व्यंग्य
लो आगया देश भक्ति की सीजन
-अनिल अयान
हमारे यहां त्योहार का मतलब है फकत छुट्टी का दिन। आज कल के एडवांस बच्चे तो महापुरुषों, नेताओं, और राजनीतिज्ञों में भी छुट्टियां खोज लेते हैं। वो तो समाचार में देखते रहते हैं कि कौन सा बुजुर्ग टपके और हमारी एक दिन की छुट्टी कन्फर्म। अगर यह मामला राष्ट्रीय त्योहार या राष्ट्रीय पर्व का हो तो बच्चों के पर तो सातवें आसमान में पहुंच जाते हैं। भाई अब उन्हें छुट्टी का बडा पैक मिल जाता है। गांधी जयंती, पंद्रह अगस्त , छब्बीस जनवरी की छुट्टी तो बच्चों को पहले से याद रहती है आखिर ये निश्चित जो होती है। सरकारी स्कूल के और कुकुरमुत्ता स्कूल के बच्चों को तो यह भी नहीं पता होता कि पंद्रह अगस्त को स्वतंत्रता दिवस है या छब्बीस जनवरी को। उन्हें तो फकत मजे करने से मतलब। इस समय कलेक्टर साहब तो पंद्रह अगस्त के अगले दिन भी छुट्टी दे देते हैं। यह समाचार तो बच्चों में और ज्यादा खलबली मचा देते हैं। कई बच्चे तो इतने चालाक होते हैं कि उन्हें ना स्कूल जाना और ना ही परेड ग्राउंड जाना बस बहाने मारने की शिक्षा पैदा होते ही मिल जाती है। ये बच्चें निश्चित ही पिछले जनम के भगोडे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे होगें।
आजकल के यूथ तो इस दिन देशभक्ति का फेम मानते हैं। फेसबुक की प्रोफाइल पिक्चर हो या व्हाट्स ऐप की डिस्प्ले पिक्चर या फिर इस्टाग्राम की डीपी दो तीन दिन पहले से लेकर दो तीन दिन बाद तक यह देशभक्ति चलती है। हां यह देश भक्ति की उस समय पोल जरूर खुल जाती है जब इनको राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान के बीच में बहुत सा डाउट होता है। या लाल बाल पाल जैसे उपनामों के नाम याद नहीं होते। इन्हें सारी देश भक्ति सिर्फ फारवर्डेड पोस्ट, फोटो और चुटकुलों में ही नजर आती है। पंद्रह अगस्त के दिन ये लोग तिरंगे के साथ या तिरंगे को हाथ में लेकर सेल्फी तो बाकायदे खींच कर लाइक और कमेंट का दंभ भरते हैं पर उसके कुछ मिनटों के बाद ही राह चलते जमीन पडे तिरंगे को उठाने में इन्हें परहेज होता है। राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के गाने को देखकर गाने में शर्म आती है और तो और इन गीतों के सम्मान में खडा होना तो इनके लिये बहुत बडी इंसल्ट का विषय होता है। यह आलम बाजार से शुरू होता है और बाजार पर जाकर खत्म हो जाता है। चाहे वो नेटवर्किंग साइट का हो या फिर टीवी चैनलों का सब जगह यही रवैया देखने को मिलता है। स्वतंत्रता का सही मजा तो काश्मीर के वो बरगलाये युवा ले रहे हैं। जो पाकिस्तान और आईएस आईएस के झंडे लेकर, या फिर सेना के ऊपर पत्थर बाजी करके पंद्रह अगस्त मनाते हैं। हमारा देश उनकी स्वतंत्रता का सही अर्थों में कर्जदार हैं।
बाजार की बात आई तो याद आया कि बाजार तो अगस्त माह में गिरगिट की तरह रंग बदलता है। कभी राखी का प्रचार प्रसार करता है तो कभी तिरंगें रंग में रंगे रिबन, मोजे, टोपियां, झंडे, स्टीकर, और मुखौटे बेंचता नजर आता है कभी फ्रेंडशिप के नाम पर बैंड्स कार्डस गिफ्ट बेंचता नजर आता है। यह बाजार भी अजब है अपने देश का सामान बेंच नहीं सकता क्योंकि वो बहुत मंहगा होता है तो इंपोर्टेड और मेड इन चाइना मटेरियल सरे आम बेंचता है। हमारा समाज उसे बाकायदे खरीदता भी है क्योंकि इसका कोई विकल्प नहीं है वो कम पैसे में अपनी सुविधाएं देखता है। भले ही दुनिया भर में इसका विरोध वो करता रहे। एक दुकान वाले से मैने पूंछा कि यह क्या मामला है भाई। तो उसने हंसते हुये जवाब दिया आप तो सब जानते हो साहब यह मार्केट है यहां पर मौसम की तरह सब बदल जाता है। बूढा भी जवान की तरह बिक जाता है। हम तो फिलहाल सामान बेंच रहे हैं। मैने उसका जवाब सुनकर अपना माथा पीट लिया। कुल मिलाकर बाजार आज के त्योहारों का माईबाप , माईलार्ड और आका है। बाजार ही समाज में देश भक्ति का सीजन लाता है और समय के साथ इस सीजन को पैक भी कर लेता है। सारे देश को देशभक्ति की शिक्षा देने वाला बाजार ही हो है।
हमें तो अपने स्कूल के दिन आजाते हैं जिसमें हम सुबह से मोहल्ले से फूल चुराकर फूल मालायें बनाकर स्कूल में ले जाते थे। स्कूल में सब सुबह से ही सफेद बुशर्ट और सफेद पैंट पहन कर पीटी करते। देशभक्ति गीत ऐ मेरे वतन के लोगों, ऐ मालिक तेरे बंदे हम, मेरे देश की धरती , ऐ मेरे प्यारे वतन जैसे देश भक्तिगीतों को सुनकर मन को देशभक्ति से भर लेते थे। स्कूल से जाते जाते लाई और रेवडी दाना या फिर लड्डू और नमकीन लेना भी नहीं भूलते थे। अब तो इस सीजन में भी ग्लोबल वार्मिंग का जमाना आगया है। इन गानों के रिमिक्स तेज गाने आ गये। सब में पंद्रह अगस्त का वो जज्बा कम हो गया। प्रसाद की जगह चाकलेट और समोसों ने ले लिया। भारत माता अपने देश में विवादित हो गई। देश भक्ति जज्बे की बजाय राजनीति का हिस्सा बन गई। राष्ट्रभक्त होने के मायने और परिभाषायें अब देश की राजनैतिक पार्टियां तय करने लगीं। हम बेचारे सिर्फ अपनी मन की आस्था और विश्वास लिये अंतस को कचोटते रह गये। बस इसी बात से संतोष कर लेता हूं कि चलो अब अपनी स्वतंत्रता भी बुढा गयी सठिया कर सत्तर वर्ष की हो गई। यह भी संकरित हो गई। गुलामी - आजादी का मिक्चर जिसे हर रोज अधिक उत्पादक फसल के रूप में हर साल बोया जाता है।बोइनी की जाती है। ताकी देशभक्ति की फसल लहलहाये और भारत माता का दामन हरा भरा बना रहे। यह फसल खरपतवार हो या अनाज इसकी फिक्र कहां है हमारे देश के झंडावरदारों कों। आप सबको भी इस सीजन की संकरित सत्तरवां पंद्रह अगस्त मुबारक हो दोस्तों। आखिरकार बच्चे और बूढे तो एक ही जैसे होते हैं। जोर से बोलो जय हिंद। भारत माता की जय। चलों चले "ऐ मेरे वतन के लोगों", "मेरे देश की धरती" पुकारती है। हम सब मिल कर गायें "ऐ मेरे प्यारे वतन तुझ पर दिल कुर्बान"
अनिल अयान,
९४७९४११४०७
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