भीगे चुनर वाली...एक गोरी नारी... बडी मतवाली...
फागुन आ गया, देखते ही देखते रंग फैलाने का त्योहार भी आ गया. और कुछ याद आये या ना आए परन्तु एक गाना जरूर याद रह रह कर आता है।रंग बरसे भीगे चुनर वाली रंग बरसे.. कसम से यह गाना ना जाने कितने सालों से रंग को बादलों के साथ पानी की तरह बरसा रहा है। और तो और इस बारिस में देखने और सुनने में सिर्फ और सिर्फ एक गोरी नारी चुनर वाली हर साल भीगती है। बचपन से आज तक मैने इस चुनर वाली को रंगों की बारिस में भीगते देखा है। परन्तु इस कम्बख्त गोरी चुनर वाली को पानी से भीगने पर ना न्यूमोनिया हुआ और ना ही सर्दी और जुखाम हुआ। देखिये होली में प्रेम भी कैसा प्रेम है कि इतनी जगहों पर सिर्फ चुनर वाली ही भीगती हैं। आखिर चूनर के पीछे और रंग के बरसने के पीछे का राज क्या है। कालखंड बदल गया । सप्ताह महीने साल सब बदल गये पर चुनर वाली आज भी जवान है। कोई हमें भी बता दे इस जवानी का राज हम भी आस पास इसका वितरण कर दें। ताकी जवानी का सुरूर साल दर साल वैसे ही बना रहे। लेकिन भाभी जी के हाये दैया और सही पकडे हैं सुनकर पूरा मोहल्ला बाग बाग जरूर हो जाता है। सबका उन्ही के साथ होली खेलने और चूनर रंगने का ख्वाब जरूर आने लगता है।
होली आते ही भांग और मदिरा का तो ऐसा रंग चढता है कि सब उसी के रंग में झूमते नजर आते हैं। कभी कभी सोचता हूं कि अब इस देश का क्या होगा. जब से हमारे प्रधानमंत्री जी ने कहा ना खाउंगा और ना खाने दूंगा। उधर बिहार के साथ साथ कई राज्यों ने मदिरापान पर शराब बंदी की मोहर लगा दिये।ऐसे में तो बेचारे देवर अपनी भाभियों को ,जीजा अपनी सालियों को और शहर के लफंगें अपनी तथाकथित प्रेमिकाओं से अपनी होली की हुरदंग का इजहार कैसे करेंगें। सरकार ने तो इनके साथ वैसे भी बहुत जाद्तीय की है।बेचारों को कभी तो गला तर करने का मौका मिलता था वह भी इनके हांथ से छीन लिया। पर घबडाने की बात नही हैं। कच्ची है ना शहर में ना सही तो गांव में ही सही। कोने कोतरे कच्ची का स्वाद तो जीभ पा ही जायेगी। और माहौल मदिरालेश भी बना रहेगा। कभी कैश लेश। कभी शराबलेश। कभी शबाबलेश तो कभी कबाबलेश भी हमारे देश बन ही जायेगा। लेश ने तो लेस मात्र की कसर नहीं छोडी रंग उडाने में।
रंग उडते हुए तो ऐसा लगता है कि कहीं चेहरों का रंग भी ना उड जाये।इस समय तो उत्तर प्रदेश में सबके रंग उडे हैं और सब एक एक करके रंग बदलने में गिरगिट को भी पीछे छोड दिये हैं। कसम से मुझे तो लगा कि ब्रज की होली और उसके बदलते रंग पूरे उत्तर प्रदेश को अपने रंग में रंग ही लेंगें।आज कर वैसे राष्ट्रभक्ति और देश द्रोह का रंग भी काफी चढा हुआ है। जो लबादों के साथ भी बदलता है। इस समय चेहरों की किताब तो इस प्रकार के रंगों से सराबोर है। मानो पूरे देश की रंगत उडाने और बनाने का ठेका इसी का है। आतंकी इस समय खून के रंग को लाल गुलाल समझ कर पाकिस्तान तक को रंगने में लगे हुए हैं। समय के साथ कैसे रंग के मायने और रंग के मायनों को दिखाने वाले आईने बदल गये। प्रतिबिंब बदल गये और उसके मायने बदल गये।
हिंदी की किताबों में रंग उडाने की बात सुनी थी। गुलाल लगाने की बात सुनी थी। होली की हुडदंग सुनी और देखी थी। पर आज तोगानों ने हिंदी की तबाही मचा दी है। हिंदी और इंगलिश ऐसे आपसे में खिचडी हो गई कि मत पूंछिये जनाब। सदाबहार गीत अब रैप सांग और पाप रोक की श्रेणी में आ गये। ब्रेकप भी सेलीब्रेट किया जाता। चूना लगाने को भी सफेदा लगाना बना दिया गया। इस बीच में अब भी मै यही सोचता रहा कि आखिरकार वो गोरी नारी... जो खेलती थी होली.... जिसकी मीठी थी बोली.......... जो थी चुनर वाली... वो क्या खाती रही होगी की हमारे बचपन से आज तक जवान बनी हुई है। कौन सा रति ने उसे आशीर्वाद दिया होगा जिसकी वजह से वह मतवाली थी। हमारी साली और भाभी आज भी उस फार्मूले में हमारी रंगत उडाए हैं। और हम इसका जवाब खोजते खोजते आज भी अपनी जवानी बर्बाद कर दिये। अरे मै भी कहां चुनर वाली के पीछे भाग रहा हूं.. खैर चलिये चलते चलते मै भी आस पास चूनर वाली खोजूं कोई मिल जाये तो.आज कल तो जींस टाप के जमाने में और शार्ट होते कपडों में सभी को देखकर ऐसा लगता है चूनरवालियों का अकाल सा आ पडा है। अरे भाई अपने को भी तो रंग बरसाना है ताकि कोई चुनर वाली भीगे और वही गाना दोबारा लाउड स्पीकर से बजने लगे। अरे लगे हांथ तुकबंदी तो कर ही लेता हूं होली की. हमारी मोहल्ले की हुडदंग की टोली हमें बुला रही है तब तक आप इसका मजा लीजिये।
एक नारी/ चूनर वाली/ है मतवाली/ खेले होली/ मीठी बोली/ करे ठिठोली/
है हम जोली/ उसकी उमर/ तनिक ना डोली/ रंगों से भर गई जिसकी झोली/
टेशू गुम गये/ फाग हेराने/ फगुआ के हर राग हेराने/ ढूंढे हम कितने ठिकाने/
मीठी गोली/ बंदूख की गोली/ चहु ओर दिख रही भांग की गोली/ हाये रे होली/
अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७
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