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Monday, 19 November 2018

अंधाधुध "भक्ति" का शक्ति प्रदर्शन

अंधाधुध "भक्ति" का शक्ति प्रदर्शन

हमारे नगर में फिर पधारा नवरात्रि का उत्सव नौ दिन और दशहरे की धमक से गूँजता दसवाँ दिन नगर को महानगर की संस्कृति और सभ्यता जोड़ ही देता है। अच्छा तो है कि इस मामले में हमारा नगर अछूत तो नहीं रहा, अब तो वर्ष दर वर्ष भक्ति भी आधुनिक होती जा रही है। आधुनिकता के अंधानुकरण ने भक्ति को अंधाधुंध रूप में प्रभावित भी किया और सच्ची भक्ति को शक्ति प्रदर्शन में प्रवाहित भी कर दिया। अब तो यह शक्ति प्रदर्शन आदिशक्ति साधना का आड़ंबर प्रतीत होता है। भक्ति में बालीवुड़ के गीतों को शामिल करने की वो होड़ है जो बेजोड़ भक्ति को टोड़कर घोर अपराध कर दिया है। समय, समाज, बाजार, और स्टेटस सिंबल ने भक्ति रस में भी सोमरस से लेकर कामुक ऋंगार रस तक को समावेश कर डाला। हमारी आस्था और विश्वास को बाजार में बेंच कर बाजारू रवैये के साथ यह उत्सव महोत्सव में तब्दील हो रहा है। सचाई तो यह है कि इन सबके बीच भी कहीं कहीं भूली बिसरी आध्यात्मिक आस्था की नैसर्गिक सुगंध नाक में आकर बसेरा डालती है तो लगता है कि हमारी नाक कहीं तो सुरक्षित है। वरना इन स्टेट्स सिंबल को माब लिंचिंग के जरिए आस्थाएँ भी मीटू कैंपेन में शामिल होने के लिए सोशल मीडिया में अपना एकाउंट बनाने के लिए जीरो फिगर मेंटेन किए हुए हैं।
पितृ पक्ष की शांति को बोझ मानते हुए गणेश उत्सव से छूटे पंडाल पर किसी का डेरा न हो, इसलिए पितृपक्ष को चुपचाप संसद में चलने वाले मौसमी सत्र में विपक्ष स्वरूप मानते हुए एड्वांस बुकिंग कर दी जाती है। बैठकी के पहले से ही चौराहों, सड़कों, और गलियों में नव दुर्गा समितियों के पंडालों का कद रावण के कद और उसके दंभ को और बढ़ा देता है। दुर्गा जी के विराजमान होते ही मोहल्ले के तथाकथित मजनूँ, टपोरी, और उचक्के किस्म के वो युवा जो फिलहाल पान की दुकान में सिगरेट के धुएं से छल्ले बनाने, बाइक की टू सीटर में चार लोगों का जुगाड़ बनाने वाले स्टंटबाज, और स्कूल से मेडिकल लीव लिए अतिसंस्कारित सपूत कपूत दिन रात चंदा एकट्ठा करने में एक कर देते हैं, इसके लिए मोहल्ले के नेता, पार्सद, मंत्री और स्वनाम धन्य लाल बत्ती वाले लक्ष्मी पुत्रों के नाड़े ढी़ले किए जाते हैं, पंड़ाल में वो लोग जरूर रात्रि जागरण करते हैं जिनकी रात्रि जागरण अन्य दिनों में चैटिंग और मोबाइल स्क्रीन में नीले चित्र देखने के आदी होते हैं। यहाँ से चोरी की विद्युत मंड़ल की बिजली लेकर उन्ही की छाती में मूंग दलते ये नव दुर्गा उत्सव समिति वालों का नौ दिन सारी अंगुलियाँ, उत्सव, भक्ति, ऐश्वर्य, वैभव, ऐश, और दिखावे से परिपूर्ण होती है, ये सभी हर शाम को मोहल्ले की स्त्रियों को भजन संध्या के लिए जरूर आमंत्रित करते हैं और इसी बहाने सेल्फी उत्सव और फेसबुक लाइव शो जारी रहता है, समय समय पर भक्ति संगीत के साथ साथ भक्ति नृत्य के नाम पर फैशन, मेकब, बाजार और स्टाइल को ओढ़ने वाले ये पल पूरी तरह से रहीशी का प्रदर्शन ही करते हैं। यहाँ वही लोग चुनरी ओढ़कर तथाकथित भक्ति का प्रदर्शन करते दिखते हैं जिनकी नज़रें सिर्फ चुनरी के पीछे कुछ झांकने में व्यस्त होती हैं, आदत से मजबूर जो गये हैं वो लोग।
इन्हीं नौ दिनों में कन्या भोज के नाम से मुहल्ले भर की बेटियों को बटोरने का उत्सव होता है। वो परिवार जिनके घरों में पढ़ने लिखने वाली नौनिहालों को साल भर रगड़ के काम कराया जाता है, कन्या भोज के दिन भी उनकी ड्यूटी सुबह से ही लग जाती है, क्योंकि वो कन्याएँ कन्या भोज की कन्याओं से अलग हैं अर्थात अछूत जो हैं, कन्याओं का परिवार की महिलाओं के द्वारा अपहरण करके जबजस्ती नौ कन्याओं की पूर्ति की जाती है, कुछ परिवार शारदेय नवरात्र में तो नौ से नौ सौ तक कन्याओं को भोजन करा कर खुद पीठ थपथपाते हैं किंतु चैत्र नवरात्र में वो ही सब कन्याओं को भोजन कराना तो दूर पूजा करना, उनको सम्मान देना भूल जातेहैं ना जाने कौन सा अजगर उन्हें सूँघ जाता है। कन्या भोज अब मात्र ट्रेंड बनकर रह गया है, जैसे एक भेंड दौड़ते हुए कुएँ में गिरती है तो पूरा का पूरा समूह देखा सीखी बंटाधार कर देता है।कन्याओं की अस्मिता पर नज़र रखने वाले वो सभी सफेदपोश इस अवसर में अपने दागों को छिपाने के लिए और दाग पर भक्ति का निरमा रगड़ने वाले यह पुण्य सरिता में अपना हाथ जरूर साफ करना चाहते हैं। लेकिन अफसोस इस अवसर पर भी इनकी लार टपकने और आंतरिक बारिश की पोल खोलने का मौका नहीं चूकती। महिलाओं से बेटियों तक इस समय सर्वपूज्य बनी होती हैं। कई लोग तो इस समय पर भी इन्हें हरामजादी,कुल्टा और कुलनाशिनी का सम्मान देकर विभूषित करने से बाज नहीं आ रहे हैं। ये सब मी टू कैंपेन से खार खाए और अपने नासूरों में खार लगाए बुद्धिजीवी लोग हैं। इनकी बुद्धिजीविता भी इस समय अपने सर्वश्रेष्ठ स्टेट्स सिंबल को बनाने में व्यस्त हैं। ये भूल गए हैं कि इनको पैदा करने वाली माँ, राखी बाँधने वाली बहन, इनके लिए अपना घर छोड़कर आने वाले पत्नी, और इनके घर को छोड़कर पराई होने वाली बेटी भी इसी श्रेणी में नहीं आती क्या?
महाराष्ट्र से चलने वाले गणपति उत्सव, गुजरात से चलने वाले गरबा रास और डाँडिया, बंगाल से चलने वाले नौ दुर्गा उत्सव चरण जब देश भर में फैल रहे हैं तो गरबा डांडिया उत्सव में भी पारंपरिक परिधान के साथ साथ वैभव पैर पसार रहा है, शादी के शुभ मुहुर्त के इंतजार में बैठे शादी के पैलेस, और शादीघर गणपति उत्सव से ही इनकी तैयारियों में व्यस्त भी हो जाते हैं और पस्त भी हो जाते हैं, नगर की खूबसूरती इन पंडालों में तो दिखती ही हैं बदसूरती भी मेकब के पीछे छिपी होती है, यह सूरती तन से लेकर मन तक फाउंडेशन, लिपिस्टिक, और फेश पैक के मुखौटे के पीछे नौ दिनों के लिए दुबक जाती है, भारी भरकम जाम के झाम को समेटे ये मनोरंजन के संसाधन अपने प्रसाधन तक का इंतजाम करने में असफल होते दिखते हैं, इस उत्सव में मेकब, ड्रेस, स्कूल, कालेज, हर समाज के युवा समिति के पदाधिकारीगण, और नेता नपाड़ी, फैक्ट्रियाँ तक इस महारास में अपनी अपनी आहुति देते नजर आती है, मीडिया पार्टनर के रूप में इस अवसर में अखबारो के डेहरी खनने पर आधुनिकता इन्हें विवश कर देती हैं। युवाओं से लेकर सुगर, बीपी, और जोड़ों के दर्द वाले बुजुर्ग भी अपने आप को जवान महसूस करने लगते हैं। यही जवानी की रवानी उनकी खुशियों का पुण्य स्थापित करती है।
दशहरा उत्सव में रावण वध और रामलीला तो रामलीला समाज की चिंता और शासन की चिंता के हवाले हो जाती है, रावण के कद को पुतले के कद के साथ बढ़ा दिया जाता है। इसको बढ़ाने में कारीगरों की पूरी फौज गड्डी गिनने में खुश होती है। राम हनुमान और लक्ष्मण का चरित्र रामलीला में मंचन करने वाले बेरोजगारी के चलते इस अवसर को हर वर्ष भोग कर आगे नौकरी की तलाश में बाहर निकल जाते हैं, पारंपरिक रूप से रावण मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों में बमों, और पटाखों के जरिए तेज आवाज के साथ उनका औपचारिक वध कर दिया जाता है। राम जानकी लक्ष्मण की विजय यात्रा निकाली जाती है। रावण मन ही मन अपने भाई और बेटों के साथ इस मानव प्रजाति को अनाब सनाब बोलता रह जाता है कि क्यों हर साल यह ढ़कोसला कर रहे हो नालायकों, तुम्हारी पीढियों में ही छुपे चरित्रहीन, मानव के रूप में राक्षस, मौजूद हैं, उन्हें तुम लोग पूज रहे हो और मेरे पुतले को जलाकर मेरी पांडित्य पूर्ण सलाह को पटाखों की प्रतिध्वनि में विलुप्त कर देते हो। अब तो ये मुखौटे निकाल लो सच्ची श्र्द्धा भक्ति से आस्था का निर्वहन करो, गुनहगारों को सजा दिलवाकर आज के रावण को मारो। स्टेटस सिंबल बनाने और इसे अपडेट करने से जिंदगी न चलेगी महामानवो के पीछे छिपे मुखौटाबाजों।
अनिल अयान,सतना  














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