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Friday, 22 February 2019

सत्ता स्वयंवर विवाह समारोह

सत्ता स्वयंवर विवाह समारोह
सत्ता फिर से दुल्हन बनने के लिए तैयार खड़ी है, चुनाव रूपी बारात की तिथि, चुनाव आयोग नामक पुरोहित ने विचार दिया। फिर से विधान सभा नामक ससुराल सजाई जा रही है। इस विवाह के स्वयंवर में सभी वर अपने अपने भाग्य को आजमाने के लिए मैदान में युद्ध स्तर की तैयारी कर चुके हैं। कई तो वर के रूप में सिद्ध होने के लिए वोटों की गणित के प्रमेय सिद्धि में देव और देवी द्वार माथा टेक रहे हैं कई सत्ता के पूर्व प्रेमी भी विरोध का बिगुल बजाकर हुंकार भर चुके हैं और ढंके की चोंट में कह रहे हैं, प्रेम सिद्ध ना हुआ तो स्वयंवर में सिद्धि तो प्राप्त हो ही सकती है। हाथ आजमाने में क्या जा रहा है। कुछ राशि ही तो जा ने वाली है। सबसे बड़ी बात यह है कि कई उम्मीदवार इस स्वयंवर में सम्मान निधि के नाम पर दान दक्षिणा में मिले हुए गरीबों के द्वारा चलने व ना चलने वाले सिक्के भी मटकों में भरकर ला रहे हैं। ताकि गड्डियों को इससे दूर रखा जाए। अन्य विवाह समारोह में वर पक्ष पार्टी अपनी आर्थिक सम्म्पन्नता का खूब बखान अतिशयोक्ति पूर्ण करते हैं। यहाँ तो उम्मीदवार इसमें में अन्योक्ति अलंकार का प्रयोग करते हुए बताते कुछ और हैं और होता कुछ और....। उन्हें इस बात की भरपूर डरावनी आशा होती है कि कहीं आयोग पुरोहित उनकी चल अचल संपत्ति को काला धन की श्रेणी में लाकर स्वयंवर से उनका पत्ता साफ न कर दे। सबसे बड़ी मजेदार बात यह है कि पुरोहित को जिस तरह के मंत्रों का उच्चारण करना होता है वो जानता है कि पूर्व प्रेमी उम्मीदवार के लिए कौन सा मंत्र बाँचना है और वधु प्राप्ति के लिए ताजे उम्मीदवार के लिए कौन सा मंत्र बाँचना है।
इस बार के विवाह समारोह में पुरोहित ने उम्मीदवारों की खर्च सीमा का आधार कार्ड़ और बैंक अकाउंट से सीधा संबंध स्थापित कर लिया है। सभी संवाददाताओं को सख्त आदेश है कि वो हर जगह के उस उम्र के सभी उम्मीदवारों को यह निमंत्रण पत्र भी हल्दी चावल लगाकर दिया जाए ताकि थोक का थोक स्वयंवर की परीक्षा आयोजित किया जा सके। पुरोह्ति को सत्ता सुख भोगने के लिए और संतानोत्पत्ति हेतु उचित वर खोजने में प्रायिकता का सिद्धांत भी सही सिद्ध हो सके। वर पक्ष के उम्मीदवारों की राजनैतिक परिवार भी इस स्वयंवर में ऐसे लिप्त हैं जैसे उम्मीदवार को नहीं बल्कि उनके परिवार के हर सदस्य को शहनशाह की पदवी मिलना तो तय ही है और हुकूमत करने का मौका रखा रखाया है। इस स्वयंवर का उत्सव इतना ज्यादा उत्साह जनक है कि पुरोहित और उसने शिष्य़ गण भी इस स्वयंवर विवाह को सम्मपन्न कराने के लिए सत्ता के मायके के घराती बने हुए हैं। इस अवसर पर गाहे बगाहे, निमंत्रण पत्र के साथ साथ, सोमरस, और सम्मोहित करने हेतु मुद्रा अंतरण तक चलाया जा रहा है। इस समारोह की खासियत यह भी है। उस उम्र के हर व्यक्ति को मजबूरी वस स्वयंवर में उम्मीदवार का समर्थन करने जाना ही है। इस यात्रा करने वाले व्यक्ति को हम मतदाता के नाम से जानते है। वैसे तो वो समर्थन करता है और उम्मीवार को स्वयंवर में सफलता की कामना अपनी मजबूरी और स्वार्थवश करता है। किंतु वो जानता है कि सत्ता सुख भोगने का वरदान मात्र पुरोहित ने वर और उसके राजनैतिक परिवार वाले भाई भतीजों के नाम ही किया है। समर्थकों को महज मुंगेरीलाल के हसीन सपने ही दिखाए जाते हैं ये वो समर्थक होते हैं जिनके जयकारे से स्वयंवर की परीक्षा में उम्मीदवार का हौसला अफजाई होता है। जितना तेजी से ये उम्मीवार की जय बोलते हैं पुरोहित के सामने उसकी उतनी ही इमेज बनती है। यह सच है कि ये सारे उम्मीदवार सिर्फ इमेज ही बनाने में लगे रहते हैं, मलाई तो कोई और खा जाता है।
इस समारोह का माहौल कुछ ऐसा होता है कि राजनैतिक खानदान भी इसकी रसमलाई को चख ही लेते हैं, वो उम्मीदवारी के लिए बोली लगवाते हैं, रायसुमारी करवाते हैं, यह देखा जाता है कि जातिगत, धर्मगत  कौन सा सदस्य खानदान की नाक कटाएगा नहीं, स्वयंवर में सत्ता के लिए वो अंतित दौर तक स्वयंवर से बाहर न होगा। कौन है जो साम दाम दंड भेद का प्रयोग करके सत्ता स्वयंवर में अपना परचम लहराएगा और खूँटा गाड़ेगा। कुल मिलाकर यह समझिये कि सिंहावलोकन करने के बाद ही स्वयंवर के लिए वर को सजाया जाता है। हालाँकि यह भी सच है कि सत्ता वो चंड़ी होती हैं जो अपने स्वयंवर में हासिल किए गए वर को आने वाले पाँच साल के जीवन में सिर्फ नचाती ही रहती है। नाच नाच कर वर स्वयंवर के इस सुख को भोगता रहता है। और पाँच साल के बाद सत्ता फिर तैयार खड़ी हो जाती है नई नवेली दुल्हन का मेकब करके  वर को भोगने हेतु। वर को यह महसूस होता है कि वो सत्ता सुख भोग रहा है, सत्ता को यह महसूस होता है कि वो वर सुख भोग रही है। और इस तरह दोनों का यह भ्रम सरकार रूपी वैवाहिक रथ को पाँच साल की अवधि तक पहुँचा ही देते हैं। रही सही कर समर्थकों रूपी मतदाता सिर्फ जय जयकार करने में ही लीन रहते हैं और उन्हें भी इस बात का भ्रम होता है कि वो भी सत्ता सुख नहीं भोग पा रहे तो क्या हुआ, कम से कम सत्ता सुंदरी का वर वधु आमंत्रण के माध्यम से दीदार करने का परमानंद तो प्राप्त हो रहा है। भौतिक ना सही तो मनोवैज्ञानिक सुख तो प्राप्त ही हो रहा है। पुरोहित इस बात के भ्रम में रहता है कि वर पक्ष के प्रतिद्वंदियों की वजह से यह पंचवर्षीय स्वयंवर कराने के लिए वो वर के राजनैतिक खानदानों, और पूर्व प्रेमियों के निर्दलीय छोटे परिवारों में सुख का रामराज्य व्याप्त कर पा रहा है। इसी तरह उसकी दक्षिणा भी उनकी झोली में चली जाती है।
इस स्वयंवर से एक प्रतिफल यह होता है कि हारे हुए वर उम्मीदवार अगले पाँच सालों के लिए सत्ता के पूर्व प्रेमी बनकर विभिन्न समारोहों में सत्ता की पतिव्रतत्व और पति की पत्नीव्रतत्व पर अफवाहों के बीज बोते रहते हैं, कभी कभी पति की कालगुजारियों पर परदा हटाने का काम, उसको बेवफा बनाने का दायित्व ये निर्वहन करते हैं, कभी कभी सत्ता इनकी बातों में आकर वैवाहिक कांटेक्ट खत्म कर देती है अन्यथा वो भी जानती है कि काहे की वफादारी और कितनी वफादारी,सब माया है इस माया में जब तक भोगना वरदान में मिला है तो भोगने का परमानंद उठाते रहो और आगे पाँच वर्ष के बाद उसे पति की दौलत तो मिलनी है और फिर वो दुल्हन की तरह सजेगी ही फिर को नए वर की तलाश में नये स्वयंवर को रचने ले किए और खानदान बदलकर नये स्वाद को चखने के लिए, कुल मिलाकर स्वादानुसार वर चयन की प्रविधि ही राष्ट्र को गतिशील बनाए हुए है। राष्ट्र कितना गतिशील है या विकसित हो रहा है यह तो मतदाता समर्थक, वर प्रतिद्वंदी, सत्ता सुंदरी, पति परमेश्वर, और पूर्वप्रेमी अपने अपने चश्में से देखते हैं, किसी को विकास स्थिर दिखता और किसी को विकास जेट विमान की रफ्तार से दिखता है। आइए इस स्वयंवर की यज्ञ पीठिका में आहुति देने चलें, उम्मीवार की जय जयकार करने कुछ आहुतियाँ दान करके महादानी कर्ण का तमका हाशिल करके आएँ।
अनिल अयान ,सतना
९४७९४११४०७

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