तेरा "दीप" जले.. मेरा "दिल"
बाजार में ज्योतिकलश छलक रहा, पूरा बाजार दीवाली की ज्योति और स्वर्ण हीरे जवाहरातों के आभूषणों से पटा पड़ा है, एक दुकानदार के पूरे परिवार वाले भी अलग अलग दुकानों को लगाकर सड़क के अतिक्रमण में अपना हाथ बंटा रहे हैं। देश की आवो हवा को देखकर यही लग रहा है कि देश की गरीबी इस ज्योति कलश की चमक से खत्म हो चुकी है। मँहगाई लक्ष्मी के वाहन के गठजोड़ करके प्रसन्नचित्त जीवन व्यतीत करने लग गई है। इस समय चुनावों के मौसम में किसी की अमावस है और किसी की पुरमासी है। सब अपनी अपनी गणित में व्यस्त हैं। कोई रुपयों की गणित में व्यस्त है, कोई वोटों की गणित में व्यस्त है, कोई सीटों की गणित में व्यस्त है। कोई लक्ष्मी और गणेश की पूजा और उसके मुहुर्त में पंचक की गणित में व्यस्त है। कुल मिलाकर इस बार की दीवाली का जश्न खट्टा मीठा हो रहा है। इन सबके चलते सबसे ज्यादा मरन कर्तव्य निष्ठ और समय सापेक्ष विश्वासपात्र सरकारी कर्मचारियों की है, पुलिस वालों की ड्यूटी गली कूचें से लेकर किसी भी अधिकारी और आलाकमान अधिकारी, और मेलों बाजारों में लगा दी जाती है, शांति व्यवस्था को सुधारने का जिम्मा जैसे इसी पलटन के हाथों में सौंप दिया गया है। प्रशासन हर बात की जागरुकता चलाएगा किंतु कभी शांति सौहार्द की जागरुकता नहीं चलाता है, त्योहारों में कायदे से इसकी भी मुहिम गली चौराहों से हर जगह तक पहुंचना चाहिए। पर पुलिस वालों की दीवाली खराब करने का श्रेय दीवाली को जाता है, इस बार तो हद तब हो गई जब उन सरकारी बाबुओं की ड्यूटी चुनावी प्रोटोकाल में लग गई जिनको महीने का वेतन बनाना था, इस बार तो राजस्व विभाग ही बिना वेतन के दीवाली मनाने वाला है, कुल मिलाकर दिलजले प्रकार के ये कर्मचारी मरता क्या न करता वाली स्थिति में चुनावी बिगुल की तैयारी में चाक चौबंद व्यवस्थापक बने हुए हैं।
हमारे देश का यह सौभाग्य रहा है कि यहाँ पर अमीरी गरीबी की खाईं इतनी ज्यादा गहरी है कि जितना पाटो, उतना बढ़ती है, अमीरी को सरकारी आरक्षण प्राप्त है, और गरीबी को समान्य वर्ग का अनारक्षण खाए जा रहा है, देश ग्रीन पटाखों का घोष कर रहा है, पटाखे बनाने वाली कंपनियां इस चिंता में सूखी जा रही हैं कि कौन सा बारूद डाला जाए कि पटाखे ग्रीन हो जाए, प्रदूषण को उनकी भनक भी न पड़े, दिल्ली का प्रदूषण भी इन्हीं ग्रीन पटाखों की वजह से इंद्रप्रस्थ बन जाए तो कितना अच्छा हो, जिस प्रकार ईद मिलन, दशहरा मिलन, होली मिलन का क्रेज है उसी तरह दीपावली मिलन का समारोह क्यों नहीं गतिशील हो रहा यह सोचता हूँ, तब जाकर बड़ी मुश्किल से उत्तर मेरे कदमों में आकर नतमश्तक हो जाता है कि सभी समुदाय धनतेरस में हीरे जवाहरात खरीदने, पटाखे फोड़ने, गणेश जी की को याद करने के बहाने लक्ष्मी को बचाने और लक्ष्मी को तिजोड़ी में कैद करने में व्यस्त हैं, वो सोचते हैं, कि धन तेरस से छोटी दीवाली तक चलने वाले इस त्योहार में कही किसी दिन माता लक्ष्मी रिसा करके वापिस न चली जाए। यह हमारे देश का गौरव है कि जो गरीब मोमबत्ती, रुई की बातियाँ, फूलों की लडियाँ, और भी पूजा में आने वाली नैसर्गिक चीजें आमजन के लिए लेकर आता है उसका परिवार खुद सड़क में दुकानदार बना क्रय विक्रय की राजनीति में व्यस्त है। पटाखों, और बमों की अनुनाद से भरपूर इस समाजिक व्यवस्था में इनकी स्थिति कभी नहीं सुधरी, ना सुधरेगी, फुटपाथ में लगाने वाले ये मौसमी दुकानदार अपनी दीवाली तो अपना सामान बेंचकर तथा लाई रिवड़ी दाना के साथ मना लेते हैं, आम मंदिर मठों, और चौराहों में घरों से बेघर किए गए उन बुजुर्गों की दीवाली सिर्फ दिल जलाकर ही होती है, जिनके वारिश उनको लावारिश बनाकर वृद्धाश्रमों, अस्पतालों के दरवाजों, कहीं नही तो मंदिरों और मठों के प्रांगणॊं में भक्त गणों के प्रसादों और उतरन, से जीवन यापन करने के लिए मजबूर बनाते हैं।
वर्तमान की दीवाली तो ई गिफ्ट्स, ई शॉपिंग और आन लाइन मार्केटिंग से लबालब सराबोर है, लिंक, और वन टाइम पासवर्ड के माध्यम से ये कंपनियों के नुमाइंदे दीपावली में बाजार तक ना सही आपके घर तक सीधे अच्छे दिन लाने के लिए तत्पर हैं. एक आफिस में कम्प्यूटर की कीबोर्ड में व्यस्त युवाओं की फौजी अंगुलियाँ देश की अधिकांशतः स्थानों को अपने उतसवी माहौल से प्रभावित करने के लिए लालायित हैं,उनके लिए दीवाली उनका, प्रमोशन, इंसेंटिव, और उनका फारेनट्रिप है, उनके लिए गणेश लक्ष्मी की पूजा, और प्रसाद वितरण इतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि उनका दिया जाने वाला टारगेट।अधिक्तर मल्टीनेशनल कंपनी में बहुत से युवा तो सिर्फ अपनी जिंदगी को दीवाली होली के त्योहारों को टारगेट पूरा करने में खपा रहे हैं, अगर टारगेट न पूरा हो तो छुट्टीयाँ भी कैंसिल हो जाती है। अपने रिस्क में छुट्टियाँ नौकरियों से छुट्टियों की फुलझडियाँ जलाने के लिए काफी होती हैं, युवाओं की एक फौज तो राजनैतिक पार्टियों की आटी सेल में माब लिंचिंग और इल्यूजन को तमराज किलविस की तरह फैलाने वाले रस्सी बमों के साथ खुश हैं, थोड़ा बहुत मेहनत, हुनर को एक तेज रफ्तार देने वाला यह अवसरवादिता उनकी बेरोगारी के रोजगार का प्रसाद तो बन ही जाता है। यह प्रसाद निश्चित ही संतुष्टि की मिलावटी मिठास देने का कार्य जरूर करता है।
किसानों की दिया दिवारी तो फसलों में बालियाँ देखकर ही होती है, गाँव की माटी के सुगंधित दिए, फसल के दानों से तैयार की गई रंगोलियाँ, दीवाली के अवसर पर गाए जाने वाली लोक गीत की भीनी भीनी महक, लोकनृत्य की ढोलक और मंजीरे के साथ तेज रक्त से समान प्रवाहित करने वाली तीव्रता अब बंजर सूखी धरती के घावों और कर्ज के साथ आत्महत्या के लिए प्रेरित होती आत्माओं की त्रासद जिंदगी से विलुप्त सी हो गई है। गांवों की राजनीति चिंतजनक है, किसानी करने वाले धीरे धीरे मजदूरी,बंधुआगिरी, अन्य व्यवसाय के प्रति सरकारी आश्वासन,और दलालों की गिरफ्त में आकर दिया दिवारी सब पर भारी वाली कहावतों को चरितार्थ करते नजर आते हैं। यह है कि जय जवान जय किसान, कृषि प्रधान देश की परिकल्पना करने वाला भारत देश अब कलाम के इंडिया ट्वेंटी, ट्वेटी वाले उद्देश्यों को पूरा करने लायक नहीं बचा, अब दीवाली ही नहीं अन्य त्योहारों का चरित्र राष्ट्र चरित्र होने की बजाय धर्म उपदेशी चरित्र के रूप में उजागर होने लगा है। समाज की विशंगतियों ने धर्म पंथ और संप्रदाय गत विद्वेश पैदा कर दिया है। मीडिया में धर्म विध्वंशक हाइपोथेटिकल समाचारों के चलते तिथ त्योहारों को भी संदेहात्मक नजरिए से टीआरपी बढ़ाने वाले फैक्टर के रूप में बेंचा जा रहा है। समाज की वो सौहार्द वाली दीवाली दलगत हो गई है। दीवाली के जरिए अब ऐश्वर्य , वैभव, चातुर्यता, और संपन्नता को महिमामंडित किया जा रहा है, जैसे जैसे नैसर्गिकता खत्म हो गई वैसे वैसे प्रदूषण भी बढ़ गया, बनावटी धूल धक्कड़ वाले हवन में राख बनकर उडने वाली दुर्गंध में वो महक कहाँ जो औषधीय गुण से लिप्त होती थी और पूरे वातावरण को स्वस्थ बनाने का काम करती थी। बाजार में बैठा हर नागरिक तिथ त्योहारों में बाजार की गिरफ्त में आ चुका है। घरेलू सामग्रियों से परे वो सेंथेटिक समानों पर आधारित हो चुका है।
दीवाली की इन पंद्रह दिवसीय परंपरागत रीति रिवाजों की घर वापसी बहुत आवश्यक है, समय के साथ पाश्चात्य भाव से दीवाली की रासायनिक चमक प्राकृतिक जीवन शैली को बद रंग बनाने के लिए दोषी होती है। खान से लेकर पान तक मिलावटी सामग्रियों के रूप में विषैला हो चुका है,ग्रामीण तो बहुत ठीक स्थिति में है जो वो प्रकृति के कुछ तो नजदीक है, अट्टालिकाओं में दीवाली के बमों और पटाखों की धमक जीवन को बहरा बना रहा है, बीमारियों के दरवाजे में खड़ा कर दिया है। हम दिलों दिमाग को सही रखने की दवा लेते रह जातेहैं, किंतु जीवन भर जिंदादिल बनने से परहेज करते हैं। आंतरिक करुषता को दूर करके पारदर्शिता पूर्ण जीवन जीने की रीति का दीपक जलाने की आवश्यता है। संबंधों की बाती को ज्योतित कर प्रेम प्रवाहित करने की आवश्यकता है। हर इशान की महत्ता को समझकर अपने जीवन में उसके स्थान को बनाए रखने की आवश्यकता है।अपने आसपास भी अमीर गरीब की खाई को पाटने और सभी को अपने साथ लेकर त्योहार मनाने की आवश्यकता है। इसके लिए हमें किसी मुहुर्त की जरूरत नहीं बल्कि अपने अंतस के मुहुर्त को पहचानने की जरूरत है। किसी भी तरह सही कम से कम उनके घर भी दीपक जलाकर देखिए जिनके घर में उजियारा फैलने से इसलिए घबड़ाता है कि कहीं वो अछूत न घोषित हो जाए।
अनिल अयान
९४७९४११४०७
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