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Sunday, 10 November 2019

"गुरु नानक" से आलोकित सर्वधर्म सम्भाव का प्रकाश

"गुरु नानक" से आलोकित सर्वधर्म सम्भाव का प्रकाश

"काहे रे बन खोजन जाई।/ सरब निवासी सदा अलेपा, तोही संग समाई॥१॥ / पुष्प मध्य ज्यों बास बसत है, मुकर माहि जस छाई। तैसे ही हरि बसै निरंतर, घट ही खोजौ भाई ॥२॥ बाहर भीतर एकै जानों, यह गुरु ग्यान बताई। जन नानक बिन आपा चीन्हे, मिटै न भ्रमकी काई॥३॥
जब गुरुनानक देव जी ने वर्ष 1496 में अपना पहली भविष्यवाणी किया – जिसमें उन्होंने कहा कि “कोई भी हिन्दू नहीं और ना ही कोई मुस्लमान है” और कहा कि यह एक महत्वपूर्ण घोषणा है जो ना सिर्फ आदमी के भाईचारा और परमेश्वर के पितृत्व की घोषणा है,  बल्कि यह भी स्पष्ट है की मनुष्य की प्राथमिक रूचि किसी भी प्रकार के अध्यात्मिक सिधांत में नहीं है, वह तो मनुष्य और उसके किस्मत में हैं।" तब ही उनके अनुयाइयों ने जान लिया था कि भारतभूमि में एक नया आलोक अवतरित हुआ है। एक वह समय था और एक आज का समय है जब पाँच सौ पचास साल गुजर चुके हैं, और हमारा पड़ोसी बिना किसी शर्त के इस निर्णय मे आ गया कि इस अवसर पर करतारपुर कारीडोर इस पुण्य दर्शनार्थ खोलने में एक भी पल की देरी नहीं की, जो स्वागत योग्य था। और एक अच्छे पड़ोसी होने का संदेश भी था।
गुरुनानक देव जी को किसी भी धर्म की बंदिशों में नहीं बाँधा जा सका। क्योंकि उनके द्वारा दी गई शिक्षाओं को खुद कई धर्मों के स्वीकार किया। उनकी उदारता को देश विदेशों में पूज्य माना गया। उन्होंने अपने सिद्धांतो और नियमों के प्रचार के लिए अपने घर तक को छोड़ दिया और एक सन्यासी के रूप में रहने लगे। उन्होंने हिन्दू और मुस्लमान दोनों धर्मों के विचारों को सम्मिलित करके एक नए धर्म की स्थापना की जो बाद में सिख धर्म के नाम से जाना गया। इसी संदर्भ में उनके जीवन की कई घटनाओं से सीख लिया जा सकता है उसमें से पहली घटना जरा देखें जिसमें गुरु नानक देव, जब, लगभग 5 वर्ष के हुए तब पिता ने एक मौलवी के पास पढ़ने के लिए भेजा | मौलवी, उनके चेहरे का नूर देखकर हैरान रह गया | जब उसने गुरु नानक देव जी की पट्टी पर “ऊँ” लिखा, तब उसी क्षण उन्होंने “१ऊँ” लिखकर संदेश दे दिया कि ईश्वर एक है और हम सब उस एक पिता की सन्तान हैं | मौलवी, उनके पिता कालू जी के पास जा कर बोला कि उनका पुत्र तो एक अलाही नूर है, उसको वह क्या पढ़ाएगा, वह तो स्वयं समस्त संसार को ज्ञान देगा |भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हुई |
इसी तरह जब गुरू जी विभिन्न यात्राओं में या उदासियों में विभिन्न देशों की यात्रा कर रहे थे तभी एक एक घटना ने पूरे विश्व को एक सूत्र वाक्य दिया कि ईश्वर एक है और हर जगह विद्यमान है, जो सनातन धर्म में उद्धत किया गया है। इस घटना को एक सीख के रूप में देखा जा सकता है जिसमें गुरु नानक जी नें अपने मिशन की शुरुवात मरदाना के साथ मिल के किया। एक बार गुरु जी रात के समय काबे की तरफ विराज गए तब जिओन ने गुस्से में आकर गुरु जी से कहा कि तू कौन काफ़िर है जो खुदा के घर की तरफ पैर पसारकर सोया हुआ है? गुरु जी ने बड़ी नम्रता के साथ कहा, मैं यहाँ सरे दिन के सफर से थककर लेटा हूँ, मुझे नहीं मालूम की खुदा का घर किधर है तू हमारे पैर पकड़कर उधर करदे जिधर खुदा का घर नहीं है| यह बात सुनकर जिओन ने बड़े गुस्से में आकर गुरु जी के चरणों को घसीटकर दूसरी ओर कर दिया और जब चरणों को छोड़कर देखा तो उसे काबा भी उसी तरफ ही नजर आने लगा| इस प्रकार उसने जब फिर चरण दूसरी तरफ किए तो काबा उसी और ही घुमते हुआ नज़र आया| जिओन ने जब यहे देखा कि काबा इनके चरणों के साथ ही घूम जाता है तो उसने यह बात हाजी और मुलानो को बताई जिससे बहुत सारे लोग वहाँ एकत्रित हो गए| गुरु जी के इस कौतक को देखकर सभी दंग रहगए और गुरु जी के चरणों पर गिर पड़े| उन्होंने गुरु जी से माफ़ी भी माँगी| जब गुरु जी ने वहाँ से चलने की तैयारी की तो काबे के पीरों ने विनती करके गुरु जी की एक खड़ाव निशानी के रूप में अपने पास रख ली|
उन्होने अपने जीवन में वैसे तो बहुत से मत दिए जो धर्म संस्कृति की पृष्ठभूमि को परिभाषित करने के लिए काफी थी किंतु उनकी कुछ शिक्षाएँ उनके द्वारा धर्म, संप्रदाय, पंथ के लिए क्या विचार थे यह स्पष्त करने में काफी हैं, जिसमें, उन्होने सनातन मत की मूर्तिपूजा की शैली के विपरीत एक परमात्मा की उपासना का एक अलग मार्ग मानवता को दिया। उन्होंने हिंदू धर्म मे फैली कुरीतिओं का सदैव विरोध किया। उनके दर्शन में सूफीयों जैसी थी । साथ ही उन्होंने तत्कालीन राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक स्थितियों पर भी नज़र डाली है। संत साहित्य में नानक उन संतों की श्रेणी में हैं जिन्होंने नारी को बड़प्पन दिया है। वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के भारी समर्थक थे। धार्मिक सदभाव की स्थापना के लिए उन्होंने सभी तीर्थों की यात्रायें की और सभी धर्मों के लोगों को अपना शिष्य बनाया। उन्होंने हिन्दू धर्म और इस्लाम, दोनों की मूल एवं सर्वोत्तम शिक्षाओं को सम्मिश्रित करके एक नए धर्म की स्थापना की जिसके मिलाधर थे प्रेम और समानता। यही बाद में सिख धर्म कहलाया। भारत में अपने ज्ञान की ज्योति जलाने के बाद उन्होंने मक्का मदीना की यात्रा की और वहां के निवासी भी उनसे अत्यंत प्रभावित हुए। 25 वर्ष  के भ्रमण के पश्चात् नानक कर्तारपुर में बस गये और वहीँ रहकर उपदेश देने लगे। उनकी वाणी आज भी ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ में संगृहीत है।
एक मूल दार्शनिक, योगी, गृहस्थ, धर्मसुधारक, समाज सुधारक, कवि, देशभक्त और विश्वबंधु के रूप में भी हम सब गुरुनानक देव को देख सकते हैं, उन्हें नानक से गुरु और गुरु से देव बनते महसूस कर सकते हैं, उनके जीवन के सिद्धांतो को वर्तमान संदर्भों में उपयोगिता को समझ सकते हैं। इनके उपदेश का सार यही होता था कि ईश्वर एक है उसकी उपासना हिंदू मुसलमान दोनों के लिये हैं। मूर्तिपुजा, बहुदेवोपासना को ये अनावश्यक कहते थे। हिंदु और मुसलमान दोनों पर इनके मत का प्रभाव पड़ता था। ईश्वर को अपने भीतर ढूंढो. कोई भी मनुष्य दुसरो को अपने से छोटा न समझे. सभी जातियां और धर्म समान है. ईश्वर को पाने के लिए किसी भी प्रकार का बाहरी आडम्बर बेकार है, सभी जाति, धर्म के लोग हो आखिरकार मानव ही तो हैं इसलिए मानव सेवा ही सबसे बड़ा उदार धर्म है, इसलिए उन्होने लंगर की शुरुआत की। एक कवि के रूप में नानक जी ने हुनर दिखाया, नानक जी सूफी कवि भी थे। उनके भावुक और कोमल हृदय ने प्रकृति से एकात्म होकर जो अभिव्यक्ति की है, वह निराली है। उनकी भाषा में फारसी, मुल्तानी, पंजाबी, सिंधी, खड़ी बोली, अरबी के शब्द समा गए थे। गुरबाणी में शामिल है- जपजी, सोहिला, दखनी ओंकार, आसा दी वार, बारह माह प्रमुख रचनाओं के भाग आज भी मौजूद हैं जो पाठ के रूप में किये जाते हैं। अंततः उनकी एक वाणी से अपने इस स्मरण को पूर्ण विराम देता हूँ कि-
हरि बिनु तेरो को न सहाई। काकी मात-पिता सुत बनिता, को काहू को भाई॥/
धरनी अरु संपति सगरी जो मानिओ अपनाई। तन छूटै कुछ संग न चालै, कहा ताहि लपटाई॥
दयाल सदा दु:ख-भंजन, ता सिउ रुचि न बढाई। नानक कहत जगत सभ मिथिआ, ज्यों सुपना रैनाई॥
ब पूरा विश्व इस महामानव की उपयोगिता और शिख धर्म को अनुसरण कर रहा है तो हिंदुस्तान के साथ पाक को तो पहल करना ही था। आइए इस प्रकाश पर्व को वैश्विक स्तर की आध्यात्मिकता तक पहुँचाएँ और अंतर्मन में गुनगुनाएँ।बोले सो निहाल सत श्री अकाल। जो व्यक्ति यह कहेगा कि ईश्वर ही अन्तिम सत्य है उसपर चिकालिक ईश्वर का आशीर्वाद रहेगा।

अनिल अयान,सतना
संपर्क ९४७९४११४०७

Tuesday, 29 October 2019

कुर्सी के रामराज्य में अच्छे दिन


कुर्सी के "राम राज्य" मे "अच्छे दिन....."
अनिल अयान
प्रभु राम अयोध्या लौट आए हैं। राम राज्य आ गया है। अच्छे दिन तो पहले से ही आ चुके थे। अपनी दूसरी पंचवर्षीय में अच्छे दिन बहुत आएं हैं। भगवान राम जी आज भी अयोध्या में तंबू में निवास कर रहे हैं। अदालतें प्रभु राम को रामराज्य में भी रनिवास नहीं दिलवा सकीं। समय गुजरते ही अगले चुनाव तक यह मामला सरकारी दफ्तर के उस अलमारी में गायब हो जाता है जहां बाबू चपरासी और अधिकारियों को भी पसीना बहाना पड़ता है। अच्छे दिन इस तरह से है। कि देश की सत्तारूढ पार्टी की सीटें कम होकर भी मुखिया जी फादर आफ इंडिया के तमगे से प्रसन्न हैं। मन की बात में जनता जनार्दन को सियाचिन ग्लेशियर में स्वच्छता अभियान का संदेश दिया जाता है पर पुलवामा के शहीदों की शहादत को बिसरा भी दिया जाता है। स्वदेशी अपनाओ के संदेश के साथ साथ चाइना का बाजार और तिब्बत शरणार्थियों का बाजार पूरी ठंडक में लोगों को गर्मी देने का काम करता है।
शहरों, कस्बों और गांवों में स्वच्छता अभियान इतना तगड़ा है कि चौराहों में कचड़ा मुंह बना रहा है‌। राजनीति में में स्वच्छता अभियान इतनी तेजी चलाया जा रहा है विपक्ष अपने अस्तित्व की तलाश में व्यस्त हैं। छद्मयुद्ध में हरियाणा ने सत्तारूढ दल को सबक सिखा दिया है। जब से जम्मू काश्मीर और लद्दाख अलग हुए तब से धाराएं प्रवाहित हो रही हैं। जम्मू काश्मीर के राज्यपाल को धरती के स्वर्ग से भी स्थानांतरित कर दिया गया। एक तरफ जहां हर प्रदेश में कमल खिलाने की फिराक में  गृहमंत्री पूरी तरह से व्यस्त हैं। अभी तक को सामान खरीदने बेचने के लिए बाजार सजता था पर अब तो सरकारों के बनने बिगडने के लिए एमपी एमएलए की बोलियां लग रही है। कहीं पर फिफ्टी का मामला चल रहा है। कुल मिलाकर लोकतंत्र का रामराज्य जारी है।
हम सबको इस रामराज्य में धर्म पंथ की भूल-भुलैया मे व्यस्त किया जा रहा है। स्मार्ट सिटी के नाम पर धन को समर्पित किया जा रहा है। मीडिया को दो किनारों की तरह पक्ष और विपक्ष में बांट दिया गया है। राज सेवक सामुद्र के किनारे स्वच्छता अभियान के महाअभियान में परम व्यस्त हैं। मीडिया इस ब्रेकिंग समाचार को जनहित में जारी करने में  टीआरपी मैया के सामने नतमस्तक ह़ो चुकी है। मीडिया भी दो फांकों में बट चुका है। एक सत्तारूढ की चरण वंदना कर शौर्य गाथा गा रहा है। और दूसरा शौर्यगाथाओं के पीछे से नेपथ्य में छिपाए मुख्य मुद्दों को उजागर कर रहा है। चुनाव के समय पर ही विपक्ष दल की विधानसभा सरकारों पर आईबी और सीबीआई के छापे मारे जाते हैं और जेल का रास्ता दिखाया जाता है। त्योहारों के समय पर ही मिलावट और लाइसेंस का ध्यान आता। एक विभाग दूसरे विभागों की टांग खींचने में सबसे आगे रहते हैं। धर्म को अफीम बनाकर रोज की घुट्टी पिलाने में सत्तारूढ़ पूरी तरह से मुख्य धारा को छोड़ अपनी धारा को मुख्य बनाने की जुगत भिड़ा रहा है। धारा एक सौ चौवालिस के बाद जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का क्या हुआ यह जनता ना जान पाई। मीडिया ने इसको दिखाने से परहेज़ किया। कभी सावरकर, कभी सरदापटेल कभी गांधी के नाम पर  राजनीति के साइबर सेल सोशल मीडिया में रायता फैला देते हैंदल दलदल में ही दलित राजनीति कुर्सी के राम राज्य लाने के लिए कर रहे हैं। धर्म की अफीका नशा इतना तगड़ा है कि अमुक धर्म के एक भड़काऊ भाषण देने वाले धार्मिसुधारक को सरे आम कत्ल कर दिया जाता है। और मीडिया उसके पीछे पड़ जाता है उसकी मां जिस मुख्यमंत्री को इसका गुनहगार मानती है, उसी से मिलने और उसी के माध्यम से जब नौकरी और मुआवजे का आदेश मिला तब पूरा परिवार उन्हे धन्यवाद देता है। अमुक और तमुक धर्म को लड़ाने में विभिन्न मीडिया और दल और राम राज्य पूरा प्रयास करते हैं। खींच तान के समय में सत्यता रूढ़ दल का मुखिया चालाकी से मौन धारण कर लेता है। जनता जनार्दन यह चालाकी भी बखूबी समझती है। जनता जानती है कि वो राम राज्य का सुख भोग रही है। जहां पर योजनाओं में लदे हुए वायदे हैं। वायदों के अच्छे दिन है।
चुनावी दौरों की बात हो, अच्छे दिन की बात हो, या मन की बात हो सभी में छिपा उद्देश्य विपक्ष को गरियाना, पड़ोसी देशों की खिल्ली उड़ाना, ढकोसला पूर्ण तथ्यों की बलि दे देना, मुख्य मुद्दों से भटकाना, अर्थव्यवस्था ,सुरक्षा रोजगार, कृषि और किसान के जमीनी हालापर चुप्पी साध लेने का काम किया जा रहा है। जनता को नेताओं की लंगोट बनाकर लपेट लिया गया है। देश में हर शासकीय सेवा का प्राइवेटाइजेशन हो रहा है। जम्हूरियत की बात करने वालों को कारागार की सुविधा दी जा रही है। बाबरी मस्जिद और राम मंदिर तो अब निर्माण की आशा त्याग चुके हैं। सन चौदह और सन उन्नीस के चुनावी एजेंडे खाक छानने में मग्न हैं। देश आर्थिक, सामाजिक, सुरक्षात्मक और राजनैतिक अनुशासन पर्व मनाने में व्यस्त हैं। पर सब प्रसन्न हैं क्योंकि हम सब रामराज्य का सुख भोग रहे हैं। संजय सबकुछ बता रहा है आखिंन देखी। पर धृतराष्ट्र को केशव पर पूर्ण विश्वास है कि चाहे द्वापर हो त्रेता हो या कलयुग रामराज्य में अच्छे पर मंहगे दिन का सुख तो भोगना ही पड़ेगा।  इस रामराज्य में सबकी मनोकामना पूरी हो रही है। सबको इसी का भ्रम है कि सरकार उसका ध्यान रख रही है। और यही भ्रम कुर्सी के रामराज्य के लिए अफीमाई घुट्टी है। जिससे सत्ता का, देश का, दल का और लोक सेवक का दंभ सम्मान अमिट बनेगा, यह कथा अनंत है और अभिप्राय और भी अनंत है। आइये सब मिलकर कर उद्घोष करें , बोलो प्रभु रामचंद्र की जय, सिया बलराम चंद्र की जय, राम राज्य अमर रहे,भारत देश अमर रहे। हम सबका कल्याण हो।।
अनिल अयान।


Friday, 22 February 2019

सत्ता स्वयंवर विवाह समारोह

सत्ता स्वयंवर विवाह समारोह
सत्ता फिर से दुल्हन बनने के लिए तैयार खड़ी है, चुनाव रूपी बारात की तिथि, चुनाव आयोग नामक पुरोहित ने विचार दिया। फिर से विधान सभा नामक ससुराल सजाई जा रही है। इस विवाह के स्वयंवर में सभी वर अपने अपने भाग्य को आजमाने के लिए मैदान में युद्ध स्तर की तैयारी कर चुके हैं। कई तो वर के रूप में सिद्ध होने के लिए वोटों की गणित के प्रमेय सिद्धि में देव और देवी द्वार माथा टेक रहे हैं कई सत्ता के पूर्व प्रेमी भी विरोध का बिगुल बजाकर हुंकार भर चुके हैं और ढंके की चोंट में कह रहे हैं, प्रेम सिद्ध ना हुआ तो स्वयंवर में सिद्धि तो प्राप्त हो ही सकती है। हाथ आजमाने में क्या जा रहा है। कुछ राशि ही तो जा ने वाली है। सबसे बड़ी बात यह है कि कई उम्मीदवार इस स्वयंवर में सम्मान निधि के नाम पर दान दक्षिणा में मिले हुए गरीबों के द्वारा चलने व ना चलने वाले सिक्के भी मटकों में भरकर ला रहे हैं। ताकि गड्डियों को इससे दूर रखा जाए। अन्य विवाह समारोह में वर पक्ष पार्टी अपनी आर्थिक सम्म्पन्नता का खूब बखान अतिशयोक्ति पूर्ण करते हैं। यहाँ तो उम्मीदवार इसमें में अन्योक्ति अलंकार का प्रयोग करते हुए बताते कुछ और हैं और होता कुछ और....। उन्हें इस बात की भरपूर डरावनी आशा होती है कि कहीं आयोग पुरोहित उनकी चल अचल संपत्ति को काला धन की श्रेणी में लाकर स्वयंवर से उनका पत्ता साफ न कर दे। सबसे बड़ी मजेदार बात यह है कि पुरोहित को जिस तरह के मंत्रों का उच्चारण करना होता है वो जानता है कि पूर्व प्रेमी उम्मीदवार के लिए कौन सा मंत्र बाँचना है और वधु प्राप्ति के लिए ताजे उम्मीदवार के लिए कौन सा मंत्र बाँचना है।
इस बार के विवाह समारोह में पुरोहित ने उम्मीदवारों की खर्च सीमा का आधार कार्ड़ और बैंक अकाउंट से सीधा संबंध स्थापित कर लिया है। सभी संवाददाताओं को सख्त आदेश है कि वो हर जगह के उस उम्र के सभी उम्मीदवारों को यह निमंत्रण पत्र भी हल्दी चावल लगाकर दिया जाए ताकि थोक का थोक स्वयंवर की परीक्षा आयोजित किया जा सके। पुरोह्ति को सत्ता सुख भोगने के लिए और संतानोत्पत्ति हेतु उचित वर खोजने में प्रायिकता का सिद्धांत भी सही सिद्ध हो सके। वर पक्ष के उम्मीदवारों की राजनैतिक परिवार भी इस स्वयंवर में ऐसे लिप्त हैं जैसे उम्मीदवार को नहीं बल्कि उनके परिवार के हर सदस्य को शहनशाह की पदवी मिलना तो तय ही है और हुकूमत करने का मौका रखा रखाया है। इस स्वयंवर का उत्सव इतना ज्यादा उत्साह जनक है कि पुरोहित और उसने शिष्य़ गण भी इस स्वयंवर विवाह को सम्मपन्न कराने के लिए सत्ता के मायके के घराती बने हुए हैं। इस अवसर पर गाहे बगाहे, निमंत्रण पत्र के साथ साथ, सोमरस, और सम्मोहित करने हेतु मुद्रा अंतरण तक चलाया जा रहा है। इस समारोह की खासियत यह भी है। उस उम्र के हर व्यक्ति को मजबूरी वस स्वयंवर में उम्मीदवार का समर्थन करने जाना ही है। इस यात्रा करने वाले व्यक्ति को हम मतदाता के नाम से जानते है। वैसे तो वो समर्थन करता है और उम्मीवार को स्वयंवर में सफलता की कामना अपनी मजबूरी और स्वार्थवश करता है। किंतु वो जानता है कि सत्ता सुख भोगने का वरदान मात्र पुरोहित ने वर और उसके राजनैतिक परिवार वाले भाई भतीजों के नाम ही किया है। समर्थकों को महज मुंगेरीलाल के हसीन सपने ही दिखाए जाते हैं ये वो समर्थक होते हैं जिनके जयकारे से स्वयंवर की परीक्षा में उम्मीदवार का हौसला अफजाई होता है। जितना तेजी से ये उम्मीवार की जय बोलते हैं पुरोहित के सामने उसकी उतनी ही इमेज बनती है। यह सच है कि ये सारे उम्मीदवार सिर्फ इमेज ही बनाने में लगे रहते हैं, मलाई तो कोई और खा जाता है।
इस समारोह का माहौल कुछ ऐसा होता है कि राजनैतिक खानदान भी इसकी रसमलाई को चख ही लेते हैं, वो उम्मीदवारी के लिए बोली लगवाते हैं, रायसुमारी करवाते हैं, यह देखा जाता है कि जातिगत, धर्मगत  कौन सा सदस्य खानदान की नाक कटाएगा नहीं, स्वयंवर में सत्ता के लिए वो अंतित दौर तक स्वयंवर से बाहर न होगा। कौन है जो साम दाम दंड भेद का प्रयोग करके सत्ता स्वयंवर में अपना परचम लहराएगा और खूँटा गाड़ेगा। कुल मिलाकर यह समझिये कि सिंहावलोकन करने के बाद ही स्वयंवर के लिए वर को सजाया जाता है। हालाँकि यह भी सच है कि सत्ता वो चंड़ी होती हैं जो अपने स्वयंवर में हासिल किए गए वर को आने वाले पाँच साल के जीवन में सिर्फ नचाती ही रहती है। नाच नाच कर वर स्वयंवर के इस सुख को भोगता रहता है। और पाँच साल के बाद सत्ता फिर तैयार खड़ी हो जाती है नई नवेली दुल्हन का मेकब करके  वर को भोगने हेतु। वर को यह महसूस होता है कि वो सत्ता सुख भोग रहा है, सत्ता को यह महसूस होता है कि वो वर सुख भोग रही है। और इस तरह दोनों का यह भ्रम सरकार रूपी वैवाहिक रथ को पाँच साल की अवधि तक पहुँचा ही देते हैं। रही सही कर समर्थकों रूपी मतदाता सिर्फ जय जयकार करने में ही लीन रहते हैं और उन्हें भी इस बात का भ्रम होता है कि वो भी सत्ता सुख नहीं भोग पा रहे तो क्या हुआ, कम से कम सत्ता सुंदरी का वर वधु आमंत्रण के माध्यम से दीदार करने का परमानंद तो प्राप्त हो रहा है। भौतिक ना सही तो मनोवैज्ञानिक सुख तो प्राप्त ही हो रहा है। पुरोहित इस बात के भ्रम में रहता है कि वर पक्ष के प्रतिद्वंदियों की वजह से यह पंचवर्षीय स्वयंवर कराने के लिए वो वर के राजनैतिक खानदानों, और पूर्व प्रेमियों के निर्दलीय छोटे परिवारों में सुख का रामराज्य व्याप्त कर पा रहा है। इसी तरह उसकी दक्षिणा भी उनकी झोली में चली जाती है।
इस स्वयंवर से एक प्रतिफल यह होता है कि हारे हुए वर उम्मीदवार अगले पाँच सालों के लिए सत्ता के पूर्व प्रेमी बनकर विभिन्न समारोहों में सत्ता की पतिव्रतत्व और पति की पत्नीव्रतत्व पर अफवाहों के बीज बोते रहते हैं, कभी कभी पति की कालगुजारियों पर परदा हटाने का काम, उसको बेवफा बनाने का दायित्व ये निर्वहन करते हैं, कभी कभी सत्ता इनकी बातों में आकर वैवाहिक कांटेक्ट खत्म कर देती है अन्यथा वो भी जानती है कि काहे की वफादारी और कितनी वफादारी,सब माया है इस माया में जब तक भोगना वरदान में मिला है तो भोगने का परमानंद उठाते रहो और आगे पाँच वर्ष के बाद उसे पति की दौलत तो मिलनी है और फिर वो दुल्हन की तरह सजेगी ही फिर को नए वर की तलाश में नये स्वयंवर को रचने ले किए और खानदान बदलकर नये स्वाद को चखने के लिए, कुल मिलाकर स्वादानुसार वर चयन की प्रविधि ही राष्ट्र को गतिशील बनाए हुए है। राष्ट्र कितना गतिशील है या विकसित हो रहा है यह तो मतदाता समर्थक, वर प्रतिद्वंदी, सत्ता सुंदरी, पति परमेश्वर, और पूर्वप्रेमी अपने अपने चश्में से देखते हैं, किसी को विकास स्थिर दिखता और किसी को विकास जेट विमान की रफ्तार से दिखता है। आइए इस स्वयंवर की यज्ञ पीठिका में आहुति देने चलें, उम्मीवार की जय जयकार करने कुछ आहुतियाँ दान करके महादानी कर्ण का तमका हाशिल करके आएँ।
अनिल अयान ,सतना
९४७९४११४०७