व्यंग्य रंग
बदलने की होली......
फगुआ आ
गया मित्रों फिर से, होली का त्योहार हर वरष ही अपने रंग में सभी को रंगने आता है.हम
अपनी परंपरा के अनुरूप होलिका दहन करके अगले दिन धुरेणी खेलने को काफी उत्साहित रहते
हैं. इस बार जब मै होलिका दहन के समय पर होली सेंकने नजदीक गया तो ऐसा लगा कि होलिका
दो बारा प्रह्लाद को लेकर जलती लकडियों के बीच से निकल मेरे सामने आखडी हुई.मै सकते
में आगया... मेरे मुह से अचानक निकला- मैने आपको पहचाना नहीं. उसने कहा- अयान रंग लगाने
वालों से डर नहीं लगता साहब,रंग बदलने वालों से लगता हैं.. मै होलिका हूं... क्या तुम
लोग मुझे हर साल इस फगुआ के दिन जलाते हो.. क्या मै तुम लोगों की रिस्ते में कुछ नहीं
लगती... माना कि मैने एक बार इतिहास में प्रह्लाद को लेकर अपनी चिता में खुद जली थी.
पर उसकी सजा तो आप सब हर बार मुझे देते है. उस सनातन काल से आज तक हर साल मुझे जला
कर खुशी मनाते है... मैने कहा यह तो परंपरा है हमारे धर्म की. तुमने जो कृत्य किया
था उसका पश्चाताप करके सम्पूर्ण मानव समाज प्रसन्न होता है.
वो तपाक से बोल उठी,क्या बकवास करते हो अयान,तुम
नहीं जानते क्या. हर साल होली में हम अपने घर को पवित्र करते हैं. नजर उतारने का ढोंग
करते हैं और जाकर मेरी चिता में डाल आते है. मेरे साथ तो राई आटा और नमक मिर्च जल जाता
है. परन्तु क्या बुरी नजर से अपने परिवार को बचा पाते है. क्या हमारे परिवार, समाज,
देश में प्रेम बना रहता है. हमारे जैसे ना जाने कितनी होलिका कितने घरों में छिपी बैठी
हैं. क्या उनकी चिता सजती है. शायद नहीं. आज के समय में तो सब मौसम की तरह बदल रहे
है, देश का माहौल बदल रहा है. आज कल लोग रंग खेलते नहीं बल्कि बदल लेते है. लोगों के
रंग बदलने की कला के सामने गिरगिट भी शरमा
जाते है. मै उसके तर्क से अवाक रह गया. मै चुपचाप उसकी बातें सुनने के लिये विवश था...
वो बोलते बोलते एमोशनल हो गई उसकी पलकें भीग गई... वो रोने लगी और बोली- अब किस होली
की बात करते हो... आज कल कहां कोई होली मनाता है. सब अपने अपने काम धाम मे व्यस्त हैं.
भाभियों को देवरों से बात करने में शर्म आती है क्यों कि कहीं देवरानी प्रश्न चिन्ह
ना खडा कर दे, और जीजा साली की बात ही ना करो.. जीजा तो सालियों को अपनी घर वालियों
से ज्यादा ही प्यार करने लग गये है, जीजा यदि साली को रंग लगाता है तो बीवी को शक हो
जाता है कि.. जीजा कोई गलत हरकत करके मजा ना लेले... हर रिस्ते में रंग बदलने की तेज
प्रक्रिया जारी है... वो पुरानी आनंददायी होली की विरासत को भी तुम सब ने होलिका दहन
कर दिया है... आज के समय में जीजा मजे लेने के लिये इंटर नेट में सालियों की खोज करते
रात भर बिजी होते हैं.. और भाभियां स्मार्ट फोन में खींची गई सेल्फी से हजारों देवरों
के साथ अपनी रास लीला करने में व्यस्त होती हैं.
पलाश और
टेशू तो फगुआ के नाम से पहले खिल जाते थे... हंसी खुशी फाग गाते थे और होरियारे गाने
बजाने और पीने पिलाने का सुरूर लिये गांव गांव घूमते फिरते थे. पर आज के समय में फेसबुक
और व्हाट्स अप में तुम लोगों का होली का त्योहार सिमट गया है. फाग गाने वाले गांवों
में रहे नहीं.... हां सुबह से शहरों में शराब के नशे में धुत युवा साथी तेज डीजे की
धमक में होली का मजा लेते हैं.... अब तो लगता है कि रंग लगने के लिये तरस रहे हैं..
देश में ऐसा रंग चढा है कि वो कालिख बन गया है....देश को होली का इंतजार ही नहीं करना
पडता.. इतने लोग है कि समय समय पर देश का रंग बदलने में वो कभी पीछे नहीं हटते हैं.
कभी कन्हैया लाल की जय होती है... कभी भारत माता की जय पर पूरा देश बवाल मचाता है...
कभी भारत पाक के रंग में कराची में रंगा नजर आता है तो कभी पेशावर पाकिस्तान के आतंकी
रंग में रंग जाता है. कभी नमो नमो का रंग विदेश में चढता है.. तो बिहार और दिल्ली में
नमो नमो की घुल जाती है. नेता तो साल भर होली मनाते है.... मै उसकी हर बात को बहुत
ही ध्यान से सुनता रहा.. मै समझ गया था कि वो आज होली के न्यायालय में न्यायाधीश के
रूप में खडी है और मेरी पेशी हो रही है.. उसकी हर बात खुद में एक व्यंग्य है. वो बोली-
पहले तो फिल्मो के गाने भी होली की याद दिलाते थे होली में जब वो गाने बजते थे तो बूढों
को भी जवानी का एहसास होने लगता था.. आज के समय में गाने तो ऐसे हैं कि त्योहार कम
और ग्लैमर ज्यादा दिखाई देता है वो ग्लैमर जिसको देख कर युवा तो युवा बच्चों तक की
लार टपकने लगे.
किसानों
की होली तो उसी दिन तो जल जाती है जिस दिन गेहूं और धान की बालियां मौसम के रंग बदलने
दम टोड दी थी.. अब सोचने वाली बात यह है कि तुम लोग किस लिये होली मनाते हो. रंग फीके
पड गये हैं... आज के समय मे होली के रंगों की जरूरत ही नहीं है... मै तो हर साल जलकर
राख हो जाती हूं. पर तुम लोग अपने अंदर की होलिका को भी जलाने की कोशिश करों. यदि सभी
उसे जला ले गए तो होली में इस बार ज्यादा मजा आयेगा... वो अपनी मुट्ठी में गुलाल और
अबीर को मेरी तरफ उछाल कर वापिस चली गई. . तभी होरिया में उडे रे गुलाल... और रंग बरसे
भीगे चुनर वाली जैसे गाने की गूंज सुनाई पडी.मैने देखा तो होलिका गुलाल और अबीर उडाते
हुये वापिस दहकती जलती होली में समा गई. मै मन ही मन सोचता रहा कि हमारी होली क्या
होली तो रंग बदलने वालों की होती है. रंग बरसे क्या .. आज तो रंग तरस रहें हैं कि कोई
आये और हमें लगाये.
अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७
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