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Sunday, 8 August 2021

लम्पटों के शहर में.....

 व्यंग्य

लम्पटों के शहर में.....

वैसे तो हर शहर में लंपट लोग बसते हैं, किंतु मजा जीने का तब है जब लंपटॊं के शहर में हम बस रहे हों, पग पग में ऐसे लोगों के दर्शन हों, और सुबह सुबह से पूरा दिन बहुत बेहतर गुजरे, सुबह की दुआ सलाम की चासनी से सराबोर अभिनंदन मिले और उसके बाद दिन गुजरते गुजरते अपना काम निकलवाने वाले आपके घर चाय पीने आ धमकें, और स्थिति उस समय और आनंददायक हो जाती है जब ऐसे लोगों को चाय पिलाने के बाद हम मना भी न कर पायें अंत में मन मसोस कर फंसी गर्दन छुड़ाने के लिए काम करना पड़ जाये। जब शहर के अधिक्तर लोग दोस्तों की हमशक्ल में बैरी हो जाये तो जीने का आनंद बढ़ जाता है।
लंपटॊं की स्थिति यूँ होती है कि उनके दर्शन आपके पड़ोस में, दोस्तों के बीच, दुश्मनों के बीच, नात रिश्तेदारी में और तो और जाने अनजाने अनजान लोगों में भी मिल जाते हैं, ये लोग काटी अंगुरी मुतान नहीं होते। वैसे तो अनचाहे, अनजाने गले मिलेंगे पर यदि रत्ती भर का काम पड़ जाये तो मजाल है कि इनसे कोई काम निकल सके। इन लोगों के पास मुखौटे भी बहुत से होते हैं, हर पल मुखौटे ऐसे बदलते हैं कि गिरगिट भी इतना तेज रंग नहीं बदल पाता। बिन माँगे सलाह देने वाले और आपके निजी जिंदगी को सार्वजनिक करने वाले ये लंपट कपट के लब्बोंलुआब से सराबोर होते हैं। इन लोगों के अंदर मख्खनबाजी से लेकर चापलूसी का आवरण इनके चरित्र और व्यवहार को ढ़के होता है, ये हमेशा यही महसूस करवाते हैं कि इनसे बेहतर, नजदीकी, शुभचिंतक आपके जीवन में कोई भी नहीं, सब आपके दुश्मन ये आपके परम मित्र हैं।
एक बार काम निकल जाये तो ऐसे लोग आपके जीवन से अचानक लापता भी हो जाते हैं, जैसे विलुप्तप्राय होने का समय आ गया हो, और गाहे बगाहे यदि आप से इनका सामना हो भी जाए तो ऐसे प्रतिक्रिया देते हैं कि जैसे आपसे बड़ा छुतहा कोई न हो। उस समय सारी शुभचिंतकत्व और आकर्षण चुंबक के समान ध्रुवों की भाँति दूरी बनाने लगते हैं। वैसे तो हर शहर में ऐसे विशेष प्रजाति के मनुष्य पाए जाते हैं, किंतु कुछ शहर होते हैं कि जहाँ पर यह मात्रा बहुतायत हो जाती है। इस बहुतायत मात्रा के बीच अल्पमात्रा में निवास करने वाले ज्यादा ही ईमानदार लोग गच्चा खा जाते हैं, ऐसे लोग या तो हथिया लिये जाते हैं, या तो भगा दिये जाते हैं। क्योंकि जब काजल की कोठरी में सफेदपोशी वाला आदमी कदम रखता है तो सफेदी बचाने की असफल कोशिश ही करता रह जाता है।
लंपटी का गुण वैसे तो कोई अपनी अम्मा के गर्भ से सीखकर नहीं आता किंतु दुनिया के रस्मोंरिवाज को निभाने के लिए इस लंपटी में डिग्री और डाक्ट्रेट मिल ही जाती है। लंपट होना व्यक्तित्व का सबसे बड़ा सकारात्मक पहलू होता है, ठीक उसी तरह जैसे खोटा सिक्का कहीं नहीं चलता तो भीख देने के काम में चल ही जाता है। अर्थात उल्लू बनाने के लिए लंपट होना प्रथम शर्त है, इस शर्त को जो मान लेता है, वो दुनिया के किसी कोने में भी चला जाए उसे कोई ठग नहीं सकता, देखिये ठग और लंपट में ईमानदारी का अंतर होता है। ठग ठगी भी ईमानदारी से करता है किंतु लंपट लंपटी करने में ईमानदारी का लिवाज तो ओढ़े रहता है किंतु ईमानदारी का रत्ती भर उपयोग नहीं करता, कुल मिलाकर एक रुपये में तीन अठन्नी भंजाना हो तो ऐसे लोगों को अपने साथ रखना शातिर खिलाड़ियों की शतरंजी चाल होती है।

Saturday, 31 July 2021

सावन में मोहल्लों का सौंदर्यदर्शन

 सावन में मोहल्लों का सौंदर्यदर्शन


सावन भादौं आया नहीं की प्रकृति के सौंदर्य की भाँति नगरों और मोहल्लों के सौंदर्य का भी स्तर बढ़ जाता है। इस सौदर्य के लिए शासन प्रशासन के साथ साथ वहाँ के रहवासी विशेष उत्तरदायी होते हैं, मोहल्लों में सिर्फ झुग्गी झोपडियों की बस्तियाँ ही बस नहीं आतीं बल्कि पाश कालोनियों का सौंदर्य विशेष महत्व रखता हों, झुग्गी झोपडियों में तो वर्ष भर सौदर्य बना ही रहता है किंतु बहुमंजिली इमारतों वाली कालोनियों के सौंदर्य में विशेष वृद्धि वहाँ की सड़कें और नालियाँ करती हैं, या यह कहें कि नालियों से उन स्थानों का सौंदर्य और तीव्र हो जाता है, हल्की फुल्की बारिस की फुहारों का तो आनंद ही कुछ और होता है, किंतु जब नगर निगम के प्री मेंटीनेश सेशन के बाद दौंगरा पड़ता है और तीन चार घंटें इंद्र देव प्रसन्न मुद्रा में नृत्य करते हैं तो बादल इस सौंदर्य की वॄद्धि करने के लिए उतावले हो जाते हैं।

इस समय तो बादल धरती से मिलने के लिये इतनी घनघोर बारिस करते हैं, कि नदियाँ नाले अंगड़ाई लेते हुए उफान मारने लगते हैं, तो इन मोहल्लों की नालियों की क्या बिसात, इन नालियों में फिर पानी समाता नहीं है, नगर निगम के कर्मचारी जितनी मेहनत रोज नालियों का कचरा साफ करने के लिए करते हैं, उससे कम मेहनत में यह पानी नालियों का मलवा निकाल कर रख देता है, साथ ही सफाई व्यवस्था की पोल खोल देता है, इस तरह इस पानी से साथ मोहल्लों में मलवों की लीपा पोती हो जाती है, सड़कें तो सड़कें लोगों के घरों के कमरे भी इस सौंदर्य का आनंद उठाते हैं, कई कालोनियों तो सावन के मौसम में कई कई दिन तक इसकी सुगंध से सराबोर होती हैं, इस समय नगर निगम के सफाई दस्ते के लोग, गुमतियों में चाय गुटखा समोसा भजिया का आनंद ले रहे होते हैं। सावन में बारिस के मौसम में लोग गाड़ी वाले का इंतजार कचड़ा निकाल कर किये रहते हैं लेकिन गाड़ी वाला चार चार दिन तक दर्शन नहीं देता ठीक उसी तरह जैसे बादलों के कारण सूरज के दर्शन नहीं होते। इन मोहल्लों के बच्चे नालियों के पानी में खाले भरे स्थानों के जल भराव के कारण मेढ़कों की टर्र टर्र का खूब आनंद लेते हैं, और शाम समय इसी गंदे पानी से अपना खेल खेलकर मनोरंजन करते हैं। जब ज्यादा बारिस होती है तो सड़कें और नालियाँ पानी में जलमग्न हो जाती हैं, जैसे समुद्र में जहाज जलमग्न हो जाते हैं। इस तरह बहुत से लोगों के कपड़ों में छीटों की बारिस होती है, चलने वालों के साथ वाहन चलाने वाले भी इस दुर्दशा पर सौंदर्य की दुहाई देते हैं।

इस तरह का सौंदर्य मोहल्लों, निचले इलाकों में कई बार आता है, मानसून आने के पहले जितना फंड मेंटीनेंश में आता है, वो इसी तरह की साफ सफाई और व्यवस्था दुरुस्त करने में लग जाता है, सावन भादौं में मोहल्ले और इससे जुड़ी नालियाँ इस सौंदर्य का प्रदर्शन करती हैं, कितने ही वाहन और घर हर वर्ष अपने मालिकों के मरम्मत तो करवाते हैं पर शासन के तरीके से नहीं। सावन भादौं का अपना अपना विवरण होता है किंतु अव्यवस्थाओं से यह विवरण और चरम सीमा पर पहुँचता है। सरकार कहती है कि इस सौंदर्यशास्त्र के लिए रहवासी शाबासी के पात्र हैं और रहवासी कहते हैं कि इसके लिए प्रशासन और सरकार पीठ ठोकवाने के लिए उत्तरदायी इस तरह से दोनों एक दूसरे की पीठ थपथपाकर मन को आनंदित करते रहते हैं। मेरे मोहल्ले में भी कुछ इससे बेहतर सौंदर्य बिखरा हुआ है। मै भी किसी की पीठ थपथपाना चाहता हूँ और ईशवर से यही मनाता हूँ, कि मानसून में प्रकृति के सौंदर्य की तरह मोहल्लों का सौंदर्य भी दिन दूना और रात चौगुना बढ़े ताकि हमारा मुहल्ला भी पेपरों की मेन हेडिंग बना रहे। धन्य हो इंद्र देव आपने आने पर मोहल्ले इतना अच्छा सजते संवरते हैं कि मन आनंद से भर उठता है। ईशवर करे आप ऐसे ही नालियों और मोहल्लों का सौंदर्य बढ़ा कर हमें कृतार्थ करते रहें और धन धान्य से शासन प्रशासन को फलीभूत करते रहें।


अनिल अयान