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Sunday, 5 April 2020

हर बात में थू-थू करने की परंपरा


व्यंग्य आलेख

हर बात में थू-थू करने की परंपरा
अपना देश वैश्विक और जैविक महाआपदा की वजह से इक्कीस दिन के लॉक डाउन में अपने अपने घरों में आराम फरमाएगा, ऐसा पूरा देश सोचता है, शासन प्रशासन देश की जनता को ऐसा करने के लिए हर सुविधा मुहैया कर रहा है, ताकि हम खुद को एक दूसरे से सामाजिक और भौतिक रूप से अलग कर सकें और कोविड़ उन्नीस की संक्रमण चैन को अलग कर सकें, देश की जनता को हर तरह से आधात्म और मनोरंजन से जॊड़ने के लिए रामायण महाभारत, चाणक्य, शक्तिमान जैसे धारावाहिक दूरदर्शन मुफ्त में दिखा रहा है ताकि हम मानसिक रूप से विचलित ना हो जाएँ, अपने दैनिक उपयोग की सामग्रियों और अन्य सुविधाओं के लिए सरकार ने निशेधाज्ञा की घोषणा भी नहीं की ताकि हमें कोई दिक्कत ना हो, हमें आवश्यक काम से बाहर निकलने के लिए भी आजादी भी कुछ समय के लिए सरकार ने दे दिया, परन्तु हमारा खुराफाती दिमाग हर बात में कमी निकालने की आदत से बाज नहीं आ रहा है, हर बात में मीनमेख निकालने पर तुला है, हर बात पर थू-थू करके सरकार और शासन की व्यवस्थाओं की बेइज्जती करने पर हम तुले हुए हैं, इसका सबसे बेहतर माध्यम है सोशल मीडिया। कुछ भी होगा हम खुद के चेहरे को लाइव दिखाकर थू-थू करने लग जाएगें। जनता कर्फ्यू से आज तक का अवलोकन करने पर समझ में आता है कि शाबासी देने वाले लोग कम हैं और मुँह में थूकने वाले लोग ज्यादा ही हमारे देश में रहते हैं। आइये देखें जरा कैसे हमारे देश के ये बीमार देश की विभिन्न स्थितियों और निर्णयों में थू थू करने की परंपरा का निर्वहन किया। इसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष भी पीछे नहीं रहा।
      हमारा देश में कोरोना संक्रमण का खतरा जब महसूस हुआ तो, प्रारंभ से ही, सेनीटाइजेशन, हाथ धुलने, और मास्क लगाने की बात जब शासन से सभी तक पहुँचाई तो हम लोगों ने इस बात पर थू-थू किया कि लोगों को बच्चों वाली बाते अब सरकार से सीखना होगा, सरकार, खिलाड़ी, अभिनेता बताएगें कि हाथ कैसे धोना है, माननीय प्रधानमंत्री जी ने जनता कर्फ्यू लगाया और और शाम को पांच बजे शंख, थाली या घंटे बजाने का आह्वान किया ताकि हमारे कर्मवीर चिकित्सक, पुलिस, बिजली विभाग, सफाईकर्मी, के प्रति सम्मान दर्शाया जा सके, लोग उस पर भी थू-थू करने लगे, इस निर्णय के बाल की भी खाल निकालने लगे, कमिया बताने लगे और अंधविश्वासी का तमगा प्रधानमंत्री को सौंप दिये, एक दो दिन के बाद देश में लॉक डाउन की घोषणा इक्कीस दिन के लिए जब प्रधानमंत्री जी ने किया तो पूरा देश सकपका गया, कुछ बुद्धिजीवियों को इस बात का भान हो गया था किंतु अधिक्तर जनता सकते में आ गई, हमारे देश के दूसरे अनुशासन पर्व में अनुशासन की बलि चढ गई, इसकी वजह बेरोजगारी, भूख, परदेश की बेरहमी, और यातायात का बंद हो जाना था, सरकार ने बुद्धिजीवियों की तरह गरीबों पर भी आखिरकार इस तरह थू थू कर दिया, दिखाने के दाँत और खाने के दांत और वाली सरकार ने मजदूरों और पलायन करने वालों पर ऐसा थूका कि वो सैकडों किलोमीटर पैदल चलने को मजबूर हो गए, सरकार ने अपने निर्णय से इन बेसहारों पर थूका तो सोशल मीडिया में तथाकथित टुकडे-टुकड़े गैंग ने सरकार पर थू-थू किया। जल्दबाजी में थू-थू बढी तो सरकार ने इनके लिए कुछ रहमदिली दिखाई, उसमें भी सोशल मीडिया के कर्मवीर वीरता भरी थू-थू कर डाली।
      मरकज में मुस्लिम संप्रदाय का पूरा का पूरा कुनबा कोरोना संक्रमित पाया गया, मौलाना या अनुयाइयों तक जाने अनजाने ने देश भर में कोविड का संक्रमण फैलाया, डाक्टरों और नर्सों पर अश्लील हरकतें की, उनके मुंह में थूका, आइशोलेशन सेंटर में अपनी सभ्यता का परिचय नंगे होकर दिया, इसी समुदाय ने डाक्टर्स की टीम को दौड़ा दौड़ा कर पीटा, अब इससे बड़ी थू-थू दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार की भला क्या हो सकती थी, और तो और मीडिया को जिसे पहले से सिर्फ एक दूसरे पर थूकने और थूक कर चाटने की पुरातन बीमारी है उसने सरकार, मुस्लिम संप्रदाय, शासन प्रशासन की उन्हीं के साये में रहकर खूब थू थू किया। मै इस समुदाय पर थू-थू नहीं कर रहा, क्योंकि इसमें कई बहुत ही नेक दिल के लोग हैं जो अपने मित्र हैं, किंतु कुछ मुट्ठी भर लोगों की थू-थू ने पूरे संप्रदाय के सम्मान में काला धब्बा लगा दिया। जिनको जनता को जागरुक करने की जिम्मेवारी दी गई वो भी मौका परस्त होकर एक दूसरे के मुंह में सिर्फ थू-थू बस नहीं किए बल्कि थूकने से भी बाज नहीं आये, और तो और इस आपातकाल में जब हमारे कलाकार, साहित्यकार, खिलाड़ी, रंगमंचीय लोग, राजनेता, देश में समाजसेवा, दानवीरता का परिचय दे रहे हैं, और फोटो खिंचाकर पूरी दुनिया में अपने द्वारा किए कार्यों का प्रदर्शन कर रहे हैं,  पीएम केयर्स की जमा की गई धनराशि की रशीदों में लाइक और कमेंट्स बटॊर रहे हैं, उन्हें हम किस श्रेणी में रखें यह हम सब खुद निर्णय लें, ।
      जहाँ पर पूरा देश इस जंग में प्रधानमंत्री जी को अपना नेतृत्व मानकर उनकी बात पर रात में नौ बजे नौ मिनट के लिए लाइट बंदकर सम्मान के लिए दिए टार्च या मोबाइल की लाइट जलाकर आभार व्यक्त किया, कर्मवीरों के प्रति सम्मान व्यक्त किया, उस बीच कई लोग प्रधानमंत्री जी से भी आगे निकल कर पटाखे फोड़े, डीजे फ्लोर्स में नाचे गाए, चैत में दीवाली मनाये, यह भी उसी श्रेणी का कार्य किया गया। इस बीच बहुत से सोशल मीडिया के कर्मवीर जो दसवी पास थे वो विद्युत विभाग के अभियंताओं की भांति विद्वान बनकर आपस में तूतू-मैमैं और थू-थू करने में लगे रहे। थू-थू करने वाले लोग, या मुँह पर थूकने वाले लोग यह भूल जाते हैं कि इससे उनकी परंपरा का भी बोध होता है, समय कुसमय थूक कर चाटना इसी परंपरा का एक भाग रहा है। हम भारत के वासी हैं और हमें अपने विचार रखने का पूरा अधिकार संविधान ने दिया है, इस तथ्य को लेकर हमें यह भी अधिकार मिल जाता है कि हम अपनी विद्वता के आवेश में आकर एक दूसरे के मुंह में थू-थू करते रहें और इस तरह अपनी मूर्खता का परिचय देते रहें। ये तो कुछ उदाहरण है, जो मैने अपने ऊपर थू-थू करवाने के लिए आप सबके सामने रखे, लेकिन इस परंपरा से ही हमारा देश महान बन रहा है, विकासशील होने में हमारी थू-थू करने की परंपरा का भी बहुत योगदान है। जिस पर सभी को गाहे बगाहे गर्व कर लेना चाहिए।
अनिल अयान
९४७९४११४०७





Thursday, 19 March 2020

मूर्खिस्तान के मूर्खाधिराज अनिल अयान

मूर्खिस्तान के मूर्खाधिराज
अनिल अयान

विश्व में एक विशेष देश है, मूर्खिस्तान, वहाँ पर विश्वभर के मूर्ख निवास करते हैं, और मूर्खता करके मन ही मन प्रसन्न होने की मूर्खता करते हैं। यहाँ पर मूर्खों की सरकार मूर्खों के द्वारा और मूर्खों के विकास के लिए बनाई जाती है, मूर्खता के लिए देश में राष्ट्रीय मूर्ख पर्व का आयोजन हर वर्ष किया जाता है, उस दिन उस देश के मूर्खाधिराज और सारे मूर्ख नागरिक अपनी सर्वश्रेष्ठ मूर्खता का प्रदर्शन करते हैं, इस आयोजन में मूर्खता की सवश्रेष्ठ प्रस्तुति के लिए बनाए गए निर्णायक भी मूर्खों में सर्वश्रेष्ठ होते हैं, जीतने वाले को मूर्ख श्री, मूर्ख विभूषण, मूर्ख रत्न और मूर्ख भूषण की उपाधि दी जाती है। यहाँ के संविधान को निर्मित करने वाली सविंधान निर्माण समिति में भी देश के सर्वश्रेष्ठ मूर्खों का पैनल बनाया जाता है। इससे यह तो निश्चित होता है कि इस प्रकार के संविधान के किसी भी नियम को कोई भी मूर्ख नेता राज सभा में अपने स्वार्थ के लिए इस संविधान को मूर्खता का प्रदर्शन करके और बहुमत जुटाकर बदल सकता है।
इस मूर्खिस्तान में मूर्खाधिराज का चुनाव भी बड़े हे दिलचश्प अंदाज में होता है, पहले तो नागरिकों के बीच में मूर्ख नेता अपनी मूर्खतापूर्ण भाषणबाजी करता है, फिर मूर्ख नागरिक अपने मूर्ख नेता को कान मुरेर कर वोट देते हैं, चुनाव अधिकारी इन मूर्ख नेताओं से विभिन्न मूर्ख गवाहों के बीच में कान मुरेरने की संख्या पूछकर निश्चित करता है कि जिस मूर्ख नेता के सबसे ज्यादा कान मुरेरे जाते हैं उसे राज सभा में भेजा जाता है, विभिन्न प्रदेशों से आए मूर्ख प्रतिनिधि अपने मूर्खाधिराज बनाते हैं, जो प्रतिनिधि अपनी पीढ़ में सबसे ज्यादा घूंसे सह लेता है वो मंत्री बनता है, और जो सबसे देर तक मुर्गा बनकर अपनी मूर्खता की नुमाइस करता है वो मूर्खाधिराज बनता है। सबसे उम्रदराज मूर्ख राजनेता इस राज सभा का सभापति बनाया जाता है, जिसे सारे मूर्ख नेता प्रतिनिधि और मूर्खाधिराज मुर्गा बनकर सम्मान देते हैं। यहाँ पर मूर्खता को विश्व विख्यात करने वाले उत्पादों की फैक्ट्रियाँ, उद्योग, सर्विस सेक्टर, और शिक्षा के लिए विद्यालय महाविद्यालय और विश्वविद्यालय खोले गए, इन सब में सिर्फ मूर्खता को राष्ट्रीय लक्ष्य बनाकर, मूर्खता की सर्वश्रेष्ट विकास दर को प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयास किया जाता है।
मूर्खता के लिए देश में राष्ट्रीय मूर्ख पर्व का आयोजन हर वर्ष किया जाता है, इस में सब लोग एक दूसरे को मूर्ख बनाने की असफल कोशिश करते हैं क्योंकि मूर्खों को मूर्ख बनाने में सफलता प्राप्त करने वाला सबसे बड़ा पढा लिखा माना जाता है। जिसे मूर्ख नागरिक हसी का पात्र बना देते हैं इस लिए असफल कोशिश करने वाले सर्वश्रेष्ठ नागरिक को जीतने पर मूर्ख श्री, मूर्ख विभूषण, मूर्ख रत्न और मूर्ख भूषण की उपाधि दी जाती है। इस देश की न्याय प्रणाली में भी मूर्खाधीश बैठे होते हैं, जो मूर्ख नेताओं की सुनवाई करने में तो मिनट भी नहीं लगाते किंतु बहन बेटियों के ऊपर होने वाले अत्याचार, और किसानों मजदूरों पर होने वाले अपराधों में न्याय देने पर वर्षों तक विचार करने की सर्वश्रेष्ठ मूर्खता करने से बाज नहीं आते। इस देश में उल्लू बनाने पर आधारित विभिन्न फिल्मों का निर्माण किया जाता है। और सिनेमाघरों में नागरिकों को निःशुल्क दिखाया जाता है। यह भी एक राष्ट्रीय मूर्खतापूर्ण कर्तव्य ही है।
यहाँ के युवाओं को मूर्खाधिराज नौकरी नहीं देते, वो सोचते हैं कि कहीं होनहार युवा अपनी मूर्खता का परिचय देकर उनका पद ना हथिया लें, इसलिए उन्हें पकोड़े तलने और अच्छे दिन के शेखचिल्ली वाले स्वप्न लोक का भ्रमण करने का आदेश दे दिया जाता है। यहाँ के होनहार मूर्ख युवा दिन भर मोबाइल और सोशल मीडिया में अपनी मूर्खता के एक से एक प्रदर्शन करते हैं और लाइक तथा कमेंट से मंत्रमुग्ध रहते हैं, खाली समय में पकोड़े तलते हैं और मूर्खाधिराज का जयकारा लगाते हैं। मूर्खाधिराज इस बात पर खुश हैं कि पूरे विश्व से उनके देश में विभिन्न किस्म के मूर्ख आते हैं, पर्यटक स्थलों में जाते हैं, और मूर्खिस्तान की मूर्खता की ऐतिहासिक इमारतें देखते हैं, और इस तरह पूरे विश्व में प्रचार प्रसार करते हैं। इस देश में विद्वता, होशियारी, चालाकी, ज्ञानी होना राष्ट्रीय अपराध माने जाते हैं, इसके लिए मृत्युदंड ही एक मात्र सजा है, इस प्रकार के अपराधों के लिए कोई भी दया याचिका का प्रावधान नहीं है। मूर्खाधिराज ऐसे मामलों में अपराधियों को मुर्गा बनाकर बेइज्जत किया जाता है। इस देश में अन्य देश न कोई आतंकवाद फैलाते हैं, ना कोई कब्जा करते हैं, ना ही इनको अपना गुलाम बनाना चाहते हैं।
विश्व में विभिन्न देशों में मूर्खाधिराज के पुतले बनाए जाते हैं और पुतले के सामने मूर्खिस्तान के इस मूर्खाधिराज के मूर्खतापूर्ण शासन के किस्से स्वर्णाक्षरों से लिखे गए होते हैं। पूरा विश्व मूर्खिस्तान को विश्व का नौंवा अजूबा मानते हैं। विश्व के पूरी देश जहाँ अपनी बुद्धिमानी से देश को गतिशील बनाते हैं, देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करते हैं वहीं यह देश अपनी मूर्खता से देश को गतिशील बनाए हुए है। इससे बड़ी अचंभित करने वाली घटना विश्व में कभी कभी घटित होती है। इसलिए यह विश्व के लिए किसी अजूबे से कम नहीं है। विश्व भर के विश्वविद्यालयों के स्कालर्स इस देश में मूर्खता पर शोध करने आते हैं, और मूर्खता पर पीएचडी, डीलिट और डीएससी करके जाते हैं।  इस देश में मूर्खता, मूर्खता और मूर्खता का की वास है, पूरा विश्व इन्हें मूर्ख समझने की मूर्खता कर रहा है। परंतु ये अपनी मूर्खता को ही ईश्वर का सबसे बड़ा उपहार और वरदान मानते हैं। जहाँ पूरा विश्व आपसी मारामारी में और एक दूसरे की सुखशांति छीनने में संघर्षरत हैं, एक दूसरे के धर्म को नीचा दिखाने के लिए आपसी कलह का कारण बना है, वहाँ ऐसे मूर्खिस्तानों और मूर्खाधिराजों की मूर्खता पूरे विश्व के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं। हम सबको इनकी मूर्खता पर गर्व है। इनकी मूर्खता महान है, इस देश की शान है, और इसी शान पर पूरा विश्व कुर्बान है।

अनिल श्रीवास्तव "अयान"
श्रीराम गली, दीपशिखा स्कूल के पास
सतना म.प्र.
9479411407
ayaananil@gmail.com

Monday, 6 January 2020

युवाशक्ति, मीडिया और वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष्य

युवाशक्ति, मीडिया और वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष्य

पिछले कई सप्ताह से देश के हालातों को मद्देनज़र बहुत कुछ देखने को, समझने को, और समझकर किसी निर्णय तक पहुँचने के लिए अपने हलक और अल्फाज़ों को कागज में उतर कर आने से रोके रखा। यही सोचता रहा कि सत्तारूढ़ पार्टी कितना देश के उत्थान में योगदान दे रही है। कितने अच्छे ढ़ंग से संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की जा रही है। सरकारे कितना बेहतर ढ़ंग से देश को विकासपथ पर लिए जा रही हैं। वर्तमान सत्तारूढ़ सरकार उसके गृहमंत्रालय के कार्यों पर नज़र डालें और और केंद्रिया गृह मंत्री महोदय के वर्तमान भाषणों को सुने, और उसकी तुलना चुनावी रैलियों और चुनावी पोर्टफोलियों में उल्लेखित बातों करें तो समझ में आता है कि एक वृहद और डरावना आभामंड़ल बनाने की कोशिश की जा रही है। सी.ए.बी. सी.ए.ए, एन.आर.सी,एन.आर.ए. आदि आदि विषयों को इतनी तेजी से संसद में पास किया गया कि असम क्या पूरा देश इसके आवेश में आ गया। कुछ विश्व स्तरीय मसलों में सरकार ने बेहतर ढ़ंग से मोर्चा सम्हाला और उसको काफी हद तक सुलझा भी लिया था। किंतु देश में सरकार को जो काम दरवाजे दरवाजे जाकर इन नियम कायदों के पहले करना चाहिए था वो अब इन नियम कायदों को को लागू करने के बाद करना पड़ रहा है।
चुनावी रैलियों के वो जमीनी वायदे आज में दिलो दिमाग में घुमड़ रहे हैं जिसमें वर्तमान प्रधानमंत्री जी और गृहमंत्री जी माइक में जोर जोर से चिल्लाते थे। जिसमें अच्छे दिन, गुजरात माड़ल, दो करोड़ का हर वर्ष रोजगार, सस्ता पेट्रोल, सस्ता ड़ीजल,  सस्ती रसोई गैस, सबका साथ सबका विकास जैसे बुनियादी मुद्दों की बलि चढ़ाकर उस पर बात करने वालों को मुस्लिम धर्म का पैरोकार बनाने की शाजिस रची जा रही है। विगत दिनों सीएए और एन आर सी के लिए जिस तरह पूरे देश के औसतन विश्वविद्यालय और महाविद्यालयीन युवा सड़कों पर थे, जामिया, ए एमयू, डीयू, जेएनयू के छात्र विरोध कर रहे थे उस समय लग रहा था कि सत्तर के दशक में एमरजेंसी के समय का विरोध जिसमें वर्तमान सत्तारूढ़ दल के लोग अमूमन शामिल रहे होंगे, का रिपीट टेलीकास्ट चल रहा है। उस समय भी हमारे केंद्रीय मंत्री और प्रधानमंत्री यथोचित नियंत्रण युवा शक्ति को सही रास्ते में न ला सके। उच्च शिक्षा मंत्रालय, विधि मंत्रालय, दिल्ली की केंद्रशासित सरकार भी केंद्र के सामने विरोधी बन गए। इतना ही नही देश की बहुमत राज्यों की सरकारें केंद्र सरकार के विरोध में खड़ी हुई।
केद्र सरकार ने जिस समय राम मंदिर मुद्दा सुलझाया, जिस समय सीएए और एनआरसी प्रस्तुत किया, उस समय आवाम इसके बारे में अनभिज्ञ थी, सरकार ने मुसल्मान धर्म को अपने राजनैतिक कदम को हिस्सा बनाकर खतरा मोल ले लिया, लोकतांत्रित देश में इस खतरे का परिणाम उसे सीटें गंवाकर भुगतना पड़ा, चुनावी राज्यों को धर्म, युवाशक्ति, सोशल मीडिया की अंधेर गर्दी में झोंककर केंद्र सरकार जिस तरह शिक्षा के मंदिरों में गुंड़ागर्दी और जल रहे युवा और शिक्षा संस्थानों में मौनी बाबा बन जाना, साथ ही साथ पुलिस के पक्षपाती रवैये को मौन सहमति देना, आने वाले समय में इसके परिणामों को और बुरी तरह से देश और सरकार को भुगतना पड़ेगा। विगत दिनों जेएनयू में जो कुछ हो रहा है, वो सब जानते हैं कि किसकी शह में यह काम हो रहा है। इसके पीछे कुर्सी के राजनैतिक शक्ति के पुंज, केद्रीय सत्तारूढ़ सरकार, राज्य सरकार, और गृह मंत्रालय की असफलता कही जा सकती है, मै यह जानता हूँ कि विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय आयोग की शक्तियों के आगे छात्र संगढ़नों की हुड़दंगी, आगजनी, मारापीटी बौनी है, गृहमंत्रालय के अधिकार इन सब संगढ़नों और उपद्रवियों को ठिकाने लगाने के लिए उपयोग आने चाहिए थे परन्तु, शासन के पहले मीडिया उस मुद्दे को भी वाम दक्षिण पंथ, युवाशक्ति का बंटवारा और आग में घी डालने का काम करना, सोशल मीडिया, को राजनैतिक ट्रालिंग के लिए उपयोग करना, देश की संबंधित राज्य सरकार, केंद्र सरकार की गृहमंत्रालय की असफलता को दर्शाता है।
वर्तमान परिवेश में छात्र संगढ़न और राजनैतिक संगढ़न जिस तरह से उग्र हो रहे हैं, और शिक्षा के मंदिर को युद्ध का मैदान बनाने की कोशिश की जा रही है, विरोध को राष्ट्रद्रोह का रूप दिया जा रहा है, सरकारों का मौन समर्थन देश के वर्तमान परिवेश को गृहयुद्ध, सिविल वार की ओर ले जाने की पहल है, केंद्र सरकार खुले आम हिंदू और मुस्लिम धर्म के आधार पर नागरिकता का प्रचार करना, देश की युवा शक्ति को खौला रहा है, युवाशक्ति को युवाओं की संख्या को राजनैतिक स्वार्थों के लिए राजनैतिक दलों के द्वारा इस्तेमाल करना भी देश की स्थिति के लिए घातक है। मुख्य मुद्दों से भटकना, धर्म आधारित राजनीति करना, संवैधानिक अभिव्यक्ति और विरोध, विपक्ष के अधिकार को कैद करके धाक जमाना, देश को लोकतांत्रित व्यवस्था से मोड़कर एकध्रुवीय सत्तात्मक व्यवस्था की ओर मोड़ रहा है, सरकार जब वैचारिक रूप से युवा और विरोधी दलों विपक्ष और शिक्षा संस्थानों को संतुष्ट करने में उनको इसके लाभ के बारे में असफर रही तब वह धमकी नुमा आवेशित व्यवहार कर रही है, अथवा तथाकथित रूप से करवा रही है, जो आने वाले समय के लिए कार्यकाल पूरा होने के बाद सत्तारूढ़ दल के लिए मुश्किलें खड़ा कर सकती हैं।
आज के समय में सत्तारूढ़ सरकार, और राजनैतिक दल युवाओं की शक्ति को देशविरोधी बनाने का प्रयास कर रही हैं, सत्ता विरोधी विरोध को देश विरोधी बनाने की कोशिश की जा रही है, सरकार के साथ साथ  उसके मंत्रालय, अनुशांगिक संगढ़न भी देश को जलाने के उतावले हैं। मीडिया ने नीर छीर विवेक से जनता को जागरुक बनाने की बजाय बिकी हुई पत्रकारिता करना शुरू कर दिया है। सरकार के निर्णयों को जनता के हित में कैसे संवैधानिक उत्थान के लिए कैसे प्रस्तुत करना है यह भूला जा चुका है। सोशल मीडिया, युवा संगढ़नों, शिक्षा के संस्थानों को भी धार्मिक सीमा रेखा की जंजीर से सरकार ने तौलना शुरू कर दिया है। इस तरह से संकीर्ण घटनाएँ, रोष, आक्रोश, वैचारिक प्रतिद्वंदिता को सुलह तक पहुँचाने की बजाय उसमें रायता फैलाया जा रहा है, देश की आंतरिक स्थिति शीत युद्ध में बदलती जा रही है। यदि जिद्दीपन वाले रवैये को छोड़कर  व्यवहारिक रूप से शांति व्वस्था के लिए पहल करने की आवश्यकता, सरकार के द्वारा लिये गए निर्णयों के प्रति नागरिकों की जागरुकता पर ध्यान देने की आवश्यकता, समस्त राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के प्रति केद्र की जिम्मेवारी को पुर्नचिंतन करना होगा। हिटलरशाही सोच, एक ही सोटे से अनपड़, कम पढ़ेलिखे, ज्यादा पढ़े लिखे,और बुद्धिजीवी वर्ग को हांकने से परहेज करना ही देश के हित में है। युवाशक्ति को मानव संसाधन के रूप में देश हित में मजबूत करना होगा, ना कि राजनैतिक हित में उनको कोयले की तरह आग में झोकें। यदि हम आज अपने देश के युवाओं को अपने निर्णयों के पक्ष में नहीं खड़ा कर सकते तो आने वाले समय में वो आपकी सरकार की देश के विकास में उपयोगिता को नहीं समझेंगें।
अनिल अयान
सतना