व्यंग्य
लम्पटों के शहर में.....
वैसे तो हर शहर में लंपट लोग बसते हैं, किंतु मजा जीने का तब है जब लंपटॊं के शहर में हम बस रहे हों, पग पग में ऐसे लोगों के दर्शन हों, और सुबह सुबह से पूरा दिन बहुत बेहतर गुजरे, सुबह की दुआ सलाम की चासनी से सराबोर अभिनंदन मिले और उसके बाद दिन गुजरते गुजरते अपना काम निकलवाने वाले आपके घर चाय पीने आ धमकें, और स्थिति उस समय और आनंददायक हो जाती है जब ऐसे लोगों को चाय पिलाने के बाद हम मना भी न कर पायें अंत में मन मसोस कर फंसी गर्दन छुड़ाने के लिए काम करना पड़ जाये। जब शहर के अधिक्तर लोग दोस्तों की हमशक्ल में बैरी हो जाये तो जीने का आनंद बढ़ जाता है।
लंपटॊं की स्थिति यूँ होती है कि उनके दर्शन आपके पड़ोस में, दोस्तों के बीच, दुश्मनों के बीच, नात रिश्तेदारी में और तो और जाने अनजाने अनजान लोगों में भी मिल जाते हैं, ये लोग काटी अंगुरी मुतान नहीं होते। वैसे तो अनचाहे, अनजाने गले मिलेंगे पर यदि रत्ती भर का काम पड़ जाये तो मजाल है कि इनसे कोई काम निकल सके। इन लोगों के पास मुखौटे भी बहुत से होते हैं, हर पल मुखौटे ऐसे बदलते हैं कि गिरगिट भी इतना तेज रंग नहीं बदल पाता। बिन माँगे सलाह देने वाले और आपके निजी जिंदगी को सार्वजनिक करने वाले ये लंपट कपट के लब्बोंलुआब से सराबोर होते हैं। इन लोगों के अंदर मख्खनबाजी से लेकर चापलूसी का आवरण इनके चरित्र और व्यवहार को ढ़के होता है, ये हमेशा यही महसूस करवाते हैं कि इनसे बेहतर, नजदीकी, शुभचिंतक आपके जीवन में कोई भी नहीं, सब आपके दुश्मन ये आपके परम मित्र हैं।
एक बार काम निकल जाये तो ऐसे लोग आपके जीवन से अचानक लापता भी हो जाते हैं, जैसे विलुप्तप्राय होने का समय आ गया हो, और गाहे बगाहे यदि आप से इनका सामना हो भी जाए तो ऐसे प्रतिक्रिया देते हैं कि जैसे आपसे बड़ा छुतहा कोई न हो। उस समय सारी शुभचिंतकत्व और आकर्षण चुंबक के समान ध्रुवों की भाँति दूरी बनाने लगते हैं। वैसे तो हर शहर में ऐसे विशेष प्रजाति के मनुष्य पाए जाते हैं, किंतु कुछ शहर होते हैं कि जहाँ पर यह मात्रा बहुतायत हो जाती है। इस बहुतायत मात्रा के बीच अल्पमात्रा में निवास करने वाले ज्यादा ही ईमानदार लोग गच्चा खा जाते हैं, ऐसे लोग या तो हथिया लिये जाते हैं, या तो भगा दिये जाते हैं। क्योंकि जब काजल की कोठरी में सफेदपोशी वाला आदमी कदम रखता है तो सफेदी बचाने की असफल कोशिश ही करता रह जाता है।
लंपटी का गुण वैसे तो कोई अपनी अम्मा के गर्भ से सीखकर नहीं आता किंतु दुनिया के रस्मोंरिवाज को निभाने के लिए इस लंपटी में डिग्री और डाक्ट्रेट मिल ही जाती है। लंपट होना व्यक्तित्व का सबसे बड़ा सकारात्मक पहलू होता है, ठीक उसी तरह जैसे खोटा सिक्का कहीं नहीं चलता तो भीख देने के काम में चल ही जाता है। अर्थात उल्लू बनाने के लिए लंपट होना प्रथम शर्त है, इस शर्त को जो मान लेता है, वो दुनिया के किसी कोने में भी चला जाए उसे कोई ठग नहीं सकता, देखिये ठग और लंपट में ईमानदारी का अंतर होता है। ठग ठगी भी ईमानदारी से करता है किंतु लंपट लंपटी करने में ईमानदारी का लिवाज तो ओढ़े रहता है किंतु ईमानदारी का रत्ती भर उपयोग नहीं करता, कुल मिलाकर एक रुपये में तीन अठन्नी भंजाना हो तो ऐसे लोगों को अपने साथ रखना शातिर खिलाड़ियों की शतरंजी चाल होती है।
वैसे तो हर शहर में लंपट लोग बसते हैं, किंतु मजा जीने का तब है जब लंपटॊं के शहर में हम बस रहे हों, पग पग में ऐसे लोगों के दर्शन हों, और सुबह सुबह से पूरा दिन बहुत बेहतर गुजरे, सुबह की दुआ सलाम की चासनी से सराबोर अभिनंदन मिले और उसके बाद दिन गुजरते गुजरते अपना काम निकलवाने वाले आपके घर चाय पीने आ धमकें, और स्थिति उस समय और आनंददायक हो जाती है जब ऐसे लोगों को चाय पिलाने के बाद हम मना भी न कर पायें अंत में मन मसोस कर फंसी गर्दन छुड़ाने के लिए काम करना पड़ जाये। जब शहर के अधिक्तर लोग दोस्तों की हमशक्ल में बैरी हो जाये तो जीने का आनंद बढ़ जाता है।
लंपटॊं की स्थिति यूँ होती है कि उनके दर्शन आपके पड़ोस में, दोस्तों के बीच, दुश्मनों के बीच, नात रिश्तेदारी में और तो और जाने अनजाने अनजान लोगों में भी मिल जाते हैं, ये लोग काटी अंगुरी मुतान नहीं होते। वैसे तो अनचाहे, अनजाने गले मिलेंगे पर यदि रत्ती भर का काम पड़ जाये तो मजाल है कि इनसे कोई काम निकल सके। इन लोगों के पास मुखौटे भी बहुत से होते हैं, हर पल मुखौटे ऐसे बदलते हैं कि गिरगिट भी इतना तेज रंग नहीं बदल पाता। बिन माँगे सलाह देने वाले और आपके निजी जिंदगी को सार्वजनिक करने वाले ये लंपट कपट के लब्बोंलुआब से सराबोर होते हैं। इन लोगों के अंदर मख्खनबाजी से लेकर चापलूसी का आवरण इनके चरित्र और व्यवहार को ढ़के होता है, ये हमेशा यही महसूस करवाते हैं कि इनसे बेहतर, नजदीकी, शुभचिंतक आपके जीवन में कोई भी नहीं, सब आपके दुश्मन ये आपके परम मित्र हैं।
एक बार काम निकल जाये तो ऐसे लोग आपके जीवन से अचानक लापता भी हो जाते हैं, जैसे विलुप्तप्राय होने का समय आ गया हो, और गाहे बगाहे यदि आप से इनका सामना हो भी जाए तो ऐसे प्रतिक्रिया देते हैं कि जैसे आपसे बड़ा छुतहा कोई न हो। उस समय सारी शुभचिंतकत्व और आकर्षण चुंबक के समान ध्रुवों की भाँति दूरी बनाने लगते हैं। वैसे तो हर शहर में ऐसे विशेष प्रजाति के मनुष्य पाए जाते हैं, किंतु कुछ शहर होते हैं कि जहाँ पर यह मात्रा बहुतायत हो जाती है। इस बहुतायत मात्रा के बीच अल्पमात्रा में निवास करने वाले ज्यादा ही ईमानदार लोग गच्चा खा जाते हैं, ऐसे लोग या तो हथिया लिये जाते हैं, या तो भगा दिये जाते हैं। क्योंकि जब काजल की कोठरी में सफेदपोशी वाला आदमी कदम रखता है तो सफेदी बचाने की असफल कोशिश ही करता रह जाता है।
लंपटी का गुण वैसे तो कोई अपनी अम्मा के गर्भ से सीखकर नहीं आता किंतु दुनिया के रस्मोंरिवाज को निभाने के लिए इस लंपटी में डिग्री और डाक्ट्रेट मिल ही जाती है। लंपट होना व्यक्तित्व का सबसे बड़ा सकारात्मक पहलू होता है, ठीक उसी तरह जैसे खोटा सिक्का कहीं नहीं चलता तो भीख देने के काम में चल ही जाता है। अर्थात उल्लू बनाने के लिए लंपट होना प्रथम शर्त है, इस शर्त को जो मान लेता है, वो दुनिया के किसी कोने में भी चला जाए उसे कोई ठग नहीं सकता, देखिये ठग और लंपट में ईमानदारी का अंतर होता है। ठग ठगी भी ईमानदारी से करता है किंतु लंपट लंपटी करने में ईमानदारी का लिवाज तो ओढ़े रहता है किंतु ईमानदारी का रत्ती भर उपयोग नहीं करता, कुल मिलाकर एक रुपये में तीन अठन्नी भंजाना हो तो ऐसे लोगों को अपने साथ रखना शातिर खिलाड़ियों की शतरंजी चाल होती है।