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Friday, 16 March 2018

गिरिगिटिया साहित्यकार

गिरिगिटिया साहित्यकार
सृष्टि ने जब साहित्यकारों को पैदा किया। तो उसने यह सोचा कि साहित्यकार अगर चिंता करेगा तो चिंतन करने का समय नहीं प्राप्त कर पायेगा। इसलिए चिंता में चिंतन करने का दायित्व साहित्यकार के खाते में चला गया। जिस प्रकार साल भर में छः ऋतुए होतीहैं। इन छ ऋतुओं के अनुरूप प्रकृति का मिजाज बदलता है उसी तरह साहित्यकार नामक जीव का मिजाज भी इसी प्रकृति के अनुरूप बदलने लगा। इसी प्रकृति के अनुरूप साहित्यकार ने भी कभी कभी आपदा लाने की चेष्ठा की इसे प्राकृतिक आपदा की भांति साहित्यिक आपदा का नाम दिया गया। कई साहित्यकारों ने समय,समाज,अनुभव के अनुरूप अपने वास्तविक रंग को बदलने की कोशिश की, कुछ इस कोशिश में डार्विन के प्राकृतिक चयन के सिद्धांत को हू ब हू लागू किया और दौड़ में सबसे आगे चयनित रूप से खडे मिले, ऐसे साहित्यकार छपासरोगी साहित्यकारों की तुलना में अपने कुछ साहित्यिक अंगो का विकास इस तरह किया कि लेमार्क ने उपयोगिता और अनुपयोगिता का सिद्धांत उनके साहित्यिक जीवन को चरितार्थ कर दिया।
इस तरह के साहित्यिक रंग बदलने वाले साहित्यकार साहित्य की विरादरी के झंडावरदार बन बैठे या यह कहा जाए कि झंडावरदार होने का भ्रम पाल लिया। इस भ्रम ने इनकी उम्र के अनुरूप इन्हें हमेंशा रंगीन बनाए रखा, इनका स्थानीयता से ताल्लुकात उतना ही था जितना कि मंच में स्थित कुर्सी और माइक के सामने वाले विघ्नसंतोषी वक्ता का होता है। इस तरह के विशेष प्रजाति के साहित्यकार साहित्य कर्म में कम निपुण और राज कर्म में पूर्णतः निपुण हो गए और क्यों न हों आखिरकार इन्हें अपनी झंडावरदारी को बरकरार रखना था। इनकी आत्मस्लाघा इतनी ज्यादा रही कि अपने साहित्य कर्म की प्रशंसा अपने हम उम्र प्रशंसकों से ही लिखवाई जाती रही समय समय पर पत्र पत्रिकाओं में भेजा जाता रहा और इंतजार किया जाता रहा कि कब वह अंक नजरों के सामने हो और आत्मसुख प्राप्त किया जा सके। यह तो स्वाभाविक है कि जब साहित्यकर्म की प्रशंसा ही लिखी जाएगी तो दबाव वश कोई प्रशंसक ऐसे साहित्यकारों के विरोध में लिख कर बैठे बिठाए बैर क्यों भंजाएगा। ऐसी स्थिति में यह देखा गया कि अगर कोई स्थानीय संपादक ने उस प्रशंसा को अपनी पत्रिका का हिस्सा बना लिया, राष्ट्रीय सुख के पहले ही खतरे की घंटी छाप कर बजा दिया तब तो स्थानीय स्तर पर ऐसे साहित्यकारों को ही फुस्स बोलना पड़ गया। तब तो ऐसे साहित्यकार तिलमिला जाते हैं क्योंकि ऐटम बंब की प्राकृतिक आपदा फैलाने वाले वे आपदा लाने से पहले ही फुस्सी बंब की तरह लोकल में कैसे आगए। यह तो उनका राष्ट्रीय अपमान है। इस राष्ट्रीय अपमान का बदला राष्ट्रीय पत्रिका के प्रकाशन के पश्चात ही लिया जाता है।
ऐसे साहित्यकार सामान्यतः मुखौटों के सौखीन होते है,  क्योंकि बिना मुखौटों के कही वास्तविक रंग अगर दिख गया तो साहित्यिक विरादरी में बिन बात के ही थू थू हो जाएगी, कभी गुस्से का मुखौटा, कभी निवेदन का मुखौटा, कभी वैर का मुखौटा, कभी मौन का मुखौटा, कभी व्यंग्य का मुखौटा इस श्रेणी के मुखौटे के रूप में उपयोग लाए जाते हैं। इन मुखौटो के मोह में ना जाने कितने नवोदित चमचे फंसते चले जाते हैं। इन साहित्यकारों की अपनी जमात होती है, ये संस्कारी ऐयाश होते है, ऐयाशी भी संस्कार देखकर करने में ये माहिर होते हैं, इनके मुँह में राम बगल में छुरी होती है, ये अपने ऊपर अनुसंधान तक करवाने के लिए लालायित होते हैं, जिसे पेड अनुसंधान भी कहा जा सकता है। ऐसे साहित्यकारों को नेपथ्य में दम घुटता है, इनको चांदनी रात की दूध सी नहाई रोशन बहुत प्रिय होती है, वैसे ऐसे साहित्यकार साहित्यिक चाणक्य की प्रतिध्वनि होते है, ये साहित्यकार कोपलों का स्वागत तो करते हैं परन्तु इन कोपलों को सहलाते सहलाते इनकी नीयत इनको ही धोखा देने लगती है। ऐसे साहित्यकारों को गुरुडम से विशेष लगाव होता है। ऐसे साहित्यकार अपने आचरण छूने वालों में स्नेह लट्ठ बरसाते हैं, चरण छूने वालों को स्नेह बरसाते हैं, हमारा देश का साहित्य का औसतन आधा हिस्सा इन्ही साहित्यकारों की सेवा की वजह से फल फूल रहा है। ऐसे साहित्यकारों की गुरुआई जहां देखो वहीं शुरू हो जाती है। ये साहित्यकार गजब का बोलने में तो माहिर होते हैं किंतु अजब का लिखते हैं।इन साहित्यकारों में प्रशंसा की डाइबिटीज, छपास रोग का ब्लड प्रेसर, कार्यक्रमों के मुख्य अतिथि का कैंसर, और सम्मान का एड्स जैसी लंबी बीमारी होती हैं। उम्र के साथ ये बीमारी इन साहित्यकारों के रंग और मिजाज को झेलाऊ बनाने का काम करती हैं। इस झेलाऊ मिजाज के चलते ये अकेलेपन के शिकार हो जाते हैं, यह शिकारी इन्हें साहित्यिक दीवालिया बना देता है, ये नया लिखने की बजाय पुराने लिखे, छपे, पर ही मंत्रमुग्ध होते रहते हैं, यह मंत्र मुग्धता इनकी साहित्यिक पागलपंथी की पक्की सुबूत हो जाती है। अंततः समय के न्यायालय में इनका मूल्यांकन शून्य हो जाता है, क्योंकि इनके अंदर साहित्यिक आत्मचिंता की काई जमा हो चुकी होती है इसकी वजह से मनो वैज्ञानिक और समाजिक रूप से साहित्य के दोषी करार होकर इन्हें रंग बदलते समय के अनुरूप धूल की परतें चढवा कर चुनवा दिया जाता है। ऐसे धूल की परतो के बीच चुने गिरिगिटिया साहित्यकारों को मेरी आने वाले पुस्तें बारंबार प्रणाम करेंगी।
(यह किसी साहित्यकार के व्यक्तिगत साहित्यिक जीवन का मूल्यांकन नहीं हैं।)
अनिल अयान

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