"गुरु नानक" से आलोकित सर्वधर्म सम्भाव का प्रकाश
"काहे रे बन खोजन जाई।/ सरब निवासी सदा अलेपा, तोही संग समाई॥१॥ / पुष्प मध्य ज्यों बास बसत है, मुकर माहि जस छाई। तैसे ही हरि बसै निरंतर, घट ही खोजौ भाई ॥२॥ बाहर भीतर एकै जानों, यह गुरु ग्यान बताई। जन नानक बिन आपा चीन्हे, मिटै न भ्रमकी काई॥३॥
जब गुरुनानक देव जी ने वर्ष 1496 में अपना पहली भविष्यवाणी किया – जिसमें उन्होंने कहा कि “कोई भी हिन्दू नहीं और ना ही कोई मुस्लमान है” और कहा कि यह एक महत्वपूर्ण घोषणा है जो ना सिर्फ आदमी के भाईचारा और परमेश्वर के पितृत्व की घोषणा है, बल्कि यह भी स्पष्ट है की मनुष्य की प्राथमिक रूचि किसी भी प्रकार के अध्यात्मिक सिधांत में नहीं है, वह तो मनुष्य और उसके किस्मत में हैं।" तब ही उनके अनुयाइयों ने जान लिया था कि भारतभूमि में एक नया आलोक अवतरित हुआ है। एक वह समय था और एक आज का समय है जब पाँच सौ पचास साल गुजर चुके हैं, और हमारा पड़ोसी बिना किसी शर्त के इस निर्णय मे आ गया कि इस अवसर पर करतारपुर कारीडोर इस पुण्य दर्शनार्थ खोलने में एक भी पल की देरी नहीं की, जो स्वागत योग्य था। और एक अच्छे पड़ोसी होने का संदेश भी था।
गुरुनानक देव जी को किसी भी धर्म की बंदिशों में नहीं बाँधा जा सका। क्योंकि उनके द्वारा दी गई शिक्षाओं को खुद कई धर्मों के स्वीकार किया। उनकी उदारता को देश विदेशों में पूज्य माना गया। उन्होंने अपने सिद्धांतो और नियमों के प्रचार के लिए अपने घर तक को छोड़ दिया और एक सन्यासी के रूप में रहने लगे। उन्होंने हिन्दू और मुस्लमान दोनों धर्मों के विचारों को सम्मिलित करके एक नए धर्म की स्थापना की जो बाद में सिख धर्म के नाम से जाना गया। इसी संदर्भ में उनके जीवन की कई घटनाओं से सीख लिया जा सकता है उसमें से पहली घटना जरा देखें जिसमें गुरु नानक देव, जब, लगभग 5 वर्ष के हुए तब पिता ने एक मौलवी के पास पढ़ने के लिए भेजा | मौलवी, उनके चेहरे का नूर देखकर हैरान रह गया | जब उसने गुरु नानक देव जी की पट्टी पर “ऊँ” लिखा, तब उसी क्षण उन्होंने “१ऊँ” लिखकर संदेश दे दिया कि ईश्वर एक है और हम सब उस एक पिता की सन्तान हैं | मौलवी, उनके पिता कालू जी के पास जा कर बोला कि उनका पुत्र तो एक अलाही नूर है, उसको वह क्या पढ़ाएगा, वह तो स्वयं समस्त संसार को ज्ञान देगा |भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हुई |
इसी तरह जब गुरू जी विभिन्न यात्राओं में या उदासियों में विभिन्न देशों की यात्रा कर रहे थे तभी एक एक घटना ने पूरे विश्व को एक सूत्र वाक्य दिया कि ईश्वर एक है और हर जगह विद्यमान है, जो सनातन धर्म में उद्धत किया गया है। इस घटना को एक सीख के रूप में देखा जा सकता है जिसमें गुरु नानक जी नें अपने मिशन की शुरुवात मरदाना के साथ मिल के किया। एक बार गुरु जी रात के समय काबे की तरफ विराज गए तब जिओन ने गुस्से में आकर गुरु जी से कहा कि तू कौन काफ़िर है जो खुदा के घर की तरफ पैर पसारकर सोया हुआ है? गुरु जी ने बड़ी नम्रता के साथ कहा, मैं यहाँ सरे दिन के सफर से थककर लेटा हूँ, मुझे नहीं मालूम की खुदा का घर किधर है तू हमारे पैर पकड़कर उधर करदे जिधर खुदा का घर नहीं है| यह बात सुनकर जिओन ने बड़े गुस्से में आकर गुरु जी के चरणों को घसीटकर दूसरी ओर कर दिया और जब चरणों को छोड़कर देखा तो उसे काबा भी उसी तरफ ही नजर आने लगा| इस प्रकार उसने जब फिर चरण दूसरी तरफ किए तो काबा उसी और ही घुमते हुआ नज़र आया| जिओन ने जब यहे देखा कि काबा इनके चरणों के साथ ही घूम जाता है तो उसने यह बात हाजी और मुलानो को बताई जिससे बहुत सारे लोग वहाँ एकत्रित हो गए| गुरु जी के इस कौतक को देखकर सभी दंग रहगए और गुरु जी के चरणों पर गिर पड़े| उन्होंने गुरु जी से माफ़ी भी माँगी| जब गुरु जी ने वहाँ से चलने की तैयारी की तो काबे के पीरों ने विनती करके गुरु जी की एक खड़ाव निशानी के रूप में अपने पास रख ली|
उन्होने अपने जीवन में वैसे तो बहुत से मत दिए जो धर्म संस्कृति की पृष्ठभूमि को परिभाषित करने के लिए काफी थी किंतु उनकी कुछ शिक्षाएँ उनके द्वारा धर्म, संप्रदाय, पंथ के लिए क्या विचार थे यह स्पष्त करने में काफी हैं, जिसमें, उन्होने सनातन मत की मूर्तिपूजा की शैली के विपरीत एक परमात्मा की उपासना का एक अलग मार्ग मानवता को दिया। उन्होंने हिंदू धर्म मे फैली कुरीतिओं का सदैव विरोध किया। उनके दर्शन में सूफीयों जैसी थी । साथ ही उन्होंने तत्कालीन राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक स्थितियों पर भी नज़र डाली है। संत साहित्य में नानक उन संतों की श्रेणी में हैं जिन्होंने नारी को बड़प्पन दिया है। वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के भारी समर्थक थे। धार्मिक सदभाव की स्थापना के लिए उन्होंने सभी तीर्थों की यात्रायें की और सभी धर्मों के लोगों को अपना शिष्य बनाया। उन्होंने हिन्दू धर्म और इस्लाम, दोनों की मूल एवं सर्वोत्तम शिक्षाओं को सम्मिश्रित करके एक नए धर्म की स्थापना की जिसके मिलाधर थे प्रेम और समानता। यही बाद में सिख धर्म कहलाया। भारत में अपने ज्ञान की ज्योति जलाने के बाद उन्होंने मक्का मदीना की यात्रा की और वहां के निवासी भी उनसे अत्यंत प्रभावित हुए। 25 वर्ष के भ्रमण के पश्चात् नानक कर्तारपुर में बस गये और वहीँ रहकर उपदेश देने लगे। उनकी वाणी आज भी ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ में संगृहीत है।
एक मूल दार्शनिक, योगी, गृहस्थ, धर्मसुधारक, समाज सुधारक, कवि, देशभक्त और विश्वबंधु के रूप में भी हम सब गुरुनानक देव को देख सकते हैं, उन्हें नानक से गुरु और गुरु से देव बनते महसूस कर सकते हैं, उनके जीवन के सिद्धांतो को वर्तमान संदर्भों में उपयोगिता को समझ सकते हैं। इनके उपदेश का सार यही होता था कि ईश्वर एक है उसकी उपासना हिंदू मुसलमान दोनों के लिये हैं। मूर्तिपुजा, बहुदेवोपासना को ये अनावश्यक कहते थे। हिंदु और मुसलमान दोनों पर इनके मत का प्रभाव पड़ता था। ईश्वर को अपने भीतर ढूंढो. कोई भी मनुष्य दुसरो को अपने से छोटा न समझे. सभी जातियां और धर्म समान है. ईश्वर को पाने के लिए किसी भी प्रकार का बाहरी आडम्बर बेकार है, सभी जाति, धर्म के लोग हो आखिरकार मानव ही तो हैं इसलिए मानव सेवा ही सबसे बड़ा उदार धर्म है, इसलिए उन्होने लंगर की शुरुआत की। एक कवि के रूप में नानक जी ने हुनर दिखाया, नानक जी सूफी कवि भी थे। उनके भावुक और कोमल हृदय ने प्रकृति से एकात्म होकर जो अभिव्यक्ति की है, वह निराली है। उनकी भाषा में फारसी, मुल्तानी, पंजाबी, सिंधी, खड़ी बोली, अरबी के शब्द समा गए थे। गुरबाणी में शामिल है- जपजी, सोहिला, दखनी ओंकार, आसा दी वार, बारह माह प्रमुख रचनाओं के भाग आज भी मौजूद हैं जो पाठ के रूप में किये जाते हैं। अंततः उनकी एक वाणी से अपने इस स्मरण को पूर्ण विराम देता हूँ कि-
हरि बिनु तेरो को न सहाई। काकी मात-पिता सुत बनिता, को काहू को भाई॥/
धरनी अरु संपति सगरी जो मानिओ अपनाई। तन छूटै कुछ संग न चालै, कहा ताहि लपटाई॥
दयाल सदा दु:ख-भंजन, ता सिउ रुचि न बढाई। नानक कहत जगत सभ मिथिआ, ज्यों सुपना रैनाई॥
ब पूरा विश्व इस महामानव की उपयोगिता और शिख धर्म को अनुसरण कर रहा है तो हिंदुस्तान के साथ पाक को तो पहल करना ही था। आइए इस प्रकाश पर्व को वैश्विक स्तर की आध्यात्मिकता तक पहुँचाएँ और अंतर्मन में गुनगुनाएँ।बोले सो निहाल सत श्री अकाल। जो व्यक्ति यह कहेगा कि ईश्वर ही अन्तिम सत्य है उसपर चिकालिक ईश्वर का आशीर्वाद रहेगा।
अनिल अयान,सतना
संपर्क ९४७९४११४०७
"काहे रे बन खोजन जाई।/ सरब निवासी सदा अलेपा, तोही संग समाई॥१॥ / पुष्प मध्य ज्यों बास बसत है, मुकर माहि जस छाई। तैसे ही हरि बसै निरंतर, घट ही खोजौ भाई ॥२॥ बाहर भीतर एकै जानों, यह गुरु ग्यान बताई। जन नानक बिन आपा चीन्हे, मिटै न भ्रमकी काई॥३॥
जब गुरुनानक देव जी ने वर्ष 1496 में अपना पहली भविष्यवाणी किया – जिसमें उन्होंने कहा कि “कोई भी हिन्दू नहीं और ना ही कोई मुस्लमान है” और कहा कि यह एक महत्वपूर्ण घोषणा है जो ना सिर्फ आदमी के भाईचारा और परमेश्वर के पितृत्व की घोषणा है, बल्कि यह भी स्पष्ट है की मनुष्य की प्राथमिक रूचि किसी भी प्रकार के अध्यात्मिक सिधांत में नहीं है, वह तो मनुष्य और उसके किस्मत में हैं।" तब ही उनके अनुयाइयों ने जान लिया था कि भारतभूमि में एक नया आलोक अवतरित हुआ है। एक वह समय था और एक आज का समय है जब पाँच सौ पचास साल गुजर चुके हैं, और हमारा पड़ोसी बिना किसी शर्त के इस निर्णय मे आ गया कि इस अवसर पर करतारपुर कारीडोर इस पुण्य दर्शनार्थ खोलने में एक भी पल की देरी नहीं की, जो स्वागत योग्य था। और एक अच्छे पड़ोसी होने का संदेश भी था।
गुरुनानक देव जी को किसी भी धर्म की बंदिशों में नहीं बाँधा जा सका। क्योंकि उनके द्वारा दी गई शिक्षाओं को खुद कई धर्मों के स्वीकार किया। उनकी उदारता को देश विदेशों में पूज्य माना गया। उन्होंने अपने सिद्धांतो और नियमों के प्रचार के लिए अपने घर तक को छोड़ दिया और एक सन्यासी के रूप में रहने लगे। उन्होंने हिन्दू और मुस्लमान दोनों धर्मों के विचारों को सम्मिलित करके एक नए धर्म की स्थापना की जो बाद में सिख धर्म के नाम से जाना गया। इसी संदर्भ में उनके जीवन की कई घटनाओं से सीख लिया जा सकता है उसमें से पहली घटना जरा देखें जिसमें गुरु नानक देव, जब, लगभग 5 वर्ष के हुए तब पिता ने एक मौलवी के पास पढ़ने के लिए भेजा | मौलवी, उनके चेहरे का नूर देखकर हैरान रह गया | जब उसने गुरु नानक देव जी की पट्टी पर “ऊँ” लिखा, तब उसी क्षण उन्होंने “१ऊँ” लिखकर संदेश दे दिया कि ईश्वर एक है और हम सब उस एक पिता की सन्तान हैं | मौलवी, उनके पिता कालू जी के पास जा कर बोला कि उनका पुत्र तो एक अलाही नूर है, उसको वह क्या पढ़ाएगा, वह तो स्वयं समस्त संसार को ज्ञान देगा |भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हुई |
इसी तरह जब गुरू जी विभिन्न यात्राओं में या उदासियों में विभिन्न देशों की यात्रा कर रहे थे तभी एक एक घटना ने पूरे विश्व को एक सूत्र वाक्य दिया कि ईश्वर एक है और हर जगह विद्यमान है, जो सनातन धर्म में उद्धत किया गया है। इस घटना को एक सीख के रूप में देखा जा सकता है जिसमें गुरु नानक जी नें अपने मिशन की शुरुवात मरदाना के साथ मिल के किया। एक बार गुरु जी रात के समय काबे की तरफ विराज गए तब जिओन ने गुस्से में आकर गुरु जी से कहा कि तू कौन काफ़िर है जो खुदा के घर की तरफ पैर पसारकर सोया हुआ है? गुरु जी ने बड़ी नम्रता के साथ कहा, मैं यहाँ सरे दिन के सफर से थककर लेटा हूँ, मुझे नहीं मालूम की खुदा का घर किधर है तू हमारे पैर पकड़कर उधर करदे जिधर खुदा का घर नहीं है| यह बात सुनकर जिओन ने बड़े गुस्से में आकर गुरु जी के चरणों को घसीटकर दूसरी ओर कर दिया और जब चरणों को छोड़कर देखा तो उसे काबा भी उसी तरफ ही नजर आने लगा| इस प्रकार उसने जब फिर चरण दूसरी तरफ किए तो काबा उसी और ही घुमते हुआ नज़र आया| जिओन ने जब यहे देखा कि काबा इनके चरणों के साथ ही घूम जाता है तो उसने यह बात हाजी और मुलानो को बताई जिससे बहुत सारे लोग वहाँ एकत्रित हो गए| गुरु जी के इस कौतक को देखकर सभी दंग रहगए और गुरु जी के चरणों पर गिर पड़े| उन्होंने गुरु जी से माफ़ी भी माँगी| जब गुरु जी ने वहाँ से चलने की तैयारी की तो काबे के पीरों ने विनती करके गुरु जी की एक खड़ाव निशानी के रूप में अपने पास रख ली|
उन्होने अपने जीवन में वैसे तो बहुत से मत दिए जो धर्म संस्कृति की पृष्ठभूमि को परिभाषित करने के लिए काफी थी किंतु उनकी कुछ शिक्षाएँ उनके द्वारा धर्म, संप्रदाय, पंथ के लिए क्या विचार थे यह स्पष्त करने में काफी हैं, जिसमें, उन्होने सनातन मत की मूर्तिपूजा की शैली के विपरीत एक परमात्मा की उपासना का एक अलग मार्ग मानवता को दिया। उन्होंने हिंदू धर्म मे फैली कुरीतिओं का सदैव विरोध किया। उनके दर्शन में सूफीयों जैसी थी । साथ ही उन्होंने तत्कालीन राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक स्थितियों पर भी नज़र डाली है। संत साहित्य में नानक उन संतों की श्रेणी में हैं जिन्होंने नारी को बड़प्पन दिया है। वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के भारी समर्थक थे। धार्मिक सदभाव की स्थापना के लिए उन्होंने सभी तीर्थों की यात्रायें की और सभी धर्मों के लोगों को अपना शिष्य बनाया। उन्होंने हिन्दू धर्म और इस्लाम, दोनों की मूल एवं सर्वोत्तम शिक्षाओं को सम्मिश्रित करके एक नए धर्म की स्थापना की जिसके मिलाधर थे प्रेम और समानता। यही बाद में सिख धर्म कहलाया। भारत में अपने ज्ञान की ज्योति जलाने के बाद उन्होंने मक्का मदीना की यात्रा की और वहां के निवासी भी उनसे अत्यंत प्रभावित हुए। 25 वर्ष के भ्रमण के पश्चात् नानक कर्तारपुर में बस गये और वहीँ रहकर उपदेश देने लगे। उनकी वाणी आज भी ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ में संगृहीत है।
एक मूल दार्शनिक, योगी, गृहस्थ, धर्मसुधारक, समाज सुधारक, कवि, देशभक्त और विश्वबंधु के रूप में भी हम सब गुरुनानक देव को देख सकते हैं, उन्हें नानक से गुरु और गुरु से देव बनते महसूस कर सकते हैं, उनके जीवन के सिद्धांतो को वर्तमान संदर्भों में उपयोगिता को समझ सकते हैं। इनके उपदेश का सार यही होता था कि ईश्वर एक है उसकी उपासना हिंदू मुसलमान दोनों के लिये हैं। मूर्तिपुजा, बहुदेवोपासना को ये अनावश्यक कहते थे। हिंदु और मुसलमान दोनों पर इनके मत का प्रभाव पड़ता था। ईश्वर को अपने भीतर ढूंढो. कोई भी मनुष्य दुसरो को अपने से छोटा न समझे. सभी जातियां और धर्म समान है. ईश्वर को पाने के लिए किसी भी प्रकार का बाहरी आडम्बर बेकार है, सभी जाति, धर्म के लोग हो आखिरकार मानव ही तो हैं इसलिए मानव सेवा ही सबसे बड़ा उदार धर्म है, इसलिए उन्होने लंगर की शुरुआत की। एक कवि के रूप में नानक जी ने हुनर दिखाया, नानक जी सूफी कवि भी थे। उनके भावुक और कोमल हृदय ने प्रकृति से एकात्म होकर जो अभिव्यक्ति की है, वह निराली है। उनकी भाषा में फारसी, मुल्तानी, पंजाबी, सिंधी, खड़ी बोली, अरबी के शब्द समा गए थे। गुरबाणी में शामिल है- जपजी, सोहिला, दखनी ओंकार, आसा दी वार, बारह माह प्रमुख रचनाओं के भाग आज भी मौजूद हैं जो पाठ के रूप में किये जाते हैं। अंततः उनकी एक वाणी से अपने इस स्मरण को पूर्ण विराम देता हूँ कि-
हरि बिनु तेरो को न सहाई। काकी मात-पिता सुत बनिता, को काहू को भाई॥/
धरनी अरु संपति सगरी जो मानिओ अपनाई। तन छूटै कुछ संग न चालै, कहा ताहि लपटाई॥
दयाल सदा दु:ख-भंजन, ता सिउ रुचि न बढाई। नानक कहत जगत सभ मिथिआ, ज्यों सुपना रैनाई॥
ब पूरा विश्व इस महामानव की उपयोगिता और शिख धर्म को अनुसरण कर रहा है तो हिंदुस्तान के साथ पाक को तो पहल करना ही था। आइए इस प्रकाश पर्व को वैश्विक स्तर की आध्यात्मिकता तक पहुँचाएँ और अंतर्मन में गुनगुनाएँ।बोले सो निहाल सत श्री अकाल। जो व्यक्ति यह कहेगा कि ईश्वर ही अन्तिम सत्य है उसपर चिकालिक ईश्वर का आशीर्वाद रहेगा।
अनिल अयान,सतना
संपर्क ९४७९४११४०७