्य को प्रोत्साहित और संरक्षित करने से न केवल किशोर स्वास्थ्य को, बल्कि समाज और देश को भी लाभ होता है। इसके अलावा, समाज की सोच को महती रूप से बदलने की आवश्यकताहै। किशोरों और युवाओं को सोशल मीडिया और इसकी व्यस्तताओं से जितना दूर रखेंगे मानसिक तनाव उतना ही ज्यादा कम होगा, हर उमर के साथी यदि मानसिक रूप से स्वस्थ, आत्मविश्वासी,और सजग होगें प्राकृतिक रूप तकनीकि रूप को अपने समय की आवश्यकतानुसार उपयोग करेंगें तो तन मन दोनों खुश होगा। दिनचर्या भी आसानी से चलेगी, हम अपनी जिंदगी में दौड़ेगे तो पर भाग भाग कर खुद को पस्त नहीं करेंगें। हमें यह मान लेना चाहिए कि मानसिक स्वस्थ युवा जनबल, परिवार और समुदाय तथा समाज में अधिक योगदान करने में सक्षम बनता हैं।
अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७


















No comments:

Post a Comment