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Sunday, 16 October 2016

छपासरोगी की आत्मकथा

छपासरोगी की आत्मकथा 
रोग तो बहुत हैं। कुछ का इलाज है तो कुछ लाइलाज हैं। अखबार में छपने के लिए  जो दिन रात एक कर दे। लिखे चार आखर और छपने का चालीस अखबारों में सोचे तो इस बीमारी को छपासरोग कहते हैं। छपासरोगी दिन हो या रात बेचैन रहते हैं।  इतनी बेचैनी तो ब्लडप्रेशर के मरीजों को भी नही होती है। जिस दिन थोडा सा लिख लिया तो लो फिर ले दस्त जब तक की अखबार मे अपना फोटो ना देख लें। ऐसे नमूनों का इलाज किसी दवाखाने में न मिलेगा। हां अखबार के संपादक जी इन मरीजों के भगवान् जरूर होते है।।।  डाक्टर मरीजों का भगवान ही तो होता है।।।।  जिसको यह रोग लगा जाये फिर तो उसे ना जन्नत मिलती है और ना ही जहन्नुम। बस खजूर के पेड़ मे लटके आदमी की तरह घुट घुट कर जीवन यापन करता है। 
छपासरोगी हर जगह अपना जुगाड़ लगा ही लेता है। साम दाम दंड भेद सब आजमाने में माहिर होता  है। गधों को भी बाप बना लेता है। वो छपने को इश्क मानता है और इश्क  और जंग की तरह हर हथकंडे को जायज मानता है। वो कभी कभी छपने के लिए शुभकामनाओं वाला विज्ञापन भी दे दे देता। यह रोग स्त्री और पुरुषों में बराबर पाया जाता है। उम्र के साथ और बढता जाता है। छपासरोगी का सिर दर्द नही करता।  हां वो दूसरों का सिरदर्द जरूर हो जाता है। सुबह से लेकर रात  तक उसके पास मस्त शेखचिल्ली के सपने होते है। उसके आसपास रहने वाले शुभचिंतक उसे मशविरे देकर खुद भी छपासस्वाद चख लेते है। फोटो खिंचवाने से लेकर फोटो छपवाने और फिर मोहल्ले मे प्रचार करने की महत्वाकांक्षा उन्हे आदर्शवादी होने का मुखौटा लगाने के लिये विवश कर देती है। इस चोले मे वो जगत के लंगूरराज लगते हैं। ऐसे महापुरुषों को मेरी लेखनी इसलिए प्रणाम करती है क्योंकि उनका यह धतकरम लिखने का केंद्र बन जाता है। 
अनिल अयान। 
9479411407

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