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Thursday, 28 September 2017

प्यारा सजा है तेरा दरबार भवानी

व्यंग्य
प्यारा सजा है तेरा दरबार भवानी
 न जाने क्यों नवरात्रि से मुझे शिकायत रहती  है।  शारदेय नवरात्रि में माता रानी का दरबार तो बहुत शानदार सजता है। जब मै इस शिकायत के समाधान के लिये प्रयास किया तो समझ में आया कि जरूर शारदेय नवरात्रि में ही इतना भव्य दर्शन देखने को मिलता है। चैत्र नवरात्रि में भक्तों के यहाँ सूखा पड़ जाता होगा। जब अखबारों में सुनता हूं कि १० करोड का पंडाल बना। २० करोड का पंडाल बना । लाखों के हीरे जवाहरातों क चढावा चढाया गया। तब मन को संतोष हो जाता है कि चंदा उगाही का काम तन्मयता के साथ युवा साथी कर रहे हैं। और लोगों का काला धन सही दिशा में लग रहा है। किंतु नोटबंदी के बाद इस बात की उम्मीद तो नहीं थी को करोडों का माल इस तरह के धार्मिक आयोजनों में लगाया जाएगा। किंतु चलों को काम हमारे प्रधानमंत्री जी इतनी मसक्क्त के बाद किये वो इन चंदा उगाही समूह के युवाओं ने कुछ सप्ताह की मेहनत के साथ कर दिये। उन्हें तो देश का सर्वोच्च पुरुस्कार मिलना चाहिये। देखो भाई धन जेब से निकालना बहुत कठिन काम है। ना सही रिजर्व बैंक में धर्म आधात्म में ही सदुपयोग हो। काश चैत्र नवरात्रि में भी इतना जलवा माता रानी का होता तो मजा आ जाता।
पंडालों की सुंदरता को सबसे ज्यादा चार चांद लगाने का काम बिजली विभाग के जिम्मे रहता है। इन नौ दिनों में करोडों की बिजली पानी की तरह फुंक जाती है और बिजली विभाग कागजों में खाना पूर्ति करता रह जाता है। कोई कुछ कह नहीं सकता क्योंकि माता रानी के दरबार में बिजली वालों का भी तो सहयोग जुडेगा। पुण्य प्राप्त करने के लिए इतना तो करना ही पडेगा। ट्रैफिक वाले इस समय चालान नहीं काट पाते हैं। बाइक तो दो जाओ तीन जाओ या चार भी चले जाओ। पार्किंग कहीं भी कर दो कोई पूंछने वाला नहीं है। आधे से अधिक व्यवस्थाए तो पंडाल या नवदुर्गा उत्सव समिति के युवा दबंग कार्यकर्ता ही कर डालते है। ट्रैफिक वाले आराम से पंडालों का प्रसाद ग्रहण करके माता रानी से दुआएं मांगते हैं कि वर्ष भर ऐसे की चार चांद लगा दे मैया।
जागरण और कवि सम्मेलन तो इस समय चरम में होते हैं। माता रानी के पंडाल के नीचे रात भर के लिए गायक पहले से बुकिंग में चले जाते हैं। एक प्री रिकार्डेड कैसेट जैसे हर जगराते और आर्केस्ट्रा में वही तीन घंटे का एपीसोड होता है। अरे भाई पब्लिक तो नई होती है। मंच नया होता है। भले ही वही गाने बार बार दोहराते रहो और माता रानी के जयकारे लगवाते रहो। इस प्रकार के माहौल में कवि सम्मेलन में मातारानी की भक्ति कम और पाकिस्तान को गाली देकर वीर रस, द्विअर्थी चुट्कुलों से माताओं बहनों को मंत्रमुग्ध करने का प्रयास, श्रंगार के गीतों से कुछ प्रेमी जोडों के मन को शरद की ठंडक देने का प्रयास किया जाता है। इसी बहाने नवदुर्गा उत्सव समिति के लोगों के द्वारा मुख्य अतिथि के रूप में पावर वाले को बुलाकर अगले साल की दान राशि पर मोहर लगवा लिया जाता है। नवरात्रि में अराधना के स्वरों की बजाय मनोरंजन और जन रंजन के स्वरों से गुदगुदाया जाता है।
इस समय तो लक्ष्मी घर आए या ना आए। माता रानी के नौ रूप के दर्शन हों या ना हों किंतु कई रूपों में कीडे मकोडे बिजली विभाग की मुफ्त की लाइटों के सामने चक्कर उसी तरह लगाते हैं जैसे गरबा रास डांडिया में प्रतिभागियों के चाहने वाले ब्वाय और गर्लफ्रेंड देर रात तक व्यस्त रहते हैं और चक्कर लगाते हैं। इसी शारदेय नवरात्र में मीडिया पार्टनर खोज कर अधिक्तर युवा क्लब, युवा मंडल, और युवा सेना विभिन्न समाजों के व्यवसाइयों से दमदार चंदा उगाहते हैं और अपना जलवा बिखेरते हैं। किसी ना किसी समाचार पत्र की कृपा से इस तरह के आयोजन युवाओं की सुंदरता, प्रेम, उत्साह, व्यवसाइयों का प्रचार, और अधिकारियों की मैडमों को अपने पतियों के जलवों को देखने इच्छा परवान चढती है।
चैत्र और शारदेय नवरात्र में बेटियों अर्थात कन्याओं को पूंछ बढ जाती है। पूरा शहर कन्याओं को ढूंढ कर भोज करवाता है। ऐसा लगता है कि शतयुग की वापसी हो चुकी है। कन्याओं के जीवन के अंतर को इन अवसरों और अन्य दिनों में देखा जा सकता है।माता पिता के व्यवहार में भी अंतर नवरात्रि की विशेषता होती है मित्रों। पुलिस वालों और अन्य सुरक्षा एजेंसियों की मरन इसी समय होती है। भक्तगणों के उत्साह, दबंगई, पावर वालों का पावर, सब कुछ उन बेचारों को झेलना पडता है। नौ दिन ऐसा महसूस होता है कि इनके लिए नौ दिन बनवास सौंप दिया जाता है। इनके परिवार वाले इनको मन ही मन बहुत कोसते हैं। शायद यही इनकी नियति होती है। मातारानी की कृपा इन पर क्यों नहीं बरसती यह विचार करता हूं। चैत्र नवरात्रि में नौ दिन तो ऐसे सूखा ग्रस्त होते हैं जैसे उनको भोजन पानी नहीं मिलता हो। या फिर भक्त गण क्लोजिंग और अन्य काम धंधो में ज्यादा व्यस्त हो जाते है।
रावण को जलाने के लिए तो इस नवरात्रि में कुछ ज्यादा ही उत्साह देखने को मिलता है। गाहे बगाहे रावण को कई जिले अपना जमाई मान कर पूजते हैं और अधिक्तर रामलीलाओं के आधुनिक आयोजनों की समाप्ति रावण वध और दहन के साथ होता है। इस तरह की रामलीलाओं को भी आधुनिकतम डिजिटल इंडिया से ओत प्रोत कर दिया गया है। रावण के कद को क्रेन लगा कर बढाया जाता है। राम को अभी भी मानव माना जाता है। भले ही साल भर वह पात्र कुछ भी करता रहे।इस तरह से रावण दहन से बाद से माता रानी विसर्जन और उठावना प्रारंभ होता है। माता रानी शारदेय से चैत्र के सूखाग्रस्त माहौल में जाने के लिए विवश हो जाती हैं। जहां पर रौनक को ग्रहण लग जाता है। जहाँ पर उत्साह ठंडा हो जाता है। जहाँ पर डांडिया और गरबा रास अपना पसीना पोंछता नजर आता है। जहाँ पर न जगराते होते हैं और ना ही जागरण होते हैं। कैसी रीति का पालन हो रहा है माता रानी के स्वागत में क्या इसमें शारदेय नवरात्र को आरक्षित कर दिया गया है।

अनिल अयान सतना

Sunday, 6 August 2017

लो आगया देश भक्ति की सीजन


व्यंग्य
लो आगया देश भक्ति की सीजन
-अनिल अयान
हमारे यहां त्योहार का मतलब है फकत छुट्टी का दिन। आज कल के एडवांस बच्चे तो महापुरुषों, नेताओं, और राजनीतिज्ञों में भी छुट्टियां खोज लेते हैं। वो तो समाचार में देखते रहते हैं कि कौन सा बुजुर्ग टपके और हमारी एक दिन की छुट्टी कन्फर्म। अगर यह मामला राष्ट्रीय त्योहार या राष्ट्रीय पर्व का हो तो बच्चों के पर तो सातवें आसमान में पहुंच जाते हैं। भाई अब उन्हें छुट्टी का बडा पैक मिल जाता है। गांधी जयंती, पंद्रह अगस्त , छब्बीस जनवरी की छुट्टी तो बच्चों को पहले से याद रहती है आखिर ये निश्चित जो होती है। सरकारी स्कूल के और कुकुरमुत्ता स्कूल के बच्चों को तो यह भी नहीं पता होता कि पंद्रह अगस्त को स्वतंत्रता दिवस है या छब्बीस जनवरी को। उन्हें तो फकत मजे करने से मतलब। इस समय कलेक्टर साहब तो पंद्रह अगस्त के अगले दिन भी छुट्टी दे देते हैं। यह समाचार तो बच्चों में और ज्यादा खलबली मचा देते हैं। कई बच्चे तो इतने चालाक होते हैं कि उन्हें ना स्कूल जाना और ना ही परेड ग्राउंड जाना बस बहाने मारने की शिक्षा पैदा होते ही मिल जाती है। ये बच्चें निश्चित ही पिछले जनम के भगोडे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे होगें।
आजकल के यूथ तो इस दिन देशभक्ति का फेम मानते हैं। फेसबुक की प्रोफाइल पिक्चर हो या व्हाट्स ऐप की डिस्प्ले पिक्चर या फिर इस्टाग्राम की डीपी दो तीन दिन पहले से लेकर दो तीन दिन बाद तक यह देशभक्ति चलती है। हां यह देश भक्ति की उस समय पोल जरूर खुल जाती है जब इनको राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान के बीच में बहुत सा डाउट होता है। या लाल बाल पाल जैसे उपनामों के नाम याद नहीं होते। इन्हें सारी देश भक्ति सिर्फ फारवर्डेड पोस्ट, फोटो और चुटकुलों में ही नजर आती है। पंद्रह अगस्त के दिन ये लोग तिरंगे के साथ या तिरंगे को हाथ में लेकर सेल्फी तो बाकायदे खींच कर लाइक और कमेंट का दंभ भरते हैं पर उसके कुछ मिनटों के बाद ही राह चलते जमीन पडे तिरंगे को उठाने में इन्हें परहेज होता है। राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के गाने को देखकर गाने में शर्म आती है और तो और इन गीतों के सम्मान में खडा होना तो इनके लिये बहुत बडी इंसल्ट का विषय होता है। यह आलम बाजार से शुरू होता है और बाजार पर जाकर खत्म हो जाता है। चाहे वो नेटवर्किंग साइट का हो या फिर टीवी चैनलों का सब जगह यही रवैया देखने को मिलता है। स्वतंत्रता का सही मजा तो काश्मीर के वो बरगलाये युवा ले रहे हैं। जो पाकिस्तान और आईएस आईएस के झंडे लेकर, या फिर सेना के ऊपर पत्थर बाजी करके पंद्रह अगस्त मनाते हैं। हमारा देश उनकी स्वतंत्रता का सही अर्थों में कर्जदार हैं।
बाजार की बात आई तो याद आया कि बाजार तो अगस्त माह में गिरगिट की तरह रंग बदलता है। कभी राखी का प्रचार प्रसार करता है तो कभी तिरंगें रंग में रंगे रिबन, मोजे, टोपियां, झंडे, स्टीकर, और मुखौटे बेंचता नजर आता है कभी फ्रेंडशिप के नाम पर बैंड्स कार्डस गिफ्ट बेंचता नजर आता है। यह बाजार भी अजब है अपने देश का सामान बेंच नहीं सकता क्योंकि वो बहुत मंहगा होता है तो इंपोर्टेड और मेड इन चाइना मटेरियल सरे आम बेंचता है। हमारा समाज उसे बाकायदे खरीदता भी है क्योंकि इसका कोई विकल्प नहीं है वो कम पैसे में अपनी सुविधाएं देखता है। भले ही  दुनिया भर में इसका विरोध वो करता रहे। एक दुकान वाले से मैने पूंछा कि यह क्या मामला है भाई। तो उसने हंसते हुये जवाब दिया आप तो सब जानते हो साहब यह मार्केट है यहां पर मौसम की तरह सब बदल जाता है। बूढा भी जवान की तरह बिक जाता है। हम तो फिलहाल सामान बेंच रहे हैं। मैने उसका जवाब सुनकर अपना माथा पीट लिया। कुल मिलाकर बाजार आज के त्योहारों का माईबाप , माईलार्ड और आका है। बाजार ही समाज में देश भक्ति का सीजन लाता है और समय के साथ इस सीजन को पैक भी कर लेता है। सारे देश को देशभक्ति की शिक्षा देने वाला बाजार ही हो है।
हमें तो अपने स्कूल के दिन आजाते हैं जिसमें हम सुबह से मोहल्ले से फूल चुराकर फूल मालायें बनाकर स्कूल में ले जाते थे। स्कूल में सब सुबह से ही सफेद बुशर्ट और सफेद पैंट पहन कर पीटी करते। देशभक्ति गीत ऐ मेरे वतन के लोगों, ऐ मालिक तेरे बंदे हम, मेरे देश की धरती , ऐ मेरे प्यारे वतन जैसे देश भक्तिगीतों को सुनकर मन को देशभक्ति से भर लेते थे। स्कूल से जाते जाते लाई और रेवडी दाना या फिर लड्डू और नमकीन लेना भी नहीं भूलते थे। अब तो इस सीजन में भी ग्लोबल वार्मिंग का जमाना आगया है। इन गानों के रिमिक्स तेज गाने आ गये। सब में पंद्रह अगस्त का वो जज्बा कम हो गया। प्रसाद की जगह चाकलेट और समोसों ने ले लिया। भारत माता अपने देश में विवादित हो गई। देश भक्ति जज्बे की बजाय राजनीति का हिस्सा बन गई। राष्ट्रभक्त होने के मायने और परिभाषायें अब देश की राजनैतिक पार्टियां तय करने लगीं। हम बेचारे सिर्फ अपनी मन की आस्था और विश्वास लिये अंतस को कचोटते रह गये। बस इसी बात से संतोष कर लेता हूं कि चलो अब अपनी स्वतंत्रता भी बुढा गयी सठिया कर सत्तर वर्ष की हो गई। यह भी संकरित हो गई। गुलामी - आजादी का मिक्चर जिसे हर रोज अधिक उत्पादक फसल के रूप में हर साल बोया जाता है।बोइनी की जाती है। ताकी देशभक्ति की फसल लहलहाये और भारत माता का दामन हरा भरा बना रहे। यह फसल खरपतवार हो या अनाज इसकी फिक्र कहां है हमारे देश के झंडावरदारों कों। आप सबको भी इस सीजन की संकरित सत्तरवां पंद्रह अगस्त मुबारक हो दोस्तों। आखिरकार बच्चे और बूढे तो एक ही जैसे होते हैं। जोर से बोलो जय हिंद। भारत माता की जय। चलों चले "ऐ मेरे वतन के लोगों", "मेरे देश की धरती" पुकारती है। हम सब मिल कर गायें "ऐ मेरे प्यारे वतन तुझ पर दिल कुर्बान"
अनिल अयान,
९४७९४११४०७

Wednesday, 15 March 2017

भीगे चुनर वाली...एक गोरी नारी... बडी मतवाली..

भीगे चुनर वाली...एक गोरी नारी... बडी मतवाली...
फागुन आ गया, देखते ही देखते रंग फैलाने का त्योहार भी आ गया. और कुछ याद आये या ना आए परन्तु एक गाना जरूर याद रह रह कर आता है।रंग बरसे भीगे चुनर वाली रंग बरसे.. कसम से यह गाना ना जाने कितने सालों से रंग को बादलों के साथ पानी की तरह बरसा रहा है। और तो और इस बारिस में देखने और सुनने में सिर्फ और सिर्फ एक गोरी नारी चुनर वाली हर साल भीगती है। बचपन से आज तक मैने इस चुनर वाली को रंगों की बारिस में भीगते देखा है। परन्तु इस कम्बख्त गोरी चुनर वाली को पानी से भीगने पर ना न्यूमोनिया हुआ और ना ही सर्दी और जुखाम हुआ। देखिये होली में प्रेम भी कैसा प्रेम है कि इतनी जगहों पर सिर्फ चुनर वाली ही भीगती हैं। आखिर चूनर के पीछे और रंग के बरसने के पीछे का राज क्या है। कालखंड बदल गया । सप्ताह महीने साल सब बदल गये पर चुनर वाली आज भी जवान है। कोई हमें भी बता दे इस जवानी का राज हम भी आस पास इसका वितरण कर दें। ताकी जवानी का सुरूर साल दर साल वैसे ही बना रहे। लेकिन भाभी जी के हाये दैया और सही पकडे हैं सुनकर पूरा मोहल्ला बाग बाग जरूर हो जाता है। सबका उन्ही के साथ होली खेलने और चूनर रंगने का ख्वाब जरूर आने लगता है।
होली आते ही भांग और मदिरा का तो ऐसा रंग चढता है कि सब उसी के रंग में झूमते नजर आते हैं। कभी कभी सोचता हूं कि अब इस देश का क्या होगा. जब से हमारे प्रधानमंत्री जी ने कहा ना खाउंगा और ना खाने दूंगा। उधर बिहार के साथ साथ कई राज्यों ने मदिरापान पर शराब बंदी की मोहर लगा दिये।ऐसे में तो बेचारे देवर अपनी भाभियों को ,जीजा अपनी सालियों को और शहर के लफंगें अपनी तथाकथित प्रेमिकाओं से अपनी होली की हुरदंग का इजहार कैसे करेंगें। सरकार ने तो इनके साथ वैसे भी बहुत जाद्तीय की है।बेचारों को कभी तो गला तर करने का मौका मिलता था वह भी इनके हांथ से छीन लिया। पर घबडाने की बात नही हैं। कच्ची है ना शहर में ना सही तो गांव में ही सही। कोने कोतरे कच्ची का स्वाद तो जीभ पा ही जायेगी। और माहौल मदिरालेश भी बना रहेगा। कभी कैश लेश। कभी शराबलेश। कभी शबाबलेश तो कभी कबाबलेश भी हमारे देश बन ही जायेगा। लेश ने तो लेस मात्र की कसर नहीं छोडी रंग उडाने में।
रंग उडते हुए तो ऐसा लगता है कि कहीं चेहरों का रंग भी ना उड जाये।इस समय तो उत्तर प्रदेश में सबके रंग उडे हैं और सब एक एक करके रंग बदलने में गिरगिट को भी पीछे छोड दिये हैं। कसम से मुझे तो लगा कि ब्रज की होली और उसके बदलते रंग पूरे उत्तर प्रदेश को अपने रंग में रंग ही लेंगें।आज कर वैसे राष्ट्रभक्ति और देश द्रोह का रंग भी काफी चढा हुआ है। जो लबादों के साथ भी बदलता है। इस समय चेहरों की किताब तो इस प्रकार के रंगों से सराबोर है। मानो पूरे देश की रंगत उडाने और बनाने का ठेका इसी का है। आतंकी इस समय खून के रंग को लाल गुलाल समझ कर पाकिस्तान तक को रंगने में लगे हुए हैं। समय के साथ कैसे रंग के मायने और रंग के मायनों को दिखाने वाले आईने बदल गये। प्रतिबिंब बदल गये और उसके मायने बदल गये।
हिंदी की किताबों में रंग उडाने की बात सुनी थी। गुलाल लगाने की बात सुनी थी। होली की हुडदंग सुनी और देखी थी। पर आज तोगानों ने हिंदी की तबाही मचा दी है। हिंदी और इंगलिश ऐसे आपसे में खिचडी हो गई कि मत पूंछिये जनाब। सदाबहार गीत अब रैप सांग और पाप रोक की श्रेणी में आ गये। ब्रेकप भी सेलीब्रेट किया जाता। चूना लगाने को भी सफेदा लगाना बना दिया गया। इस बीच में अब भी मै यही सोचता रहा कि आखिरकार वो गोरी नारी... जो खेलती थी होली.... जिसकी मीठी थी बोली.......... जो थी चुनर वाली... वो क्या खाती रही होगी की हमारे बचपन से आज तक जवान बनी हुई है। कौन सा रति ने उसे आशीर्वाद दिया होगा जिसकी वजह से वह मतवाली थी। हमारी साली और भाभी आज भी उस फार्मूले में हमारी रंगत उडाए हैं। और हम इसका जवाब खोजते खोजते आज भी अपनी जवानी बर्बाद कर दिये। अरे मै भी कहां चुनर वाली के पीछे भाग रहा हूं.. खैर चलिये चलते चलते मै भी आस पास चूनर वाली खोजूं कोई मिल जाये तो.आज कल तो जींस टाप के जमाने में और शार्ट होते कपडों में सभी को देखकर ऐसा लगता है चूनरवालियों का अकाल सा आ पडा है। अरे भाई अपने को भी तो रंग बरसाना है ताकि कोई चुनर वाली भीगे और वही गाना दोबारा लाउड स्पीकर से बजने लगे। अरे लगे हांथ तुकबंदी तो कर ही लेता हूं होली की. हमारी मोहल्ले की हुडदंग की टोली हमें बुला रही है तब तक आप इसका मजा लीजिये।
एक नारी/ चूनर वाली/ है मतवाली/ खेले होली/ मीठी बोली/ करे ठिठोली/
है हम जोली/ उसकी उमर/ तनिक ना डोली/ रंगों से भर गई जिसकी झोली/
टेशू गुम गये/ फाग हेराने/ फगुआ के हर राग हेराने/ ढूंढे हम कितने ठिकाने/
मीठी गोली/ बंदूख की गोली/ चहु ओर दिख रही भांग की गोली/ हाये रे होली/
अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७
 

Sunday, 1 January 2017

फेसबुकिया लाल सलाम बनाम राष्ट्रभक्ति

फेसबुकिया लाल सलाम बनाम राष्ट्रभक्ति
कम्बख्त कई महीनों से लाल सलाम और राष्ट्रभक्ति स्टेटस में ऐसे फूट रही है जैसे युगों की प्यास बुझाने का ठेका इसी ने ले रखा है. इस साइट में दो गुटों ने अमुक और तमुक की सेना बना रखी है. ये सेना के सेनापति खालीस्तान में अपना मनोरंजन करने के साथ साथ मुद्रा की यारी करते है.जहां ज्यादा मुद्रा मिली सेना का टाइटल और डिस्क्रिप्सन चेंज कर दिया.अमुक को जब तक लाल सलाम करने वालों ने आर्थिक आशीर्वाद दिया तब तक अमुक साहब उसी के गुणगान करने लगे थे, और जैसे ही उन्हे तमुक वालों ने राष्ट्रप्रेम दर्शाने के लिये लालच दिया वो तुरंत पाला बदल लिये. तमुक तो अमुक से दो कदम और आंगे निकले. एक महीने में तीस बार से अधिक एक ग्रुप और एक पेज के कई नामों से नामांकरण कर दिये. अब तो ऐसा लगता है कि बनाम मात्र दिखावा है.दोनों की सेना एक ही थाली के चट्टे बट्टे हैं. यह कबड्डी मात्र पाला बदलो खेल मात्र है।
मजा तो तब आता है जब महाराजा के सिपेहसलार तमुक के स्टेटस में जाकर कमेंट बाजी की फुहारे छोडतेहैं. कभी कभी ये फुहारें चिंगारी बनकर दिल जलाने का काम करते हैं.फिर कुछ ही देर में कमेंटबाजी कबूतर बाजी में बदल जाती है और कई कबूतरियां अपनी कबूतरी नखडे दिखाने के लिये आ जाती हैं. यही हाल अगले दिन अमुक के स्टेटस में तमुक की सेना करती है.और इस तरह लेन देन चलता रहताहै.एक बार मैने इन दोनों की गहराई से गहराई मापी. समझ में आया.कि ये तो वैचारिक रणुए हैं.जिनका कोई ईमान नहीं है.जिसका आशीर्वाद अधिक उसकी बोली बोलने और नखडे दिखाना शुरू हो जाताहै.एक समय था कि इसी नेटवर्किंग साइटस के सहारे गुजरात के घर के मोदी वाराणसी में हर हर कर रहे थे. पर अब तो यह बिजनेश है साहब.पूरी की पूरी टीम. वैचारिक अंधविश्वास का भक्ति दिखाकर कींचड उलीचने का टेंडर ले रखे हैं.
सालीन वुद्धिजीवी अगर इस अमुक तमुक वाक्युद्ध के चक्कर में फंसा और बुद्धिजीविता का प्रमाण देने की कोशिश किया तो.यह कबड्डी पूरी तरह से मल युद्द में बदल जायेगा.और बुद्धिजीवी को अपने बुद्धिजीवी होने पर कई बार विचार करना पडेगा.अतः सभी बुद्धिजीवियों को यह सलाह है कि इन कालगुजारों के जत्थे में शामिल होने से किनारा करें इससे पहले कि वो आपको किनारा पकडा दें.लाल सलाम के अर्थ को अनर्थ बनाकर अर्थ कमाने वाले ये चालबाज और मोदी भक्ति की चूनर ओढे राष्ट्रभक्ति का ढोंग रचाने वाले तो पाखंडियों की नई पीढी तैयार कर रहे हैं.जिन्हे मुफ्त की "इंटरनेट रेवडियां" बांटकर राजनैतिक पुण्य कमा रहे है।अब मै तो चला एक और अमुक तमुक सेना की राजनैतिक कुरुक्षेत्र की नौटंकी देखने।हां आपसे विनती है.इनके सामने बुद्धिजीवी बनने की मत सोचना दोस्तों।
अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७

ayaananil@gmail.com