व्यंग्य
प्यारा सजा है तेरा दरबार भवानी
न जाने क्यों नवरात्रि से मुझे शिकायत रहती है। शारदेय नवरात्रि में माता रानी का दरबार तो बहुत शानदार सजता है। जब मै इस शिकायत के समाधान के लिये प्रयास किया तो समझ में आया कि जरूर शारदेय नवरात्रि में ही इतना भव्य दर्शन देखने को मिलता है। चैत्र नवरात्रि में भक्तों के यहाँ सूखा पड़ जाता होगा। जब अखबारों में सुनता हूं कि १० करोड का पंडाल बना। २० करोड का पंडाल बना । लाखों के हीरे जवाहरातों क चढावा चढाया गया। तब मन को संतोष हो जाता है कि चंदा उगाही का काम तन्मयता के साथ युवा साथी कर रहे हैं। और लोगों का काला धन सही दिशा में लग रहा है। किंतु नोटबंदी के बाद इस बात की उम्मीद तो नहीं थी को करोडों का माल इस तरह के धार्मिक आयोजनों में लगाया जाएगा। किंतु चलों को काम हमारे प्रधानमंत्री जी इतनी मसक्क्त के बाद किये वो इन चंदा उगाही समूह के युवाओं ने कुछ सप्ताह की मेहनत के साथ कर दिये। उन्हें तो देश का सर्वोच्च पुरुस्कार मिलना चाहिये। देखो भाई धन जेब से निकालना बहुत कठिन काम है। ना सही रिजर्व बैंक में धर्म आधात्म में ही सदुपयोग हो। काश चैत्र नवरात्रि में भी इतना जलवा माता रानी का होता तो मजा आ जाता।
पंडालों की सुंदरता को सबसे ज्यादा चार चांद लगाने का काम बिजली विभाग के जिम्मे रहता है। इन नौ दिनों में करोडों की बिजली पानी की तरह फुंक जाती है और बिजली विभाग कागजों में खाना पूर्ति करता रह जाता है। कोई कुछ कह नहीं सकता क्योंकि माता रानी के दरबार में बिजली वालों का भी तो सहयोग जुडेगा। पुण्य प्राप्त करने के लिए इतना तो करना ही पडेगा। ट्रैफिक वाले इस समय चालान नहीं काट पाते हैं। बाइक तो दो जाओ तीन जाओ या चार भी चले जाओ। पार्किंग कहीं भी कर दो कोई पूंछने वाला नहीं है। आधे से अधिक व्यवस्थाए तो पंडाल या नवदुर्गा उत्सव समिति के युवा दबंग कार्यकर्ता ही कर डालते है। ट्रैफिक वाले आराम से पंडालों का प्रसाद ग्रहण करके माता रानी से दुआएं मांगते हैं कि वर्ष भर ऐसे की चार चांद लगा दे मैया।
जागरण और कवि सम्मेलन तो इस समय चरम में होते हैं। माता रानी के पंडाल के नीचे रात भर के लिए गायक पहले से बुकिंग में चले जाते हैं। एक प्री रिकार्डेड कैसेट जैसे हर जगराते और आर्केस्ट्रा में वही तीन घंटे का एपीसोड होता है। अरे भाई पब्लिक तो नई होती है। मंच नया होता है। भले ही वही गाने बार बार दोहराते रहो और माता रानी के जयकारे लगवाते रहो। इस प्रकार के माहौल में कवि सम्मेलन में मातारानी की भक्ति कम और पाकिस्तान को गाली देकर वीर रस, द्विअर्थी चुट्कुलों से माताओं बहनों को मंत्रमुग्ध करने का प्रयास, श्रंगार के गीतों से कुछ प्रेमी जोडों के मन को शरद की ठंडक देने का प्रयास किया जाता है। इसी बहाने नवदुर्गा उत्सव समिति के लोगों के द्वारा मुख्य अतिथि के रूप में पावर वाले को बुलाकर अगले साल की दान राशि पर मोहर लगवा लिया जाता है। नवरात्रि में अराधना के स्वरों की बजाय मनोरंजन और जन रंजन के स्वरों से गुदगुदाया जाता है।
इस समय तो लक्ष्मी घर आए या ना आए। माता रानी के नौ रूप के दर्शन हों या ना हों किंतु कई रूपों में कीडे मकोडे बिजली विभाग की मुफ्त की लाइटों के सामने चक्कर उसी तरह लगाते हैं जैसे गरबा रास डांडिया में प्रतिभागियों के चाहने वाले ब्वाय और गर्लफ्रेंड देर रात तक व्यस्त रहते हैं और चक्कर लगाते हैं। इसी शारदेय नवरात्र में मीडिया पार्टनर खोज कर अधिक्तर युवा क्लब, युवा मंडल, और युवा सेना विभिन्न समाजों के व्यवसाइयों से दमदार चंदा उगाहते हैं और अपना जलवा बिखेरते हैं। किसी ना किसी समाचार पत्र की कृपा से इस तरह के आयोजन युवाओं की सुंदरता, प्रेम, उत्साह, व्यवसाइयों का प्रचार, और अधिकारियों की मैडमों को अपने पतियों के जलवों को देखने इच्छा परवान चढती है।
चैत्र और शारदेय नवरात्र में बेटियों अर्थात कन्याओं को पूंछ बढ जाती है। पूरा शहर कन्याओं को ढूंढ कर भोज करवाता है। ऐसा लगता है कि शतयुग की वापसी हो चुकी है। कन्याओं के जीवन के अंतर को इन अवसरों और अन्य दिनों में देखा जा सकता है।माता पिता के व्यवहार में भी अंतर नवरात्रि की विशेषता होती है मित्रों। पुलिस वालों और अन्य सुरक्षा एजेंसियों की मरन इसी समय होती है। भक्तगणों के उत्साह, दबंगई, पावर वालों का पावर, सब कुछ उन बेचारों को झेलना पडता है। नौ दिन ऐसा महसूस होता है कि इनके लिए नौ दिन बनवास सौंप दिया जाता है। इनके परिवार वाले इनको मन ही मन बहुत कोसते हैं। शायद यही इनकी नियति होती है। मातारानी की कृपा इन पर क्यों नहीं बरसती यह विचार करता हूं। चैत्र नवरात्रि में नौ दिन तो ऐसे सूखा ग्रस्त होते हैं जैसे उनको भोजन पानी नहीं मिलता हो। या फिर भक्त गण क्लोजिंग और अन्य काम धंधो में ज्यादा व्यस्त हो जाते है।
रावण को जलाने के लिए तो इस नवरात्रि में कुछ ज्यादा ही उत्साह देखने को मिलता है। गाहे बगाहे रावण को कई जिले अपना जमाई मान कर पूजते हैं और अधिक्तर रामलीलाओं के आधुनिक आयोजनों की समाप्ति रावण वध और दहन के साथ होता है। इस तरह की रामलीलाओं को भी आधुनिकतम डिजिटल इंडिया से ओत प्रोत कर दिया गया है। रावण के कद को क्रेन लगा कर बढाया जाता है। राम को अभी भी मानव माना जाता है। भले ही साल भर वह पात्र कुछ भी करता रहे।इस तरह से रावण दहन से बाद से माता रानी विसर्जन और उठावना प्रारंभ होता है। माता रानी शारदेय से चैत्र के सूखाग्रस्त माहौल में जाने के लिए विवश हो जाती हैं। जहां पर रौनक को ग्रहण लग जाता है। जहाँ पर उत्साह ठंडा हो जाता है। जहाँ पर डांडिया और गरबा रास अपना पसीना पोंछता नजर आता है। जहाँ पर न जगराते होते हैं और ना ही जागरण होते हैं। कैसी रीति का पालन हो रहा है माता रानी के स्वागत में क्या इसमें शारदेय नवरात्र को आरक्षित कर दिया गया है।
अनिल अयान सतना
प्यारा सजा है तेरा दरबार भवानी
न जाने क्यों नवरात्रि से मुझे शिकायत रहती है। शारदेय नवरात्रि में माता रानी का दरबार तो बहुत शानदार सजता है। जब मै इस शिकायत के समाधान के लिये प्रयास किया तो समझ में आया कि जरूर शारदेय नवरात्रि में ही इतना भव्य दर्शन देखने को मिलता है। चैत्र नवरात्रि में भक्तों के यहाँ सूखा पड़ जाता होगा। जब अखबारों में सुनता हूं कि १० करोड का पंडाल बना। २० करोड का पंडाल बना । लाखों के हीरे जवाहरातों क चढावा चढाया गया। तब मन को संतोष हो जाता है कि चंदा उगाही का काम तन्मयता के साथ युवा साथी कर रहे हैं। और लोगों का काला धन सही दिशा में लग रहा है। किंतु नोटबंदी के बाद इस बात की उम्मीद तो नहीं थी को करोडों का माल इस तरह के धार्मिक आयोजनों में लगाया जाएगा। किंतु चलों को काम हमारे प्रधानमंत्री जी इतनी मसक्क्त के बाद किये वो इन चंदा उगाही समूह के युवाओं ने कुछ सप्ताह की मेहनत के साथ कर दिये। उन्हें तो देश का सर्वोच्च पुरुस्कार मिलना चाहिये। देखो भाई धन जेब से निकालना बहुत कठिन काम है। ना सही रिजर्व बैंक में धर्म आधात्म में ही सदुपयोग हो। काश चैत्र नवरात्रि में भी इतना जलवा माता रानी का होता तो मजा आ जाता।
पंडालों की सुंदरता को सबसे ज्यादा चार चांद लगाने का काम बिजली विभाग के जिम्मे रहता है। इन नौ दिनों में करोडों की बिजली पानी की तरह फुंक जाती है और बिजली विभाग कागजों में खाना पूर्ति करता रह जाता है। कोई कुछ कह नहीं सकता क्योंकि माता रानी के दरबार में बिजली वालों का भी तो सहयोग जुडेगा। पुण्य प्राप्त करने के लिए इतना तो करना ही पडेगा। ट्रैफिक वाले इस समय चालान नहीं काट पाते हैं। बाइक तो दो जाओ तीन जाओ या चार भी चले जाओ। पार्किंग कहीं भी कर दो कोई पूंछने वाला नहीं है। आधे से अधिक व्यवस्थाए तो पंडाल या नवदुर्गा उत्सव समिति के युवा दबंग कार्यकर्ता ही कर डालते है। ट्रैफिक वाले आराम से पंडालों का प्रसाद ग्रहण करके माता रानी से दुआएं मांगते हैं कि वर्ष भर ऐसे की चार चांद लगा दे मैया।
जागरण और कवि सम्मेलन तो इस समय चरम में होते हैं। माता रानी के पंडाल के नीचे रात भर के लिए गायक पहले से बुकिंग में चले जाते हैं। एक प्री रिकार्डेड कैसेट जैसे हर जगराते और आर्केस्ट्रा में वही तीन घंटे का एपीसोड होता है। अरे भाई पब्लिक तो नई होती है। मंच नया होता है। भले ही वही गाने बार बार दोहराते रहो और माता रानी के जयकारे लगवाते रहो। इस प्रकार के माहौल में कवि सम्मेलन में मातारानी की भक्ति कम और पाकिस्तान को गाली देकर वीर रस, द्विअर्थी चुट्कुलों से माताओं बहनों को मंत्रमुग्ध करने का प्रयास, श्रंगार के गीतों से कुछ प्रेमी जोडों के मन को शरद की ठंडक देने का प्रयास किया जाता है। इसी बहाने नवदुर्गा उत्सव समिति के लोगों के द्वारा मुख्य अतिथि के रूप में पावर वाले को बुलाकर अगले साल की दान राशि पर मोहर लगवा लिया जाता है। नवरात्रि में अराधना के स्वरों की बजाय मनोरंजन और जन रंजन के स्वरों से गुदगुदाया जाता है।
इस समय तो लक्ष्मी घर आए या ना आए। माता रानी के नौ रूप के दर्शन हों या ना हों किंतु कई रूपों में कीडे मकोडे बिजली विभाग की मुफ्त की लाइटों के सामने चक्कर उसी तरह लगाते हैं जैसे गरबा रास डांडिया में प्रतिभागियों के चाहने वाले ब्वाय और गर्लफ्रेंड देर रात तक व्यस्त रहते हैं और चक्कर लगाते हैं। इसी शारदेय नवरात्र में मीडिया पार्टनर खोज कर अधिक्तर युवा क्लब, युवा मंडल, और युवा सेना विभिन्न समाजों के व्यवसाइयों से दमदार चंदा उगाहते हैं और अपना जलवा बिखेरते हैं। किसी ना किसी समाचार पत्र की कृपा से इस तरह के आयोजन युवाओं की सुंदरता, प्रेम, उत्साह, व्यवसाइयों का प्रचार, और अधिकारियों की मैडमों को अपने पतियों के जलवों को देखने इच्छा परवान चढती है।
चैत्र और शारदेय नवरात्र में बेटियों अर्थात कन्याओं को पूंछ बढ जाती है। पूरा शहर कन्याओं को ढूंढ कर भोज करवाता है। ऐसा लगता है कि शतयुग की वापसी हो चुकी है। कन्याओं के जीवन के अंतर को इन अवसरों और अन्य दिनों में देखा जा सकता है।माता पिता के व्यवहार में भी अंतर नवरात्रि की विशेषता होती है मित्रों। पुलिस वालों और अन्य सुरक्षा एजेंसियों की मरन इसी समय होती है। भक्तगणों के उत्साह, दबंगई, पावर वालों का पावर, सब कुछ उन बेचारों को झेलना पडता है। नौ दिन ऐसा महसूस होता है कि इनके लिए नौ दिन बनवास सौंप दिया जाता है। इनके परिवार वाले इनको मन ही मन बहुत कोसते हैं। शायद यही इनकी नियति होती है। मातारानी की कृपा इन पर क्यों नहीं बरसती यह विचार करता हूं। चैत्र नवरात्रि में नौ दिन तो ऐसे सूखा ग्रस्त होते हैं जैसे उनको भोजन पानी नहीं मिलता हो। या फिर भक्त गण क्लोजिंग और अन्य काम धंधो में ज्यादा व्यस्त हो जाते है।
रावण को जलाने के लिए तो इस नवरात्रि में कुछ ज्यादा ही उत्साह देखने को मिलता है। गाहे बगाहे रावण को कई जिले अपना जमाई मान कर पूजते हैं और अधिक्तर रामलीलाओं के आधुनिक आयोजनों की समाप्ति रावण वध और दहन के साथ होता है। इस तरह की रामलीलाओं को भी आधुनिकतम डिजिटल इंडिया से ओत प्रोत कर दिया गया है। रावण के कद को क्रेन लगा कर बढाया जाता है। राम को अभी भी मानव माना जाता है। भले ही साल भर वह पात्र कुछ भी करता रहे।इस तरह से रावण दहन से बाद से माता रानी विसर्जन और उठावना प्रारंभ होता है। माता रानी शारदेय से चैत्र के सूखाग्रस्त माहौल में जाने के लिए विवश हो जाती हैं। जहां पर रौनक को ग्रहण लग जाता है। जहाँ पर उत्साह ठंडा हो जाता है। जहाँ पर डांडिया और गरबा रास अपना पसीना पोंछता नजर आता है। जहाँ पर न जगराते होते हैं और ना ही जागरण होते हैं। कैसी रीति का पालन हो रहा है माता रानी के स्वागत में क्या इसमें शारदेय नवरात्र को आरक्षित कर दिया गया है।
अनिल अयान सतना
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